CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन पड़ा भारी, 17 छात्रों-पत्रकारों को कोर्ट से मिली जमानत, पुलिस कार्रवाई पर भी उठे सवाल

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन पड़ा भारी, 17 छात्रों-पत्रकारों को कोर्ट से मिली जमानत, पुलिस कार्रवाई पर भी उठे सवाल

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने के मामले में गिरफ्तार किए गए 17 छात्रों और पत्रकारों को पटियाला हाउस कोर्ट से जमानत मिल गई है। अदालत ने माना कि आरोप गंभीर हैं और प्रदर्शन के दौरान एक पुलिस अधिकारी को चोट भी आई थी। लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपी युवा हैं, उनका कोई आपराधिक इतिहास सामने नहीं आया है और उनके सामने अभी पूरा करियर है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उन्हें राहत दी।

पटियाला हाउस कोर्ट के ड्यूटी JMFC अनिमेष कुमार ने सोमवार रात करीब 9 बजे चार अलग-अलग आदेशों के जरिए आरोपियों को जमानत दी। अदालत ने साफ किया कि शांतिपूर्ण विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट या हमला किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन और पुलिस से झड़प के बीच कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत के सामने मामला केवल प्रदर्शन करने का नहीं था। पुलिस की ओर से पेश रिकॉर्ड और मेडिकल रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को चोट लगने की बात सामने आई। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया।

हालांकि, अदालत ने आरोपियों की उम्र और परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। जज अनिमेष कुमार ने कहा कि आरोपी युवा हैं और ऐसा नहीं लगता कि वे आदतन अपराधी हैं। अदालत ने यह भी कहा कि “उनका पूरा करियर अभी बाकी है।” इसी आधार पर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने का फैसला किया गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन उसकी आड़ में ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारियों पर हमला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

किन धाराओं में दर्ज हुई थी FIR?

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 223 के तहत FIR दर्ज की थी। आरोप था कि प्रदर्शनकारियों ने लोक सेवक की ओर से विधिवत जारी आदेश का उल्लंघन किया।

मामला नई दिल्ली जिले में लागू BNSS की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञा से भी जुड़ा था। इन आदेशों के तहत बिना पूर्व लिखित अनुमति के पांच या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने, जुलूस निकालने, प्रदर्शन करने, पिकेटिंग, धरना और नारेबाजी पर रोक लगाई गई थी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि धारा 132 BNS और धारा 190 BNS को छोड़कर बाकी आरोप जमानत योग्य प्रकृति के हैं। कोर्ट के मुताबिक धारा 132 BNS के तहत अपराध में अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान है।

SIR को लेकर क्यों हो रहा है इतना विवाद?

प्रदर्शन का संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे विवाद से है। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को अनुमति देने के आरोप लगाए थे।

प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की। हिरासत में लिए गए कई लोगों को बाद में छोड़ दिया गया।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर लिए गए कुछ फैसलों को लेकर सामने आई आपत्तियां भी हैं। 23 सितंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार ऐसे फैसलों पर आपत्ति जताई थी, जिन्हें कथित तौर पर उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया था।

Form-6 से वोटर लिस्ट तक, किन फैसलों पर उठे सवाल?

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां कई महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ी थीं। इनमें Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया और वोटर लिस्ट के डेटाबेस तक पहुंच को केंद्रीकृत करने जैसे मामले शामिल थे।

यही मुद्दे अब अदालतों और सार्वजनिक बहस के केंद्र में हैं। आम मतदाता के लिए इन विवादों का सीधा मतलब वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने, नाम में बदलाव या मतदाता के तौर पर पंजीकरण की प्रक्रिया से है।

दिल्ली कोर्ट का मौजूदा आदेश हालांकि इन आरोपों की अंतिम सत्यता तय नहीं करता। अदालत ने फिलहाल गिरफ्तार किए गए 17 छात्रों और पत्रकारों को जमानत दी है। अब आगे की कानूनी प्रक्रिया में आरोपों और मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार होगा।

इस बीच, जमानत का यह फैसला एक महत्वपूर्ण संतुलन भी सामने रखता है। अदालत ने एक तरफ प्रदर्शन और असहमति के अधिकार को स्वीकार किया, तो दूसरी तरफ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना। SIR और चुनाव आयोग से जुड़े विवाद के बीच अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आगे की न्यायिक कार्यवाही में मामले के आरोप किस दिशा में जाते हैं।