आधी रात गाड़ी उठाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, RBI को बैंकों-NBFCs की रिकवरी गाइडलाइंस लागू कराने का निर्देश

आधी रात गाड़ी उठाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, RBI को बैंकों-NBFCs की रिकवरी गाइडलाइंस लागू कराने का निर्देश

कर्ज की किस्त चूकने पर बैंक या NBFC आपकी गाड़ी वापस ले सकता है, लेकिन इसके लिए मनमानी या जबरदस्ती का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में साफ किया है कि वाहन की रिकवरी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। अदालत ने RBI को भी निर्देश दिया है कि बैंकों और NBFCs के लिए जारी रिकवरी गाइडलाइंस, मास्टर सर्कुलर और स्पष्टीकरणों का प्रभावी तरीके से पालन कराया जाए। मामला इतना गंभीर था कि कोर्ट ने गैर-कानूनी तरीके से वाहन कब्जे में लेने वाले फाइनेंसर को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

रात 1 बजे लॉक तोड़कर ले गए ट्रक, फिर सामने आई पूरी कहानी

मामला Hari Dutta Sharma v State of UP & Ors का है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने 16 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया।

मामले में अपीलकर्ता ने 2019 में चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से एक कमर्शियल वाहन खरीदने के लिए लोन लिया था। ट्रक को लोन के बदले हाइपोथिकेट किया गया था। इसके बाद जून 2021 में उन्होंने अतिरिक्त लोन भी लिया।

कर्ज की किस्तों में डिफॉल्ट होने पर कंपनी ने 2022 में ट्रक अपने कब्जे में लिया था। हालांकि, कुछ भुगतान होने के बाद वाहन वापस कर दिया गया। बाद में भुगतान में फिर चूक हुई और कंपनी की ओर से नोटिस भी जारी किए गए।

मामले में विवाद तब बढ़ा जब अप्रैल 2023 में ट्रक CCTV निगरानी वाली जगह पर खड़ा था। आरोप है कि रात करीब 1 बजे चार अज्ञात लोग वहां पहुंचे। उन्होंने ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़ा और वाहन लेकर चले गए।

अपीलकर्ता ने उसी दिन ई-FIR दर्ज कराई। कार्रवाई नहीं हुई तो पुलिस अधीक्षक के सामने भी शिकायत की गई। बाद में मिले कानूनी नोटिस से उन्हें पता चला कि फाइनेंस कंपनी ने वाहन अपने कब्जे में लेकर बेच दिया है। खास बात यह थी कि ट्रक बेचने के बाद भी उनके लोन खाते में कुछ रकम बकाया बताई गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- रिकवरी के नाम पर ताकत का इस्तेमाल नहीं चलेगा

मामला पहले चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पहुंचा। वहां CrPC की धारा 156(3) के तहत शिकायत की गई, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि भुगतान न होने के कारण वाहन जब्त किया गया था। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल हुई, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने RBI की पुरानी गाइडलाइंस और रिकवरी से जुड़े नियमों की विस्तार से चर्चा की।

कोर्ट ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 35A के तहत RBI को जनहित और बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े मामलों में बाध्यकारी निर्देश जारी करने की शक्ति है। ऐसे निर्देश महज सलाह नहीं हैं। बैंकिंग कंपनियों को उनका पालन करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि RBI लंबे समय से बैंकों और NBFCs को रिकवरी एजेंटों के व्यवहार और वाहन जब्ती के तरीके को लेकर निर्देश देता रहा है। इनमें कर्जदारों को अनुचित तरीके से परेशान नहीं करने, अजीब समय पर दबाव नहीं बनाने और वसूली के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करने की बात शामिल है।

अदालत ने ICICI Bank Ltd. v. Prakash Kaur मामले का भी हवाला दिया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि देश में कानून का शासन है और लोन की वसूली या वाहन कब्जे में लेने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने तय किए 10 अहम सिद्धांत

भविष्य में वाहन और अन्य संपत्तियों की रिकवरी से जुड़े विवादों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने रखे।

अदालत के मुताबिक, कर्ज की वसूली के दौरान उधारकर्ता को बेवजह परेशान नहीं किया जा सकता। रिकवरी एजेंटों को भी नियमों के मुताबिक नियुक्त करना होगा और उन्हें संबंधित RBI गाइडलाइंस का पालन करना होगा।

लोन एग्रीमेंट में मौजूद repossession यानी संपत्ति वापस लेने की शर्त भी कानून के अनुरूप होनी चाहिए। रिकवरी एजेंटों को लागू नियमों और बैंकिंग से जुड़े आचार संहिता का पालन करना होगा।

RBI को नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई करनी होगी। जरूरत पड़ने पर किसी बैंक को किसी खास क्षेत्र या गतिविधि के लिए रिकवरी एजेंट रखने से रोका भी जा सकता है। बार-बार नियम तोड़ने पर ऐसी रोक बढ़ाई जा सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि repossession प्रक्रिया में नोटिस की अवधि, कब्जा लेने का तरीका, बिक्री से पहले कर्जदार को भुगतान का अंतिम अवसर और बिक्री के बाद संबंधित प्रक्रिया जैसी बातें स्पष्ट होनी चाहिए।

इसके अलावा, योग्य कर्जदारों के मामलों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के लिए क्रेडिट काउंसलर की व्यवस्था को बढ़ावा देने की बात कही गई है। माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के लिए स्थानीय भाषा में Fair Practices Code प्रदर्शित करने और कर्मचारियों के व्यवहार तथा शिकायत निवारण की जवाबदेही तय करने जैसे प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया।

नोटिस नहीं दिया, रात में कब्जा लिया; कंपनी को 10 लाख का मुआवजा

मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वाहन का कब्जा लेने से पहले अपीलकर्ता को जरूरी सात दिन का नोटिस नहीं दिया गया था। अदालत के अनुसार, ऐसे नोटिस के बिना कंपनी को वाहन वापस लेने का संविदात्मक अधिकार हासिल ही नहीं हुआ।

रात करीब 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाने के तरीके को कोर्ट ने शांतिपूर्ण repossession नहीं माना। अदालत ने कहा कि यह उस तरह के जबरदस्ती वाले व्यवहार की श्रेणी में आता है जिसकी पहले भी निंदा की जा चुकी है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक की बिक्री को रद्द नहीं किया। इसके बजाय कंपनी को दोनों लोन अकाउंट बंद करने और ट्रक की बिक्री से मिली 4.50 लाख रुपये की रकम वापस करने का निर्देश दिया। इस रकम पर बिक्री की तारीख से भुगतान तक 6 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा।

इसके अलावा, अपीलकर्ता को मानसिक पीड़ा और लंबे समय तक आजीविका प्रभावित होने के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। कोर्ट ने मामले में 50 हजार रुपये की लागत भी तय की और अपील स्वीकार कर ली।

इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि कर्ज की वसूली का अधिकार फाइनेंसर के पास हो सकता है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल कानून से बाहर जाकर नहीं किया जा सकता। बैंक और NBFC के लिए रिकवरी एक कारोबारी प्रक्रिया है, लेकिन कर्जदार के लिए वही वाहन उसकी रोजी-रोटी का साधन भी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए नियमों के प्रभावी पालन पर जोर दिया है।