OBC क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई अब अहम मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस अर्जी पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को किस तारीख से लागू किया जाए, इस पर स्पष्टीकरण मांगा गया है। केंद्र की सबसे बड़ी चिंता उन भर्तियों और दाखिलों को लेकर है, जो पुराने नियमों के आधार पर पहले ही पूरे हो चुके हैं। सरकार का कहना है कि अगर नए मानदंड को पिछली तारीख से लागू किया गया तो बड़ी संख्या में नियुक्तियों, सर्विस आवंटन, सीनियरिटी, प्रमोशन और शैक्षणिक दाखिलों पर असर पड़ सकता है।
मामले की सुनवाई जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने की। यह मामला OBC-NCL यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के नॉन-क्रीमी लेयर दर्जे से जुड़े नियमों की व्याख्या से संबंधित है।
11 मार्च के फैसले में क्या कहा गया था?
इस पूरे विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च 2026 का फैसला है। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि किसी OBC उम्मीदवार के क्रीमी लेयर स्टेटस का निर्धारण सिर्फ उसके माता-पिता की वेतन आय देखकर नहीं किया जा सकता। इसमें माता-पिता के पद की स्थिति और कैटेगरी को भी ध्यान में रखना होगा।
मामला मूल रूप से 8 अगस्त 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) और 14 अक्टूबर 2004 को जारी स्पष्टीकरण की व्याख्या से जुड़ा है।
1993 के नियमों में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए अलग-अलग कैटेगरी और माता-पिता के पद को महत्व दिया गया था। जहां इनकम या वेल्थ टेस्ट लागू होता है, वहां वेतन और कृषि आय को आय की गणना में शामिल नहीं किया जाता था।
बाद में 2004 के स्पष्टीकरण में कुछ ऐसे मामलों में माता-पिता की सैलरी को भी ध्यान में रखने की बात सामने आई, जहां PSU, बैंक, विश्वविद्यालय और निजी संस्थानों के पदों की सरकारी पदों के साथ समानता तय नहीं की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च के फैसले में कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण 1993 की मूल नीति में ऐसी नई शर्त नहीं जोड़ सकता, जो उसमें मौजूद नहीं थी।
केंद्र को क्यों सता रही है पुरानी भर्तियों और दाखिलों की चिंता?
केंद्र सरकार की मौजूदा अर्जी का फोकस 11 मार्च के फैसले की समीक्षा पर नहीं, बल्कि उसके लागू होने के समय और तरीके पर है।
सरकार का कहना है कि 2016 से 2025 के बीच केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और उनसे जुड़े कार्यालयों में 5.69 लाख से ज्यादा आरक्षित पद भरे गए। इनमें करीब 3.70 लाख OBC पद थे। केंद्र के मुताबिक ये नियुक्तियां 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और उसके बाद जारी निर्देशों के आधार पर की गई थीं।
सरकार की चिंता है कि अगर नए मानदंड को पिछली तारीख से लागू किया गया तो पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं को फिर से खोलने की स्थिति बन सकती है। इसका असर नियुक्तियों के अलावा OBC-NCL स्थिति, सर्विस और कैडर आवंटन, सीनियरिटी तथा प्रमोशन पर भी पड़ सकता है।
केंद्र ने यह भी कहा है कि रेलवे, बैंक, डाक विभाग और अर्धसैनिक संगठनों समेत अलग-अलग विभागों में हुई भर्तियां प्रभावित हो सकती हैं। 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुराने नियमों के तहत हुई भर्तियों को लेकर भी ऐसी ही स्थिति पैदा होने की आशंका जताई गई है।
UPSC CSE-2025 के 958 उम्मीदवारों का मामला भी जुड़ा
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एक अंतरिम मांग भी रखी है। सरकार चाहती है कि UPSC Civil Services Examination 2025 में अनुशंसित 958 उम्मीदवारों का सर्विस आवंटन मौजूदा 8 अगस्त 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के आधार पर पूरा करने की अनुमति दी जाए।
सरकार का कहना है कि सर्विस अलॉटमेंट में देरी होने से इन उम्मीदवारों का फाउंडेशन कोर्स, सालाना ट्रेनिंग और इंडक्शन साइकल प्रभावित हो सकता है।
केंद्र के मुताबिक अगर बाद में स्पष्टीकरण अर्जी पर फैसला उसके पक्ष में आता है, तो फिलहाल होने वाली देरी से पैदा हुआ नुकसान आसानी से पूरा नहीं किया जा सकेगा।
इसी तरह सरकार ने 2012 से सिविल सेवा परीक्षाओं में हुए सर्विस आवंटन को लेकर भी चिंता जताई है। उसका कहना है कि पुराने मामलों को दोबारा खोलने पर पहले से नियुक्त अधिकारियों की सर्विस और कैडर बदलने की स्थिति बन सकती है। सीनियरिटी और प्रमोशन पर भी इसका असर पड़ सकता है।
लाखों एडमिशन और उम्मीदवारों के अधिकार पर भी असर की चिंता
केंद्र ने उच्च शिक्षण संस्थानों में हुए दाखिलों को लेकर भी अपना पक्ष रखा है। सरकार के अनुसार 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत OBC क्रीमी लेयर मानदंड के आधार पर 2012 से लाखों दाखिले हुए हैं।
सरकार को आशंका है कि अगर नए मानदंड को पिछली तारीख से लागू किया गया तो ऐसे एडमिशन भी सवालों के घेरे में आ सकते हैं। खासकर उन संस्थानों में जहां अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमरेरी सीटों की व्यवस्था नहीं है।
केंद्र ने यह भी कहा कि पुराने मामलों को दोबारा खोलने से उन लोगों पर असर पड़ सकता है, जो मूल मामले में पक्षकार नहीं थे। सरकार का कहना है कि ऐसे लोगों ने उस समय लागू नियमों और प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी या दाखिला हासिल किया था।
इसके अलावा, उन उम्मीदवारों का मुद्दा भी उठाया गया है जो 11 मार्च 2026 को पहले से किसी परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में शामिल थे। केंद्र चाहता है कि उनके मामलों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की जाए।
इसी वजह से सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 11 मार्च के फैसले को पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों, सर्विस या कैडर आवंटन, सीनियरिटी और दाखिलों पर पिछली तारीख से लागू न किया जाए।
अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत का आने वाला आदेश यह स्पष्ट कर सकता है कि 11 मार्च के फैसले का प्रभाव पहले से पूरी हो चुकी प्रक्रियाओं पर किस तरह पड़ेगा। मामला Union of India v. Rohith Nathan and Anr. के नाम से दर्ज है।


