इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के गुज़ारा-भत्ता से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अगर पति कमाने में सक्षम है, तो वह केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका कारोबार ठीक नहीं चल रहा। अदालत ने ऐसे तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल आर्थिक अक्षमता का दावा करने से पति की कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने यह टिप्पणी पति की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिविजन याचिका खारिज करते हुए की। पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे अपनी पत्नी को हर महीने 3,500 रुपये गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
पति ने कहा- पत्नी खुद मायके में रह रही है, मेरे पास स्थायी कमाई नहीं
मामले में पति की ओर से कई दलीलें दी गईं। उसका कहना था कि पत्नी अपनी इच्छा से और बिना किसी पर्याप्त वजह के अपने माता-पिता के साथ रह रही है। पति ने यह भी कहा कि उसके पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है और वह निर्धारित गुज़ारा-भत्ता देने की स्थिति में नहीं है।
उसने अदालत के सामने यह भी तर्क रखा कि उसकी आय का सही आकलन नहीं किया गया। इसके अलावा, उसका कहना था कि बिना पर्याप्त कारण बताए गुज़ारा-भत्ता आवेदन दाखिल किए जाने की तारीख से ही देने का आदेश कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने इस मामले में CrPC की धारा 125 के उद्देश्य को भी विस्तार से समझाया। कोर्ट के मुताबिक, इस प्रावधान का मकसद ऐसी महिला को आर्थिक सुरक्षा देना है, जिसे परिस्थितियों के कारण अपना वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा हो। गुज़ारा-भत्ता का उद्देश्य केवल किसी तरह का खर्च देना नहीं, बल्कि महिला को सम्मान के साथ जीवन जीने में मदद करना भी है।
कोर्ट ने कहा- पत्नी को बेसहारा छोड़ना कानून का मकसद नहीं
अदालत ने कहा कि अगर कोई महिला वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होती है तो उसके सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ऐसे में उसके पास अपने जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि महिला को इस स्थिति में नहीं पहुंचना चाहिए कि उसे अपने खर्च के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़े या सम्मान के साथ जीवन जीने में परेशानी हो। गुज़ारा-भत्ता इतना होना चाहिए कि वह सम्मानजनक जीवन जी सके और उसे बेसहारा या भिखारी जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
जस्टिस उपाध्याय ने यह भी टिप्पणी की कि कई बार पति यह कहकर भुगतान से बचने की कोशिश करता है कि उसके पास नौकरी नहीं है या कारोबार अच्छा नहीं चल रहा। अदालत ने ऐसे तर्कों को कानूनी जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं माना।
“कमाने की क्षमता है तो जिम्मेदारी से बच नहीं सकते”
हाईकोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्ति की मौजूदा नौकरी या आय ही उसकी आर्थिक क्षमता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती। अगर पति काम करने में सक्षम है, तो वह केवल यह कहकर पत्नी के गुज़ारे की जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता कि फिलहाल उसके पास नियमित नौकरी नहीं है या व्यवसाय से पर्याप्त कमाई नहीं हो रही।
अदालत ने कहा कि पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण का सवाल आने पर पति की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
कोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ‘जसबीर कौर सहगल बनाम जिला जज, देहरादून’ मामले का भी हवाला दिया। इस फैसले के मुताबिक, गुज़ारा-भत्ता तय करते समय अदालत को दोनों पक्षों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति, उनकी जरूरतों, पति की भुगतान करने की क्षमता, उसके उचित खर्च और दूसरी कानूनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखना चाहिए।
हाईकोर्ट ने गुज़ारा-भत्ता को सामाजिक न्याय का एक माध्यम भी बताया।
दहेज की मांग के बाद घर से निकाले जाने का भी रिकॉर्ड
मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट के सामने यह निष्कर्ष भी आया था कि पति ने दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर पत्नी को वैवाहिक घर से निकाल दिया था। अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी खुद अपना खर्च उठाने की स्थिति में नहीं थी।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए पति को आर्थिक सहायता देने के लिए जिम्मेदार माना गया।
हाईकोर्ट ने अंततः 3,500 रुपये प्रति माह के गुज़ारा-भत्ता के आदेश को बरकरार रखा और पति की क्रिमिनल रिविजन याचिका खारिज कर दी।
इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि गुज़ारा-भत्ता तय करते समय अदालत केवल पति की वर्तमान नौकरी या तत्काल आय को नहीं देखती। उसकी कमाने की क्षमता, पत्नी की जरूरत, दोनों पक्षों की परिस्थितियां और संबंधित कानूनी जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
Case Title: Mohammad Kamil vs. State of U.P. and Another, 2026 LiveLaw (AB) 779


