भारत में जजों की सैलरी, भत्ते और सेवा शर्तों को लेकर एक अहम बहस सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। महाराष्ट्र स्टेट जजेज एसोसिएशन ने देशभर के न्यायिक अधिकारियों के लिए अलग नेशनल ज्यूडिशियल पे कमीशन (NJPC) बनाने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि जजों की सेवा शर्तों को सामान्य सरकारी कर्मचारियों के वेतन आयोग के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि न्यायपालिका के लिए एक स्वतंत्र और विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 14 अक्टूबर 2026 को होगी।
जजों की सैलरी के लिए अलग कमीशन क्यों चाहिए?
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। याचिका महाराष्ट्र स्टेट जजेज एसोसिएशन ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड दिलीप अन्नासाहेब तौर के जरिए दाखिल की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट बी.एच. मारलापल्ले के साथ तौर और एडवोकेट अमोल वी. देशमुख पेश हुए।
एसोसिएशन चाहती है कि केंद्र सरकार तुरंत एक स्वतंत्र NJPC गठित करे। यह कमीशन सुप्रीम कोर्ट से लेकर सभी 25 हाईकोर्ट और देशभर की जिला एवं अधीनस्थ अदालतों के जजों की सैलरी, भत्ते, सुविधाएं, पेंशन, रिटायरमेंट बेनिफिट और दूसरी सेवा शर्तों की व्यापक समीक्षा करे।
प्रस्तावित कमीशन सिर्फ वेतन तय करने तक सीमित नहीं होगा। याचिका में आवास, मेडिकल सुविधा, परिवहन, संचार, सुरक्षा, छुट्टी, कल्याणकारी योजनाओं और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों की भी समीक्षा की मांग की गई है।
8वें पे कमीशन में जजों को शामिल करने पर आपत्ति
इस मामले का दूसरा बड़ा पहलू 8वां केंद्रीय वेतन आयोग (8th CPC) है। एसोसिएशन ने केंद्र सरकार के 3 नवंबर 2025 के उस प्रस्ताव को चुनौती दी है, जिसके क्लॉज 2(a)(ix) में केंद्र शासित प्रदेशों की अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों के वेतन, भत्ते और दूसरे लाभों की समीक्षा का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि न्यायिक अधिकारियों को सामान्य केंद्रीय वेतन आयोग के दायरे में रखना सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में तय सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
एसोसिएशन ने खास तौर पर 1993 और 2001 के All India Judges Association मामलों का हवाला दिया है। 1993 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अधीनस्थ न्यायपालिका की सेवा शर्तों को उसी वेतन आयोग के हवाले करने की परंपरा पर दोबारा विचार होना चाहिए, जो दूसरी सरकारी सेवाओं के लिए काम करता है।
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के लिए अलग वेतन ढांचे की जरूरत पर जोर दिया था। इसी के बाद जस्टिस के.जे. शेट्टी की अध्यक्षता में पहला National Judicial Pay Commission गठित किया गया था। 21 मार्च 1996 को शेट्टी कमेटी का गठन हुआ और बाद में न्यायिक अधिकारियों की सैलरी से संबंधित पांचवें केंद्रीय वेतन आयोग को दिया गया रेफरेंस वापस ले लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
याचिका में केंद्र शासित प्रदेशों के न्यायिक अधिकारियों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। 2002 के All India Judges Association मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल आया था कि केंद्र शासित प्रदेशों में न्यायिक अधिकारियों के लिए वेतन ढांचा किस आधार पर तय किया जाए।
याचिका के मुताबिक उस समय केंद्र ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समानता के आधार पर अलग-अलग पे स्केल तैयार किए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि न्यायपालिका की तुलना कार्यपालिका से नहीं की जा सकती और न्यायिक अधिकारियों के लिए अपना अलग वेतन ढांचा होना चाहिए।
इसी आधार पर महाराष्ट्र स्टेट जजेज एसोसिएशन का तर्क है कि 8वें CPC के Terms of Reference में केंद्र शासित प्रदेशों के अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों को शामिल करना उचित नहीं है। एसोसिएशन चाहती है कि संबंधित प्रावधान को असंवैधानिक और गैर-कानूनी घोषित किया जाए और इन अधिकारियों को 8वें CPC के दायरे से बाहर किया जाए।
हर 10 साल में नया NJPC बनाने की मांग
याचिका में सिर्फ मौजूदा विवाद का समाधान नहीं मांगा गया है। एसोसिएशन ने भविष्य के लिए भी एक स्थायी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है।
उसके मुताबिक हर 10 साल में नया National Judicial Pay Commission बनाया जाना चाहिए, ताकि जजों की सैलरी और सेवा शर्तों की नियमित समीक्षा होती रहे। दो कमीशनों के बीच जजों की सैलरी में बदलाव केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू महंगाई भत्ते यानी DA के अनुरूप करने की मांग की गई है।
प्रस्तावित NJPC को गठन के 18 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देने का सुझाव है। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर सिफारिशों को लागू करने की मांग की गई है।
कमीशन को यह भी देखना होगा कि अलग-अलग राज्यों में न्यायिक अधिकारियों के वेतन में कितनी एकरूपता होनी चाहिए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और निचली अदालतों के बीच वेतन का अंतर तार्किक और संवैधानिक आधार पर तय किया जाए।
याचिका में न्यायिक पदों की खाली सीटों और योग्य प्रतिभाओं को न्यायिक सेवा की ओर आकर्षित करने की क्षमता के बीच संबंध पर भी विचार करने की मांग की गई है।
इसके अलावा रिटायरमेंट के बाद के लाभ, पेंशन, ग्रेच्युटी, मेडिकल कवरेज, रिटायरमेंट के बाद की पाबंदियां और उसके बदले मुआवजा जैसे मुद्दे भी प्रस्तावित कमीशन के दायरे में लाने की मांग है।
शिकायतों के लिए अलग व्यवस्था और अंतरिम राहत की मांग
एसोसिएशन ने जजों की शिकायतों के समाधान के लिए भी अलग तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत NJPC की रिपोर्ट आने के तीन महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में Grievance Redressal Committee गठित करने की मांग की गई है।
इसके लिए सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में एक अलग शिकायत निवारण सेल बनाने का भी सुझाव दिया गया है, जो इस समिति के सचिवालय के रूप में काम कर सके।
फिलहाल एक अंतरिम राहत के तौर पर एसोसिएशन ने मांग की है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 8वां केंद्रीय वेतन आयोग लागू होने के साथ ही 1 जनवरी 2026 से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की सैलरी में भी बदलाव किया जाए।
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। फिलहाल केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा गया है। 14 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि अदालत इस मांग और न्यायिक अधिकारियों को 8वें CPC के दायरे में रखने के सवाल को किस तरह आगे बढ़ाती है।
आम नागरिक के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायपालिका की सेवा शर्तों और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़ी बहस का असर अंततः उस न्याय व्यवस्था पर पड़ता है, जिसके जरिए नागरिक अपने अधिकारों की सुरक्षा और विवादों के समाधान की उम्मीद करता है।
Case Title: Maharashtra State Judges Association v. Union of India and Others


