पार्टी बदलने वाले नेताओं पर 10 साल का बैन! कपिल सिब्बल ने 10वीं अनुसूची खत्म करने का दिया सुझाव

पार्टी बदलने वाले नेताओं पर 10 साल का बैन! कपिल सिब्बल ने 10वीं अनुसूची खत्म करने का दिया सुझाव

राजनीतिक दल-बदल को लेकर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एक ऐसा सुझाव दिया है, जो मौजूदा 10वीं अनुसूची (Tenth Schedule) की पूरी व्यवस्था को बदल सकता है। उनका कहना है कि कार्यकाल के बीच में पार्टी बदलने वाले किसी भी नेता को 10 साल तक किसी सार्वजनिक पद या संवैधानिक अधिकार वाले पद पर रहने से अयोग्य कर दिया जाना चाहिए।

सिब्बल के मुताबिक दल-बदल विरोधी कानून में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें न इस्तीफा देकर और न ही किसी दूसरे दल में विलय का रास्ता अपनाकर अयोग्यता से बचा जा सके। उन्होंने यहां तक कहा कि मौजूदा 10वीं अनुसूची को खत्म कर संविधान में एक स्पष्ट और सीधा नियम जोड़ा जा सकता है।

सिब्बल यह बात कोच्चि में ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के कार्यक्रम में ‘हॉर्स-ट्रेडिंग और लोकतंत्र’ विषय पर चर्चा के दौरान कह रहे थे।

इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने पर भी रोक की बात

सिब्बल से पूछा गया था कि अगर 10वीं अनुसूची अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर रही है, तो क्या इसे संशोधन या न्यायिक व्याख्या के जरिए ठीक किया जा सकता है?

उन्होंने कहा कि सिर्फ व्याख्या के जरिए समाधान निकलना मुश्किल हो सकता है। इसकी एक वजह यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में इस विषय से जुड़ा मामला लंबे समय से लंबित है और अभी तक उस पर फैसला नहीं आया है।

उनका तर्क था कि अयोग्यता सिर्फ पार्टी बदलने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सामूहिक इस्तीफे को भी इसी दायरे में लाना होगा। मौजूदा व्यवस्था में इस्तीफा देने के बाद दोबारा चुनाव लड़ने का रास्ता खुला रहता है। सिब्बल चाहते हैं कि ऐसा विकल्प भी उपलब्ध न हो।

यानी उनका प्रस्ताव साफ है—न पार्टी बदलने का रास्ता, न इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने का रास्ता।

आम मतदाता के नजरिए से देखें तो इस बहस का सीधा संबंध उस वोट से है, जो वह किसी उम्मीदवार को एक खास राजनीतिक दल के साथ देखकर देता है। अगर कार्यकाल के बीच में प्रतिनिधि पाला बदलता है, तो सवाल उठता है कि बदला सिर्फ नेता ने है या उस जनादेश का भी असर बदला है, जिसके आधार पर वह सदन तक पहुंचा था।

‘स्प्लिट’ से लेकर ‘मर्जर’ तक, सिब्बल ने बताई पूरी कहानी

सिब्बल ने दल-बदल कानून के इतिहास में ‘स्प्लिट’ यानी पार्टी टूटने वाले प्रावधान का उदाहरण भी दिया। उन्होंने BSP से जुड़े एक पुराने मामले का हवाला देते हुए बताया कि पहले 10वीं अनुसूची में एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने पर ‘स्प्लिट’ का प्रावधान लागू हो सकता था।

उनके मुताबिक BSP के पास उस समय करीब 105 सदस्य थे। पहले 13 सदस्य अलग हुए, लेकिन वे जरूरी संख्या तक नहीं पहुंच सके। इसके बाद दूसरे और फिर एक और समूह के अलग होने की स्थिति बनी। दलबदल संबंधी याचिकाएं दाखिल हुईं, लेकिन स्पीकर की ओर से तत्काल फैसला नहीं आया। जब अलग हुए सदस्यों की संख्या निर्धारित सीमा तक पहुंची, तब स्पीकर ने इसे ‘स्प्लिट’ मान लिया।

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने इस व्यवस्था को गलत माना। इसके बाद 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 10वीं अनुसूची से ‘स्प्लिट’ का प्रावधान हटा दिया गया।

सिब्बल का कहना है कि जिस तरह पहले ‘स्प्लिट’ के नियम का इस्तेमाल किया गया, उसी तरह अब ‘मर्जर’ यानी विलय की छूट का भी इस्तेमाल हो रहा है।

AAP और दूसरी पार्टियों के उदाहरण देकर उठाया सवाल

सिब्बल ने हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए AAP, शिवसेना (UBT) और तृणमूल कांग्रेस के उदाहरण दिए। उन्होंने दावा किया कि पंजाब में BJP का कोई सांसद नहीं होने के बावजूद AAP के राज्यसभा सांसदों के BJP में जाने के बाद BJP के पास अचानक सात सांसद हो गए।

उनका सवाल था कि “पंजाब ने उन्हें वोट नहीं दिया था।”

इसी तरह उन्होंने नॉर्थ-ईस्ट की एक ऐसी पार्टी का उदाहरण दिया, जिसके संसद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्यों के विलय के बाद उसके पास 18 सांसद हो गए।

सिब्बल ने बताया कि उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की है। इसमें मांग की गई है कि संविधान की 10वीं अनुसूची में ‘विलय’ का मतलब पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय माना जाए, सिर्फ सांसदों या विधायकों वाले उसके विधायी समूह का नहीं।

हालांकि, सिब्बल ने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट अगर इस मुद्दे पर फैसला देता है तो मौजूदा तरीके से होने वाले कुछ दल-बदल पर रोक लग सकती है। लेकिन उनके मुताबिक राजनीतिक दल नए रास्ते तलाशने में सक्षम हैं।

‘न इस्तीफा, न पाला बदलना’—सिब्बल का सीधा संदेश

सिब्बल ने कहा कि राजनीतिक दल इस प्रक्रिया से बचने के नए तरीके खोज सकते हैं। इसी वजह से उनका जोर ऐसे संवैधानिक नियम पर है, जिसमें कार्यकाल के बीच पार्टी बदलने वाले नेता को लंबे समय तक सार्वजनिक पद से दूर रखा जाए।

जब कार्यक्रम में एक सदस्य ने पूछा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में ऐसा संशोधन कराना मुश्किल है और सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में समय ले रहा है, तो सिब्बल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“इसे कॉकरोच जनता पार्टी के सामने उठाएं।”

उनका मूल तर्क हालांकि इससे कहीं गंभीर था। सिब्बल के मुताबिक दल-बदल की समस्या का समाधान ऐसे नियम से होना चाहिए, जिसमें राजनीतिक प्रतिनिधि अपने कार्यकाल के दौरान पार्टी बदलकर या इस्तीफा देकर मतदाताओं के दिए जनादेश को नए राजनीतिक समीकरण में इस्तेमाल न कर सकें।

उनका प्रस्ताव अभी एक सुझाव है, कोई लागू संवैधानिक व्यवस्था नहीं। लेकिन 10वीं अनुसूची, स्पीकर की भूमिका और राजनीतिक विलय को लेकर जारी बहस में यह सुझाव दल-बदल विरोधी कानून की मौजूदा संरचना पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है।