दल-बदल के ‘विलय’ नियम पर सुप्रीम कोर्ट की देरी से क्यों चिंतित हैं कपिल सिब्बल? बोले- अपवाद ही नियम बन गया तो लोकतंत्र को खतरा

दल-बदल के ‘विलय’ नियम पर सुप्रीम कोर्ट की देरी से क्यों चिंतित हैं कपिल सिब्बल? बोले- अपवाद ही नियम बन गया तो लोकतंत्र को खतरा

दलबदल विरोधी कानून के तहत विधायकों या सांसदों के सामूहिक रूप से किसी दूसरी पार्टी में जाने को ‘विलय’ मानने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने संविधान की 10वीं अनुसूची के ‘Merger Exception’ पर सुप्रीम कोर्ट में फैसले में हो रही देरी पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अगर मूल राजनीतिक पार्टी के विलय के बिना सिर्फ विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों के दूसरी पार्टी में जाने को ही विलय मान लिया गया, तो दलबदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।

कोच्चि में ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन की ओर से आयोजित ‘Horse Trade and Democracy’ चर्चा में सिब्बल ने कहा कि यह सिर्फ किसी एक राज्य की राजनीति का मुद्दा नहीं है। इसका असर संसदीय लोकतंत्र और भविष्य में सरकारों के बहुमत पर भी पड़ सकता है।

10वीं अनुसूची के ‘विलय’ प्रावधान पर क्यों उठे सवाल?

संविधान की 10वीं अनुसूची में दलबदल के मामलों में अयोग्यता से जुड़े प्रावधान हैं। इसके पैरा 4 में ‘विलय’ के लिए अपवाद का प्रावधान है।

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने 2022 में इसकी एक अहम व्याख्या की थी। अदालत ने माना था कि अगर किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो विलय का अपवाद लागू हो सकता है, भले ही मूल राजनीतिक पार्टी का औपचारिक विलय न हुआ हो।

यह फैसला गोवा कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों के बीजेपी में जाने से जुड़े मामले में आया था। हाईकोर्ट ने इन विधायकों को दलबदल के आधार पर अयोग्य नहीं माना और उनके कदम को ‘विलय’ के दायरे में रखा।

सिब्बल का सवाल इसी व्याख्या को लेकर है। उनका कहना है कि अगर पार्टी का विलय जरूरी नहीं है और सिर्फ विधायकों का दो-तिहाई समूह दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो दलबदल विरोधी कानून का अपवाद बहुत व्यापक हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की देरी पर सिब्बल ने क्या कहा?

गोवा हाईकोर्ट की इस व्याख्या को चुनौती देते हुए 2022 में सुप्रीम कोर्ट में SLP (C) No. 5305/2022 दाखिल की गई थी। हालांकि, 2026 में गोवा विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाने के कारण यह याचिका निष्प्रभावी मानकर बंद कर दी गई।

इसी देरी पर सिब्बल ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि 2022 से यह संवैधानिक सवाल लंबित रहा, जबकि इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर व्यापक हो सकता है।

उनके मुताबिक, अगर इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पर समय रहते फैसला नहीं होता, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इसमें इतनी देरी क्यों हुई।

मामला इसलिए भी संवेदनशील हो गया है क्योंकि बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों में इसी तरह की ‘विलय’ वाली व्याख्या का हवाला दिया गया। सिब्बल ने अप्रैल 2026 में AAP के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने का उदाहरण दिया। इसी तरह जून 2026 में शिवसेना UBT के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने और स्पीकर द्वारा इसे विलय के रूप में मान्यता देने का भी उल्लेख किया।

सिब्बल बोले- अपवाद ही नियम बन गया तो क्या होगा?

सिब्बल ने 10वीं अनुसूची के पैरा 4(ii) की व्याख्या पर गंभीर आपत्ति जताई। उनके अनुसार, यह प्रावधान वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन को संरक्षण देने के लिए था। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल विधायी दल के बड़े समूह के दूसरी पार्टी में जाने को वैध ठहराने के लिए होने लगे, तो दलबदल विरोधी कानून का मकसद कमजोर पड़ सकता है।

उन्होंने इसे इस तरह समझाया कि मौजूदा स्थिति में अकेले दलबदल करने वाले व्यक्ति को सजा मिल सकती है, जबकि संगठित तरीके से दलबदल करने वाला समूह कानूनी संरक्षण हासिल कर सकता है।

सिब्बल के मुताबिक, 10वीं अनुसूची को खत्म करने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इसके ‘विलय’ प्रावधान की व्याख्या उसी उद्देश्य के अनुरूप हो, जिसके लिए इसे बनाया गया था। उनका सुझाव है कि जरूरत पड़ने पर कानून में संशोधन किया जाए, ताकि विलय का मतलब राजनीतिक दलों का वास्तविक विलय हो, न कि विधायकों का सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ देना।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र असहमति को संभाल सकता है, लेकिन जनता के जनादेश की ‘बिक्री’ को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामला सिर्फ विधानसभा तक नहीं, लोकसभा तक पहुंच सकता है

सिब्बल ने इस पूरे विवाद को राज्यों की सरकारों तक सीमित नहीं माना। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर बड़े पैमाने पर दल-बदल को विलय के नाम पर मान्यता मिलती रही, तो यही तरीका लोकसभा में भी संख्या बल बदलने के लिए इस्तेमाल हो सकता है।

उन्होंने संसद में संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत का भी जिक्र किया और ‘मिशन 362’ का उल्लेख किया। सिब्बल ने कहा कि अगर कोई राजनीतिक ताकत उस स्तर का बहुमत हासिल कर लेती है, तो संविधान में बदलाव की क्षमता उसके पास होगी। उन्होंने विशेष रूप से संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर और 1950 में अपनाए गए धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को लेकर चिंता जताई।

उनका कहना था कि इसका असर केवल राजनीतिक दलों पर नहीं पड़ेगा। ऐसे बदलाव अंततः आम नागरिकों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

हॉर्स ट्रेडिंग पर भी उठे सवाल, स्पीकर की भूमिका पर बहस

सिब्बल ने ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ को केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ नहीं, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों की संगठित खरीद के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि इसमें नकद, मंत्री पद, कॉन्ट्रैक्ट या जांच से राहत जैसे संभावित लाभों का इस्तेमाल हो सकता है।

उनके मुताबिक, अगर चुनाव के बाद किसी दूसरे तरीके से बहुमत तैयार किया जाता है और उसे राजनीतिक विलय का नाम दे दिया जाता है, तो जनता के वोट का वास्तविक असर कमजोर पड़ता है।

उन्होंने दलबदल के मामलों में स्पीकर की भूमिका पर भी सवाल उठाया। सिब्बल का कहना है कि स्पीकर आम तौर पर उसी राजनीतिक दल से जुड़ा होता है जिसने उसे चुना है। ऐसे में उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने अयोग्यता से जुड़े मामलों के लिए एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल बनाने और मामलों के निपटारे के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करने की मांग की।

सिब्बल ने 1967 के बाद दलबदल के मामलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस दौर में दलबदल पर बनी समिति ने फरवरी 1969 में अपनी रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक 542 दलबदल के मामले सामने आए थे और करीब 80 फीसदी मामले मार्च 1967 के बाद के शुरुआती 12 महीनों में हुए थे। उन्होंने यह भी बताया कि बाद में दलबदल करने वाले 116 लोगों को मंत्री बनाया गया था।

फिलहाल 10वीं अनुसूची की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग याचिका भी लंबित है, जिसका जिक्र सिब्बल ने किया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच कर रही है। सिब्बल के मुताबिक, इस बेंच ने भी 10वीं अनुसूची से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं पर ध्यान दिया है।

इस पूरी बहस का मूल सवाल यही है कि क्या दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का किसी दूसरी पार्टी में जाना अपने आप ‘विलय’ माना जा सकता है, या इसके लिए मूल राजनीतिक पार्टी का विलय भी जरूरी होना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या इस सवाल का जवाब तय करेगी और इसका असर भविष्य में दलबदल, सरकारों के बहुमत और संसदीय राजनीति पर पड़ सकता है।