नोएडा के मजदूर प्रदर्शन से जुड़े एक छात्र की NSA के तहत हिरासत का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। खास बात यह रही कि मामला ऐसी पीठ के सामने सूचीबद्ध हुआ, जिसके नियमित रोस्टर में Habeas Corpus और Preventive Detention से जुड़े मामले शामिल नहीं बताए गए हैं। इसी वजह से अब सुनवाई की लिस्टिंग और कनेक्टेड मामलों को लेकर सवाल चर्चा में हैं।
मामले की सुनवाई जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने की। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें छात्र की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने छात्र को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था। यह राशि जिलाधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से वसूल किए जाने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल इस निर्देश पर भी रोक है।
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, मुआवजे पर भी अंतरिम राहत
यह मामला Medha Roopam v. Akriti Chaudhary & Ors., Diary No. 56202/2026 के नाम से दर्ज है। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें छात्र की निवारक हिरासत को रद्द किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लग गई। इसका सीधा असर उस मुआवजे के निर्देश पर भी पड़ा है, जो हाईकोर्ट ने छात्र को देने के लिए कहा था।
यहां NSA यानी National Security Act के तहत की गई हिरासत का सवाल मुख्य है। ऐसे मामलों में अदालत यह देखती है कि निवारक हिरासत के लिए कानून में तय प्रक्रिया और जरूरी शर्तों का पालन हुआ या नहीं।
रोस्टर में दूसरी पीठ, फिर यहां कैसे पहुंचा मामला?
इस सुनवाई ने सबसे ज्यादा ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि 13 जुलाई 2026 से लागू सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में Habeas Corpus और Preventive Detention से जुड़े मामले शुरुआती चार पीठों को सौंपे गए हैं।
इनमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठें शामिल हैं। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ इस श्रेणी के नियमित रोस्टर में नहीं बताई गई है।
यहीं से कनेक्टेड मामलों का सवाल भी सामने आता है। नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कुछ दूसरे मामले पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लंबित हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इसी घटनाक्रम से जुड़ी DM और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएं अलग पीठ के सामने कैसे सूचीबद्ध हुईं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में “any other matters specially assigned” का प्रावधान भी मौजूद है। इसलिए यह संभावना बनी हुई है कि मामले को विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को सौंपा गया हो। उपलब्ध जानकारी में इस विशेष लिस्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन या मुख्य न्यायाधीश की ओर से कोई अलग स्पष्टीकरण दर्ज नहीं है।
नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कई मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में
यह मामला अकेला नहीं है। नोएडा के मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कई दूसरे मामले भी सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित हैं।
केशव आनंद की याचिका में उनके भाई आदित्य आनंद और ऑटो चालक रूपेश रॉय को कोर्ट के सामने पेश करने की मांग की गई थी। दोनों की गिरफ्तारी को भी चुनौती दी गई थी। 8 मई को नोटिस जारी होने के बाद 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के जरिए दोनों को कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई और मामला लंबित रहा।
इसी घटनाक्रम से जुड़ा एक और मामला पत्रकार सत्यम वर्मा का है। उनकी पत्नी ने पति की NSA के तहत preventive detention को चुनौती दी थी। यह याचिका 7 सितंबर को हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले ली गई।
कानून के छात्र योगेश मीणा ने भी नोएडा मजदूर प्रदर्शन से संबंधित अपनी गिरफ्तारी और कथित पुलिस उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह मामला भी जस्टिस नागरत्ना की पीठ के सामने आया था और अभी लंबित है।
सुनवाई के दौरान VC ऑडियो म्यूट, मीडिया एक्सेस पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ा एक अलग मुद्दा भी सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने VC कार्यवाही का ऑडियो म्यूट करने का निर्देश दिया। इसके कारण कोर्ट रिपोर्टर्स के लिए सुनवाई की कार्यवाही सुनना मुश्किल हो गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कोर्ट रिपोर्टर्स को भौतिक रूप से कोर्टरूम में मौजूद रहने की अनुमति नहीं थी। ऐसे में VC ऑडियो उपलब्ध नहीं होने से कार्यवाही तक उनकी पहुंच प्रभावित हुई।
पूरे घटनाक्रम को लेकर दो स्तर पर सवाल सामने आए हैं। पहला, एक ही प्रदर्शन से जुड़े कनेक्टेड मामलों की अलग-अलग पीठों के सामने लिस्टिंग का। दूसरा, सुनवाई की जानकारी तक मीडिया की पहुंच का।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अलग पीठ के सामने लिस्टिंग के पीछे क्या प्रशासनिक कारण था। उपलब्ध सामग्री में इसका कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट में मामलों के प्रशासनिक आवंटन की शक्ति चीफ जस्टिस के पास होती है और रोस्टर से अलग किसी मामले को विशेष रूप से सौंपे जाने की व्यवस्था भी मौजूद है।
इसलिए फिलहाल सबसे अहम तथ्य यही है कि मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने सुनवाई की और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। आगे की सुनवाई में मामले के कानूनी पहलुओं के साथ इसकी लिस्टिंग से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण बने रह सकते हैं।

