BCI में कौन ले रहा था बड़े फैसले? सुप्रीम कोर्ट में सदस्य ने उठाए गंभीर सवाल, NALSAR मामले से लेकर AIBE फंड तक का जिक्र

BCI में कौन ले रहा था बड़े फैसले? सुप्रीम कोर्ट में सदस्य ने उठाए गंभीर सवाल, NALSAR मामले से लेकर AIBE फंड तक का जिक्र

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे ने संस्था की निर्णय प्रक्रिया, वित्तीय व्यवस्था और चेयरमैन के कार्यकाल से जुड़े कई सवाल सामने रखे हैं। BCI सदस्य एन. मनोज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि कई अहम फैसले और सूचनाएं काउंसिल के नाम से जारी की गईं, लेकिन उन्हें लेने से पहले सदस्यों के बीच पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। उनका दावा है कि कई बैठकों के एजेंडा आखिरी समय में साझा किए गए और बैठकों की कार्यवाही यानी मिनट्स भी सदस्यों के बीच पुष्टि के लिए नहीं बांटे गए।

यह हलफनामा वकील योगमाया एमजी की उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसमें BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पद पर बने रहने को चुनौती दी गई है। एन. मनोज कुमार ने याचिका में उठाए गए BCI के गवर्नेंस, कामकाज और वित्तीय व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों का समर्थन किया है।

NALSAR के मामले में भी काउंसिल की बैठक नहीं हुई?

हलफनामे में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद से जुड़ा है। मनोज कुमार के मुताबिक, BCI चेयरमैन ने 13 अगस्त को 2026 में ग्रेजुएट होने वाले NALSAR बैच के एनरोलमेंट को रोकने का आदेश जारी किया था। उनका कहना है कि इस फैसले को चर्चा और मंजूरी के लिए BCI की जनरल काउंसिल के सामने नहीं रखा गया।

मनोज कुमार ने बताया कि उन्होंने इस कार्रवाई पर चेयरमैन को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई थी। बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया। हालांकि, उनके मुताबिक यह घटना इस बड़े सवाल को सामने लाती है कि BCI जैसे वैधानिक निकाय के अधिकारों का इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर किया जा सकता है या महत्वपूर्ण फैसलों के लिए सामूहिक काउंसिल की प्रक्रिया जरूरी है।

उन्होंने हलफनामे में कहा है कि एडवोकेट्स एक्ट के तहत BCI के वैधानिक अधिकार काउंसिल के सामूहिक अधिकार हैं। किसी एक पदाधिकारी के व्यक्तिगत अधिकार के तौर पर उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

बैठक से पहले एजेंडा, लेकिन मिनट्स की पुष्टि नहीं?

मनोज कुमार ने BCI की बैठकों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, कई बार बैठक का एजेंडा शुरू होने से ठीक पहले मैसेजिंग ग्रुप में भेजा या पोस्ट किया गया। ऐसे में सदस्यों के पास मुद्दों को पढ़ने, समझने और उन पर तैयारी के साथ चर्चा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं रहता।

उन्होंने यह भी दावा किया कि बैठकों की कार्यवाही यानी मिनट्स सदस्यों के बीच पुष्टि और मंजूरी के लिए नियमित रूप से साझा नहीं किए गए। उनके अनुसार, कई अहम संस्थागत और नीतिगत फैसले BCI के नाम पर सामने आए, जबकि उनसे जुड़े प्रस्ताव या चर्चा सदस्यों के सामने नहीं रखे गए थे।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BCI देश में वकीलों की शीर्ष वैधानिक संस्था है और उसके फैसलों का असर बार, लॉ एजुकेशन और वकीलों से जुड़े नियमन पर पड़ सकता है।

AG और SG को बैठक का एजेंडा नहीं मिलने का दावा

हलफनामे में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया गया है। मनोज कुमार के मुताबिक, एडवोकेट्स एक्ट के तहत अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल BCI के पदेन सदस्य हैं। इसके बावजूद उन्हें कई बैठकों के नोटिस और एजेंडा समय पर नहीं भेजे गए।

मनोज कुमार का कहना है कि उन्होंने यह मुद्दा BCI चेयरमैन के सामने उठाया था। उन्हें भरोसा दिया गया था कि आगे की बैठकों के लिए दोनों लॉ ऑफिसर्स को नोटिस और एजेंडा उपलब्ध कराया जाएगा। हालांकि, उनके मुताबिक बाद में भी यही स्थिति जारी रही।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट की इसी महीने की शुरुआत में हुई सुनवाई के संदर्भ में भी सामने आया है। कोर्ट ने कहा था कि नई BCI के गठन तक मनन कुमार मिश्रा का पद पर बने रहना रोजमर्रा के कामकाज के लिए प्रो-टेम व्यवस्था के तौर पर देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने नीतिगत महत्व वाले मामलों में अटॉर्नी जनरल को शामिल करने की बात भी कही थी।

PEARL-FIRST ट्रस्ट और AIBE की कमाई पर भी सवाल

मनोज कुमार ने BCI से जुड़े PEARL-FIRST ट्रस्ट के गठन और संचालन पर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, बार-बार मांग के बावजूद उन्हें काफी समय तक ट्रस्ट की मूल डीड उपलब्ध नहीं कराई गई।

उन्होंने 2020 की ट्रस्ट डीड का अध्ययन करने के बाद दावा किया कि इसमें कुछ लोगों को स्थायी मैनेजिंग ट्रस्टी बनाए जाने का प्रावधान है। यानी BCI की सदस्यता खत्म होने के बाद भी कुछ लोग ट्रस्टी बने रह सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी 2 सितंबर की सुनवाई में ऐसे प्रावधानों पर सवाल उठाए थे, जिनके तहत BCI पदाधिकारियों को अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी स्थायी ट्रस्टी बने रहने की अनुमति मिल सकती थी।

AIBE यानी All India Bar Examination से जुड़ी वित्तीय व्यवस्था पर भी हलफनामे में सवाल उठाया गया है। मनोज कुमार ने पूछा है कि एडवोकेट्स एक्ट या उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत किस अधिकार से AIBE से होने वाली आय को किसी अलग ट्रस्ट में जमा या ट्रांसफर किया जा सकता है।

उन्होंने AIBE की फीस से जुड़े खातों, BCI और PEARL-FIRST के बीच हुए ट्रांसफर, परीक्षा कराने वाली एजेंसियों और वेंडर्स को किए गए भुगतान, अलग-अलग परीक्षाओं से हुई अतिरिक्त आय और उसके इस्तेमाल का पूरा विवरण मांगा है।

मनन कुमार मिश्रा के पांच साल के कार्यकाल पर भी सवाल

हलफनामे में BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पांच साल के कार्यकाल की वैधानिकता पर भी सवाल उठाया गया है। मनोज कुमार ने BCI Rules के Chapter I, Part II के Rule 12(2) का हवाला दिया है। उनके अनुसार, इस नियम में चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के लिए दो साल का कार्यकाल या सदस्यता खत्म होने तक का प्रावधान है।

दूसरी ओर, 21 अप्रैल 2025 के गैजेट नोटिफिकेशन में मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया है। मनोज कुमार ने दोनों प्रावधानों के बीच अंतर को स्पष्ट विसंगति बताते हुए इसके कानूनी आधार की जांच की मांग की है।

यह पूरा मामला Yogamaya MG v. Union of India and others, W.P. (C) No. 1092/2026 से जुड़ा है। मनोज कुमार की ओर से जवाबी हलफनामा अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड बीजू पी. रमन के जरिए दाखिल किया गया है।

फिलहाल, हलफनामे में लगाए गए ये आरोप और उठाए गए सवाल न्यायिक विचार के दायरे में हैं। सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही और संबंधित पक्षों के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि BCI की निर्णय प्रक्रिया, ट्रस्ट की व्यवस्था और चेयरमैन के कार्यकाल को लेकर उठाए गए इन सवालों पर अदालत का रुख क्या रहता है।