ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस यानी AITC के भीतर चल रही खींचतान अब चुनाव आयोग तक पहुंच गई है। चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर पार्टी के दोनों विरोधी गुटों को फिलहाल TMC का नाम और उसका आरक्षित चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने से रोक दिया है। आयोग के इस फैसले का सीधा असर आगामी उपचुनावों पर पड़ेगा, क्योंकि दोनों गुट अब न तो ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम से चुनाव लड़ सकेंगे और न ही पार्टी के लिए आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल कर सकेंगे।
ECI का यह आदेश 17 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी तथा सुखबीर सिंह संधू ने जारी किया। आयोग के मुताबिक, फिलहाल पार्टी के भीतर दो विरोधी गुट हैं। एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे गुट की अगुवाई अरूप रॉय कर रहे हैं। दोनों ही खुद को असली AITC बताते हैं।
उपचुनाव से पहले आया फैसला, दोनों गुटों को मिलेगा नया नाम और निशान
चुनाव आयोग ने कहा कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत विवाद का अंतिम निपटारा करने में समय लगेगा। वहीं, सामने मौजूद चुनावी परिस्थितियों को देखते हुए तत्काल व्यवस्था जरूरी थी।
इसी वजह से आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया है। इसका मतलब साफ है कि जब तक पार्टी पर चल रहे विवाद का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक किसी भी गुट को मूल पार्टी का नाम या उसका आरक्षित चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी।
दोनों गुटों को अब अपने लिए अलग नाम चुनना होगा। ये नाम ऐसे भी हो सकते हैं, जिनसे उनके AITC से पुराने जुड़ाव का संकेत मिलता हो। चुनाव आयोग उनके उम्मीदवारों के लिए फ्री सिंबल की सूची में से अलग-अलग चुनाव चिह्न भी आवंटित करेगा।
आयोग ने दोनों पक्षों से 18 सितंबर को सुबह 11 बजे तक तीन-तीन नाम प्राथमिकता के क्रम में देने को कहा है। इसके साथ उम्मीदवारों के लिए तीन पसंदीदा मुक्त चुनाव चिह्नों के विकल्प भी मांगे गए हैं।
आखिर AITC में विवाद शुरू कैसे हुआ?
पार्टी के नियंत्रण को लेकर विवाद तब सामने आया, जब रिताब्रता बनर्जी ने चुनाव आयोग का रुख किया। उनके पक्ष की ओर से दावा किया गया कि AITC की नेशनल वर्किंग कमेटी का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो चुका था।
दावे के मुताबिक, इसके बाद उस कमेटी के पास अपने पदों पर बने रहने या पार्टी संविधान के तहत उसी तरह अधिकारों का इस्तेमाल करने का संवैधानिक आधार नहीं था।
इसके बाद 22 जून 2026 को कोलकाता के एक होटल में AITC का स्पेशल सेशन आयोजित किए जाने का दावा किया गया। इसी बैठक में अरूप रॉय को सर्वसम्मति से नेशनल वर्किंग कमेटी का चेयरमैन चुने जाने की बात कही गई। इसके बाद रिताब्रता बनर्जी को ECI समेत संवैधानिक संस्थाओं के सामने इस गुट का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत किए जाने का दावा भी सामने आया।
ममता बनर्जी गुट ने नियुक्तियों पर उठाए सवाल
दूसरी तरफ ममता बनर्जी गुट ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया। उसके मुताबिक, चेयरमैन समेत पार्टी के पदाधिकारियों के चुनाव का तरीका ही गैर-कानूनी था और यह पार्टी के संविधान के अनुरूप नहीं था।
ममता बनर्जी गुट ने 22 जून को भेजे गए उस कम्युनिकेशन को भी खारिज करने की मांग की। उसका कहना था कि चुनाव आयोग को उस पत्र या दावे को आधार नहीं बनाना चाहिए।
यानी विवाद सिर्फ पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है। इसके पीछे यह मूल सवाल है कि AITC की ओर से आधिकारिक तौर पर प्रतिनिधित्व करने का अधिकार आखिर किस गुट के पास है।
पैरा 15 क्या कहता है और आगे क्या होगा?
चुनाव चिह्न आदेश का पैरा 15 ऐसी परिस्थितियों में चुनाव आयोग को प्रक्रिया अपनाने का अधिकार देता है, जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के भीतर दो या उससे अधिक विरोधी गुट खुद को असली पार्टी बताते हैं।
ऐसे मामले में आयोग संबंधित तथ्यों पर विचार करता है, दोनों पक्षों को सुनता है और फिर यह निर्धारित करता है कि मान्यता प्राप्त पार्टी के तौर पर किस गुट को स्वीकार किया जाए, यदि किसी एक को किया जाना हो। आयोग का फैसला संबंधित विरोधी गुटों पर बाध्यकारी होता है।
फिलहाल ECI ने अंतिम फैसला नहीं दिया है। उसने केवल चुनावी प्रक्रिया के बीच पैदा हुई तत्काल स्थिति से निपटने के लिए अंतरिम व्यवस्था की है। इसलिए आने वाले समय में पैरा 15 के तहत होने वाली पूरी कार्यवाही अहम होगी।
आम मतदाता के लिए इसका सबसे सीधा मतलब यह है कि आगामी उपचुनाव में दोनों पक्षों के उम्मीदवारों को अलग नाम और अलग चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। वहीं, AITC के नाम और ‘फूल और घास’ निशान को लेकर अंतिम स्थिति आयोग की आगे की कार्यवाही से तय होगी।


