BNSS लागू होने के बाद आरोपी को सुने बिना नहीं लिया जा सकता संज्ञान, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा स्पेशल कोर्ट का आदेश?

BNSS लागू होने के बाद आरोपी को सुने बिना नहीं लिया जा सकता संज्ञान, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा स्पेशल कोर्ट का आदेश?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS लागू होने के बाद अदालतों में आपराधिक मामलों की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा है कि अगर मजिस्ट्रेट ने BNSS लागू होने के बाद न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए किसी मामले में प्रथम दृष्टया अपराध पाया और संज्ञान लिया, तो उससे पहले आरोपी को सुनना जरूरी है। यह प्रक्रिया BNSS की धारा 223 के तहत आवश्यक है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें स्पेशल जज ने आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला मानते हुए संज्ञान लिया था।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला Umar and Anr v State of Uttar Pradesh & Anr मामले में सुनाया। हालांकि कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। आदेश को केवल उस हिस्से तक बदला गया है, जहां अदालत ने प्रथम दृष्टया अपराध पाए जाने के बाद संज्ञान लिया था।

2022 की FIR से 2026 के आदेश तक ऐसे आगे बढ़ा मामला

इस मामले की शुरुआत 7 जून 2022 को दर्ज FIR से हुई थी। इसके बाद पुलिस ने 6 अगस्त 2022 को क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। शिकायतकर्ता ने इसका विरोध करते हुए 14 अक्टूबर 2022 को प्रोटेस्ट याचिका दायर की।

29 नवंबर 2022 को अदालत ने आगे की जांच का निर्देश दिया। इसके बाद 14 फरवरी 2023 को दूसरी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हुई। 28 अप्रैल 2023 को फिर एक प्रोटेस्ट याचिका सामने आई।

मामले में शिकायत पर 11 अक्टूबर 2023 को विचार किया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयान 6 मार्च 2024 को दर्ज किए गए।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इसके बाद मामला लंबे समय तक लंबित रहा। आखिरकार 3 जून 2026 को आजमगढ़ के स्पेशल जज, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे थे, ने प्रथम दृष्टया अपराध पाए जाने की बात कही और आरोपी के खिलाफ आगे की कार्रवाई का आदेश दिया।

यहीं से कानूनी विवाद का अगला चरण शुरू हुआ।

असली सवाल: संज्ञान कब लिया गया?

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि इस मामले में संज्ञान BNSS लागू होने से पहले लिया गया था या उसके बाद।

BNSS देश में 1 जुलाई 2024 से लागू हुई। आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने दलील दी कि 3 जून 2026 का आदेश ही वह चरण था, जब अदालत ने पहली बार न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए प्रथम दृष्टया अपराध पाया और संज्ञान लिया।

उन्होंने Parvinder Singh v Directorate of Enforcement मामले का हवाला देते हुए कहा कि BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लेने से पहले आरोपी को अपनी बात रखने का अवसर देना कानूनी रूप से जरूरी है।

दूसरी तरफ शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद वसीम कादरी ने तर्क दिया कि संज्ञान के लिए अलग से कोई औपचारिक आदेश जरूरी नहीं है। उनके मुताबिक, शिकायत अदालत के सामने आने और प्रक्रिया आगे बढ़ने के समय ही संज्ञान लिया हुआ माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बताई ‘संज्ञान’ की असली कसौटी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संज्ञान कोई ऐसा शब्द नहीं है जिसका हर मामले में एक ही तय अर्थ हो। इसका निर्धारण मामले की कानूनी प्रक्रिया और अदालत द्वारा उठाए गए कदमों के आधार पर किया जाता है।

पीठ ने CREF Finance Ltd. v Shri Shanti Homes (P) Ltd. और Junaid v State of Uttar Pradesh जैसे मामलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि पुलिस रिपोर्ट मिलने के बाद मजिस्ट्रेट के पास कई विकल्प होते हैं। वह पुलिस की रिपोर्ट स्वीकार कर आगे कार्रवाई न करने का फैसला कर सकता है। वह पुलिस की राय से अलग जाकर अपराध का संज्ञान लेकर समन जारी कर सकता है। या फिर मूल शिकायत के आधार पर संज्ञान लेते हुए शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज कर सकता है।

इस मामले में अदालत ने पाया कि पहले के चरण में कोर्ट ने खुद जांच आगे बढ़ाने के बजाय शिकायतकर्ता से CrPC की धारा 200 के तहत साक्ष्य पेश करने को कहा था। शिकायतकर्ता, उसके पति और एक डॉक्टर के बयान भी दर्ज किए गए।

इसलिए उस समय अदालत ने अभी संज्ञान नहीं लिया था। असली न्यायिक विवेक बाद के चरण में इस्तेमाल हुआ।

3 जून 2026 का आदेश क्यों बदला गया?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आदेशों की तुलना करने के बाद माना कि 3 जून 2026 का आदेश ही वह चरण था, जब अदालत ने प्रथम दृष्टया अपराध पाया और न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए संज्ञान लिया।

यहीं BNSS की धारा 223 लागू होती है। कोर्ट के मुताबिक, संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून 2026 के आदेश को उस हिस्से तक रद्द कर दिया, जहां प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने और संज्ञान लेने की बात थी। हालांकि, अदालत ने केवल समन जारी करने की प्रक्रिया को बरकरार रखा।

आरोपी को एक महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है। उस समय, या यदि शिकायतकर्ता अथवा उसका वकील मौजूद नहीं है तो किसी अन्य उपयुक्त दिन, मामले पर सुनवाई कर उचित आदेश दिया जाएगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल आरोपों या उनकी मेरिट पर कोई फैसला नहीं दिया है। अदालत का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर है कि BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लेने की प्रक्रिया में आरोपी को सुनने का अधिकार कब और कैसे लागू होगा।

इस फैसले से आपराधिक मामलों में पुराने CrPC और नए BNSS के बीच संक्रमण के दौरान संज्ञान की तारीख तय करने को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक कसौटी सामने आती है।

Case: Umar and Anr v State of Uttar Pradesh & Anr