मुआवज़े की रकम का लाइव हिसाब नहीं तो सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार के दो सचिवों को नोटिस

मुआवज़े की रकम का लाइव हिसाब नहीं तो सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार के दो सचिवों को नोटिस

मोटर दुर्घटना या लेबर कोर्ट से मिलने वाला मुआवज़ा किसी पीड़ित परिवार के लिए सिर्फ एक सरकारी रकम नहीं होता। कई मामलों में यही पैसा इलाज, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों का सहारा बनता है। लेकिन अदालतों में जमा ऐसी रकम अगर लंबे समय तक बिना दावे के पड़ी रहे और उसका पता लगाने का कोई आसान सिस्टम न हो, तो जरूरतमंद तक पैसा पहुंचने में देरी हो सकती है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में डिजिटल डैशबोर्ड बनाने की प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर परिवहन विभाग और श्रम एवं उद्योग विभाग के सचिवों को नोटिस जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) और लेबर कोर्ट में जमा मुआवज़े की रकम का लाइव स्टेटस दिखाने वाला डैशबोर्ड तैयार हो और उसे नियमित रूप से अपडेट किया जाए। मामले की अगली सुनवाई अब 28 अक्टूबर 2026 को होगी।

आखिर क्यों जरूरी हुआ मुआवज़े की रकम का लाइव डैशबोर्ड?

इस मामले की शुरुआत एक रिटायर्ड जिला जज बीबी पाठक की ओर से अदालत को लिखे गए पत्र से हुई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि अदालतों के पास मुआवज़े की बड़ी रकम ऐसी पड़ी है, जिस पर संबंधित लोगों ने अभी तक दावा नहीं किया है।

इसके बाद अप्रैल 2025 में जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इस समस्या को लेकर कई निर्देश जारी किए।

कोर्ट ने कहा था कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 या कर्मचारी मुआवज़ा अधिनियम, 1923 के तहत मिलने वाली मुआवज़े की रकम सीधे पात्र दावेदारों के बैंक खातों में पहुंचाई जानी चाहिए।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण डिजिटल व्यवस्था की बात कही गई। हाईकोर्ट को राज्य सरकार की मदद से ऐसा डैशबोर्ड तैयार करना था, जहां अदालत में जमा मुआवज़े की रकम और उसके स्टेटस की जानकारी उपलब्ध हो। इसका उद्देश्य यह था कि बिना दावे के पड़ी रकम को आसानी से ट्रैक किया जा सके और संबंधित दावेदार तक उसे पहुंचाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता आए।

दिल्ली, तेलंगाना और मेघालय ने बनाया सिस्टम, यूपी में अभी प्रक्रिया जारी

मामले की पिछली सुनवाई में एमिक्स क्यूरी और सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट को बताया था कि कुछ हाईकोर्ट ने अभी तक डैशबोर्ड तैयार नहीं किया है।

उन्होंने इलाहाबाद, मद्रास, मेघालय, दिल्ली और तेलंगाना हाईकोर्ट का जिक्र किया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से अनुपालन रिपोर्ट मांगी।

अब सुनवाई के दौरान अरोड़ा ने बताया कि दिल्ली, मेघालय और तेलंगाना हाईकोर्ट ने अदालत के निर्देशों के मुताबिक ऐसे डैशबोर्ड उपलब्ध करा दिए हैं, जिन पर बिना दावे वाली मुआवज़े की रकम की लाइव स्थिति देखी जा सकती है।

मद्रास हाईकोर्ट ने भी डैशबोर्ड तैयार कर लिया है। वहां फिलहाल इसका सिक्योरिटी ऑडिट किया जा रहा है। अरोड़ा ने अदालत को बताया कि मद्रास हाईकोर्ट इस तरह का सिक्योरिटी ऑडिट कराने वाला पहला हाईकोर्ट है।

लेकिन उत्तर प्रदेश का मामला अभी पूरी तरह आगे नहीं बढ़ पाया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट आई, लेकिन गेंद अब राज्य सरकार के पाले में

सुनवाई के दौरान बताया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने 15 सितंबर 2026 को हलफनामा दाखिल किया है। इसमें अब तक उठाए गए कदमों का विवरण दिया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में प्रक्रिया राज्य सरकार के स्तर पर है और हाईकोर्ट सरकार के साथ मिलकर इसे प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ा रहा है। हलफनामे में देरी का कारण भी बताया गया है।

एमिक्स क्यूरी ने अदालत से अनुरोध किया कि चूंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से अभी पूर्ण अनुपालन की स्थिति सामने नहीं आई है, इसलिए उत्तर प्रदेश को इस मामले में आवश्यक पक्ष बनाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के दो सचिवों को नोटिस भेजने का दिया आदेश

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच ने कहा कि 18 अगस्त 2025 के आदेश में दिए गए निर्देशों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना जरूरी है।

कोर्ट ने इसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य को आवश्यक पक्ष के रूप में जोड़ा है। राज्य की ओर से अब परिवहन सचिव और श्रम एवं उद्योग विभाग के सचिव इस मामले में पक्ष का प्रतिनिधित्व करेंगे।

दोनों सचिवों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया है।

मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को होगी।

इस पूरे मामले का असर केवल अदालतों की प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। डिजिटल डैशबोर्ड का मकसद यह पता लगाना है कि मुआवज़े की कितनी रकम जमा है, वह किस स्थिति में है और बिना दावे वाली रकम का क्या हो रहा है। आम तौर पर किसी दुर्घटना या श्रम विवाद के बाद मुआवज़े की प्रक्रिया पहले ही लंबी हो सकती है। ऐसे में रकम की स्थिति स्पष्ट और आसानी से उपलब्ध होना दावेदारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

Case Details: IN RE COMPENSATION AMOUNTS DEPOSITED WITH MOTOR ACCIDENT CLAIMS TRIBUNALS AND LABOUR COURTS | SMW(C) No. 7/2024