नियुक्ति में गड़बड़ी मिली तो भी सीधे नहीं घटा सकते कर्मचारी की सैलरी! राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

नियुक्ति में गड़बड़ी मिली तो भी सीधे नहीं घटा सकते कर्मचारी की सैलरी! राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के वेतन और सेवा अधिकारों से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर किसी कर्मचारी की शुरुआती नियुक्ति में अनियमितता पाई भी जाती है, तब भी उसका नियमित वेतनमान अचानक कम नहीं किया जा सकता। वेतन घटाने से पहले कर्मचारी को नोटिस देना और उसका पक्ष सुनना जरूरी है। हाईकोर्ट ने बिना सुनवाई के कर्मचारियों का वेतनमान घटाने वाले आदेश को रद्द करने के सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा है।

यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए खास मायने रखता है जिनकी सेवा शर्तों या नियुक्ति को लेकर बाद में कोई आपत्ति सामने आती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक गलती या नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितता का असर कर्मचारी के वेतन पर डालने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करना होगा।

2013 में मिली नियमित नियुक्ति, 2018 में उठी आपत्ति

मामला उन कर्मचारियों का है जो निचली श्रेणी लिपिक के पद पर काम कर रहे थे। शुरुआत में उन्हें हर महीने 12 हजार रुपये का समेकित पारिश्रमिक दिया जाता था। इसके बाद वर्ष 2013 में उन्हें नियमित पदों पर नियुक्त किया गया और नियमित वेतनमान का लाभ मिलने लगा।

कई साल तक कर्मचारी इसी व्यवस्था के तहत काम करते रहे। लेकिन 2018 में हुए लेखा परीक्षण के दौरान उनकी नियुक्तियों को लेकर आपत्ति सामने आई। ऑडिट में कहा गया कि नियमित पदों पर इन कर्मचारियों की नियुक्ति में नियमों का पालन नहीं हुआ था।

इसके बाद संबंधित संस्था ने कर्मचारियों को दिए जा रहे नियमित वेतनमान को वापस ले लिया। उन्हें फिर से 12 हजार रुपये प्रतिमाह के निश्चित पारिश्रमिक पर काम करने का निर्देश दिया गया।

यहीं से विवाद ने कानूनी रूप ले लिया।

वेतन घटाने से पहले नोटिस क्यों जरूरी माना गया?

कर्मचारियों ने वेतनमान कम करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि वेतनमान घटाने से पहले कर्मचारियों को न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया था और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिला था।

इसी आधार पर सिंगल बेंच ने वेतनमान घटाने वाले आदेश को रद्द कर दिया।

संस्था ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की। उसका कहना था कि तत्कालीन प्रबंधक ने जरूरी मंजूरी के बिना कर्मचारियों को नियमित पदों पर नियुक्त कर दिया था। बाद में ऑडिट में यह अनियमितता सामने आई। संस्था के मुताबिक, इस मामले में तत्कालीन प्रबंधक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी हुई और उसे सेवा से हटा दिया गया।

संस्था की दलील हाईकोर्ट में क्यों नहीं चली?

संस्था की ओर से एक अहम तर्क यह था कि कर्मचारियों का वेतन कम करना उनके खिलाफ कोई नया दंड नहीं था। उसका कहना था कि कर्मचारियों को केवल उस स्थिति में वापस लाया गया था, जिसमें वे कथित अनियमित नियुक्ति से पहले थे।

लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की पीठ ने कहा कि कर्मचारी के वेतनमान में कटौती का सीधा असर उसके सेवा अधिकारों और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। ऐसे आदेश से कर्मचारी के खिलाफ प्रतिकूल नागरिक परिणाम पैदा होते हैं।

इसलिए कार्रवाई से पहले कर्मचारी को इसकी जानकारी देना और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?

हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित कर्मचारियों के वेतनमान में कमी करने के आदेश बिना किसी पूर्व सूचना और सुनवाई के जारी किए गए थे। अदालत के मुताबिक, ऐसी प्रक्रिया को कायम नहीं रखा जा सकता।

इसी आधार पर खंडपीठ ने संस्था की अपीलें खारिज कर दीं और सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा। यानी कर्मचारियों का वेतनमान घटाने वाला आदेश रद्द रहेगा।

इस फैसले का सीधा संदेश यह है कि किसी कर्मचारी की नियुक्ति में बाद में अनियमितता सामने आने पर भी प्रशासन को कार्रवाई की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। कर्मचारी की बात सुने बिना उसके वेतन में कटौती नहीं की जा सकती।

आम कर्मचारी के लिहाज से देखें तो यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वेतन केवल मासिक भुगतान नहीं, बल्कि उसकी सेवा शर्तों का अहम हिस्सा होता है। उसमें कमी का असर सीधे कर्मचारी और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने इसी वजह से कार्रवाई से पहले सुनवाई के अधिकार को महत्वपूर्ण माना है।