गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को रद्द करते हुए अधिकारियों की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की गई थी। हाईकोर्ट ने चौधरी को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया था और यह रकम DM समेत जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूलने की बात कही थी।
मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें सवाल सिर्फ एक छात्रा की हिरासत का नहीं है। यह प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल, नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारियों की संवैधानिक जवाबदेही से भी जुड़ा है। अब सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दिए जाने के बाद मामले की कानूनी दिशा पर सबकी नजर रहेगी।
मामला Medha Roopam v. Akriti Chaudhary के नाम से सामने आया है।
मजदूरों के प्रदर्शन से शुरू हुआ मामला, फिर लगा NSA
आकृति चौधरी दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट हैं और छात्र एक्टिविस्ट के तौर पर भी जुड़ी रही हैं। अप्रैल 2026 में उन्हें नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। यह प्रदर्शन मजदूरों की ज्यादा वेतन की मांग से जुड़ा था।
इसके बाद 13 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस ने आकृति चौधरी और एक्टिविस्ट एवं पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ National Security Act, 1980 (NSA) लगाया। दोनों उन एक्टिविस्टों में शामिल थे, जिन्हें मजदूरों के समर्थन में हुए शांतिपूर्ण विरोध से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस हिरासत को चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड और पुलिस की रिपोर्ट को देखते हुए NSA के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने कहा- हिरासत के पीछे ठोस आधार नहीं
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने माना कि आकृति चौधरी को NSA के तहत लगातार हिरासत में रखना उनके Article 21 के मौलिक अधिकार का उल्लंघन था। कोर्ट के मुताबिक हिरासत का आदेश और उसके आधार ठोस सबूतों पर आधारित नहीं थे और आदेश जारी करने से पहले रिकॉर्ड पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
बेंच ने यह भी नोट किया कि चौधरी एक महिला स्टूडेंट एक्टिविस्ट हैं और उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। उपलब्ध सामग्री से यह भी साबित नहीं होता था कि उन्होंने हिंसा भड़काने का काम किया था।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उनकी NSA हिरासत रद्द कर दी। साथ ही कोर्ट ने ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया। खास बात यह थी कि इस रकम की वसूली गौतम बुद्ध नगर की DM मेधा रूपम और हिरासत के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों, SHO तक, की सैलरी से करने की बात कही गई।
अधिकारियों को लेकर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने 15 पेज के आदेश में सिर्फ हिरासत के फैसले पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि प्रशासन और पुलिस की भूमिका को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों को व्यापक शक्तियां इसलिए दी जाती हैं क्योंकि उनसे नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, सम्मान, गरिमा और कल्याण की रक्षा की उम्मीद होती है। लेकिन अधिकारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी वफादारी संविधान के प्रति है, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं।
बेंच ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक हैं और जनता ही असली मालिक है। अगर कोई अधिकारी अपनी शपथ और संवैधानिक जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करके काम करता है, तो इससे लोगों के भीतर प्रशासन के प्रति अविश्वास और असंतोष पैदा हो सकता है।
कोर्ट ने यहां तक चेतावनी दी कि अगर ब्यूरोक्रेसी में गलत काम करने वालों का व्यवहार इसी तरह जारी रहा, तो उत्तर प्रदेश को “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” में बदलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसका मतलब ऐसी दमनकारी व्यवस्था से है, जहां सत्ता का नियंत्रण नागरिक स्वतंत्रता पर हावी हो जाए।
DM मेधा रूपम के फैसले पर क्यों उठे सवाल?
हाईकोर्ट ने DM मेधा रूपम की भूमिका पर विशेष रूप से टिप्पणी की। कोर्ट के मुताबिक पुलिस रिपोर्ट में जहां भरोसेमंद सबूतों के बजाय आरोप लगाए गए थे, वहां DM को NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करने से पहले पूरे रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करनी चाहिए थी।
बेंच ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी का काम केवल पुलिस की रिपोर्ट पर आदेश पारित करना नहीं है। खासकर तब, जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही हो।
कोर्ट ने यह निष्कर्ष भी दर्ज किया कि परिस्थितियों से ऐसा प्रतीत होता है कि DM आकृति चौधरी के मामले के जरिए “एक मिसाल कायम” करना चाहती थीं। इससे दूसरे लोगों को मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से बोलने और अपनी बात रखने से हतोत्साहित किए जाने की आशंका जताई गई।
इसी संदर्भ में कोर्ट ने DM के व्यवहार को “निंदा के योग्य” बताया।
इस मामले का व्यापक असर प्रशासन और आम नागरिक दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। अगर किसी नागरिक की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए कठोर कानून का इस्तेमाल किया जाता है, तो उस फैसले के पीछे ठोस आधार और उचित प्रक्रिया होना जरूरी है। हाईकोर्ट ने इसी संवैधानिक जिम्मेदारी पर जोर दिया है। अब DM की सुप्रीम कोर्ट में अपील के बाद यह देखना अहम होगा कि शीर्ष अदालत इस पूरे मामले और हाईकोर्ट की टिप्पणियों को किस नजरिए से देखती है।



