UP Election 2027: सपा 60-70 सीटों पर तैयार, कांग्रेस 105 पर कायम? सीट बंटवारे ने गठबंधन में बढ़ाई हलचल

UP Election 2027: सपा 60-70 सीटों पर तैयार, कांग्रेस 105 पर कायम? सीट बंटवारे ने गठबंधन में बढ़ाई हलचल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब छह महीने का वक्त है, लेकिन सियासी गठजोड़ की सबसे अहम कवायद शुरू होती दिख रही है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर शुरुआती स्तर पर मंथन की खबर है। रिपोर्ट के मुताबिक, सपा अपने स्तर पर करीब 60 से 70 सीटें कांग्रेस को देने के विकल्प पर विचार कर रही है। वहीं कांग्रेस की दावेदारी इससे काफी बड़ी बताई जा रही है। पार्टी 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन का उदाहरण देते हुए करीब 105 सीटों पर दावा कर रही है।

यानी 2027 के चुनाव से पहले ही गठबंधन के भीतर सीटों का गणित चर्चा में आ गया है। फिलहाल दोनों दलों के बीच अंतिम समझौते की जानकारी सामने नहीं आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सपा संभावित सीटों को लेकर जिलेवार जानकारी जुटा रही है। इसमें जातीय समीकरण, स्थानीय संगठन की स्थिति, पिछले चुनाव का प्रदर्शन और संभावित उम्मीदवार की पकड़ जैसे पहलुओं को देखा जा रहा है। जिन सीटों पर कांग्रेस को उतारने की संभावना है, वहां संभावित दावेदारों से संपर्क किए जाने की बात भी कही गई है।

सपा का फॉर्मूला क्या है? सिर्फ सीट नहीं, जीत की संभावना पर जोर

सीट बंटवारे की इस कवायद में सपा का संभावित फोकस सिर्फ यह नहीं बताया जा रहा कि कांग्रेस ने पहले किस सीट पर चुनाव लड़ा था। बल्कि पार्टी यह देख रही है कि मौजूदा समय में किस सीट पर कौन सा दल संगठनात्मक और चुनावी तौर पर मजबूत स्थिति में है।

यानी किसी सीट पर दावा तय करने से पहले स्थानीय समीकरण को महत्व दिया जा सकता है। किस जातीय समूह की कितनी प्रभावी मौजूदगी है, पार्टी का बूथ स्तर का संगठन कितना सक्रिय है और संभावित उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ कैसी है—इन सभी पहलुओं पर आकलन किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

सूत्रों के मुताबिक, इसी प्रक्रिया के तहत कांग्रेस से संभावित उम्मीदवारों की जानकारी भी मांगी गई है। इसका मतलब यह है कि बातचीत सिर्फ सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रह सकती। कांग्रेस को यह भी बताना पड़ सकता है कि जिन सीटों पर वह दावा कर रही है, वहां उसके पास मजबूत स्थानीय चेहरा और संगठन कितना तैयार है।

गठबंधन की बातचीत में यह भी देखा जा सकता है कि संबंधित सीट पर BJP या दूसरे दलों के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति कैसी है।

अमेठी-रायबरेली से लेकर लखनऊ तक, किन इलाकों पर नजर?

रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस की संभावित दावेदारी वाले जिलों में रायबरेली, लखनऊ, गोरखपुर, महाराजगंज, आगरा, वाराणसी, बाराबंकी, लखीमपुर, अमेठी, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, गोंडा, जौनपुर, मेरठ, सहारनपुर, प्रतापगढ़, हाथरस, कानपुर और प्रयागराज जैसे नाम शामिल हैं।

इनमें हर इलाके की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। कुछ जिलों में कांग्रेस अपने पुराने संगठन और स्थानीय नेताओं के आधार पर दावा कर सकती है। वहीं लखनऊ, कानपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी जैसे शहरी या अर्धशहरी क्षेत्रों में भी पार्टी की संभावित दावेदारी की चर्चा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सपा इन क्षेत्रों में कांग्रेस के शहरी संगठन और उसके पारंपरिक मतदाता आधार को ध्यान में रख सकती है। हालांकि, कांग्रेस की रुचि सिर्फ शहरी सीटों तक सीमित नहीं बताई जा रही है। पार्टी उन ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में भी सीटें चाह सकती है, जहां उसके पुराने नेता और कार्यकर्ता सक्रिय हैं।

अमेठी और रायबरेली पर खास नजर

सीट बंटवारे में अमेठी और रायबरेली खास महत्व रख सकते हैं। कांग्रेस के लिए इन दोनों इलाकों का पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि कांग्रेस इन दोनों जिलों में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।

वहीं सपा ने रायबरेली की चार और अमेठी की दो सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसी वजह से रिपोर्ट के मुताबिक सपा दोनों जिलों में एक-एक सीट कांग्रेस को देने के विकल्प पर विचार कर रही है।

यही वह बिंदु है जहां दोनों दलों की दावेदारी के बीच अंतर दिखाई देता है। कांग्रेस पुराने राजनीतिक आधार को देखते हुए अधिक सीटें चाहती है, जबकि सपा मौजूदा चुनावी स्थिति और जीत की संभावना को आधार बनाने की दिशा में बढ़ती दिख रही है।

कांग्रेस के 105 सीट वाले दावे का आधार क्या है?

कांग्रेस की ओर से सीट बंटवारे में 2017 के गठबंधन का उदाहरण दिए जाने की बात कही जा रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को 105 सीटें मिली थीं।

लेकिन चुनाव परिणाम में कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी। यही आंकड़ा मौजूदा बातचीत में सपा के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

सपा का संभावित तर्क यह हो सकता है कि 2017 और 2027 के राजनीतिक हालात एक जैसे नहीं हैं। उस समय के चुनावी समीकरण, संगठन की स्थिति और दोनों दलों की जमीन आज से अलग है। इसलिए पिछली बार मिली सीटों की संख्या को मौजूदा सीट बंटवारे का सीधा आधार बनाना जरूरी नहीं है।

दूसरी ओर, कांग्रेस अपने पुराने संगठनात्मक आधार और संभावित उम्मीदवारों के जरिए अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी रख सकती है।

फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि 60-70 और 105 सीटों के बीच का अंतर काफी बड़ा है। ऐसे में आने वाले समय में दोनों दलों के बीच बातचीत का केंद्र सिर्फ कुल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि हर सीट की चुनावी उपयोगिता और स्थानीय समीकरण भी हो सकता है।

अभी सीट बंटवारे पर कोई अंतिम समझौता सामने नहीं आया है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई यह शुरुआती कवायद बताती है कि गठबंधन के भीतर सीटों का गणित अब राजनीतिक एजेंडे में तेजी से जगह बना रहा है।