शहर में नई कॉलोनी बसती है तो सड़क, पार्क और मकानों की योजना पहले से तैयार रहती है। लेकिन कचरा कहां जमा होगा और बिजली के ट्रांसफॉर्मर कहां लगाए जाएंगे, इसकी जगह कई बार प्लानिंग में ही तय नहीं होती। इसी गंभीर कमी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने टाउन प्लानिंग में जरूरी सुविधाओं के लिए पर्याप्त जगह न छोड़ने के मुद्दे पर अलग से जनहित याचिका (PIL) शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि इसका सीधा संबंध शहरों, कस्बों और कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के स्वस्थ, स्वच्छ और सुरक्षित जीवन से है।
कचरे की जगह तय नहीं, बाद में बढ़ती है परेशानी
मामला उस समय सामने आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच कचरा डंपिंग स्पॉट की सफाई से जुड़ी एक मौजूदा PIL पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से पेश वकील ने टाउन प्लानिंग से जुड़ी एक अहम समस्या अदालत के सामने रखी। बताया गया कि जब किसी शहर, कस्बे या कॉलोनी का लेआउट प्लान तैयार किया जाता है, तब कई बार कचरा जमा करने या उसके कलेक्शन के लिए अलग जगह निर्धारित नहीं की जाती।
बाद में जब कॉलोनी पूरी तरह विकसित हो जाती है, तब कचरा प्रबंधन के लिए उपयुक्त जगह तलाशना मुश्किल हो जाता है। इसका असर सीधे स्थानीय लोगों और पूरे इलाके की व्यवस्था पर पड़ता है।
कोर्ट ने इस मुद्दे को केवल सफाई व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय व्यापक टाउन प्लानिंग का विषय माना। अदालत ने कहा कि इसे अलग से गंभीरता से देखने की जरूरत है।
ट्रांसफॉर्मर के लिए जगह नहीं, सड़क किनारे लगते हैं उपकरण
सुनवाई के दौरान एक दूसरी समस्या भी सामने आई। लेआउट प्लान में बिजली के ट्रांसफॉर्मर के लिए भी पर्याप्त जगह का प्रावधान नहीं किया जाता।
नतीजा यह होता है कि कॉलोनी विकसित होने के बाद ट्रांसफॉर्मर लगाने के लिए सड़क किनारे जगह का इस्तेमाल करना पड़ता है। इससे आवाजाही प्रभावित होती है और लोगों को दूसरी तरह की असुविधाओं का भी सामना करना पड़ता है।
हाईकोर्ट ने इन दोनों मुद्दों को जोड़ते हुए कहा कि टाउन प्लानिंग सिर्फ मकानों और सड़कों का नक्शा तैयार करने तक सीमित नहीं हो सकती। नई कॉलोनी बसाते समय उन सुविधाओं के लिए भी जगह तय करनी होगी, जिनकी जरूरत आगे चलकर लोगों को पड़ेगी।
हाईकोर्ट ने कहा- आज के साथ भविष्य की जरूरत भी देखनी होगी
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने इस पूरे मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एक नई PIL दर्ज करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने रजिस्ट्री को इस मामले को “In Re – Layout Plan Town Planning and Provision of Necessary Amenities” शीर्षक से अलग मामले के रूप में दर्ज करने को कहा है। इसे 16 अक्टूबर को नए केस के तौर पर पेश किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस PIL में शहर, कस्बे या उनके भीतर विकसित होने वाली कॉलोनियों के लेआउट प्लान में जरूरी सुविधाओं और उनके लिए निर्धारित की जाने वाली जगहों से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
कोर्ट ने प्लानिंग अथॉरिटीज को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बात कही। उसके मुताबिक योजना बनाते समय केवल मौजूदा जरूरतों को ध्यान में रखना पर्याप्त नहीं है। बदलते समय के साथ लोगों की जरूरतें कैसे बदलेंगी और भविष्य में किन सुविधाओं की जरूरत पड़ सकती है, इसका अनुमान भी प्लानिंग में शामिल होना चाहिए।
यानी किसी कॉलोनी का नक्शा केवल आज के हिसाब से नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।
कई सरकारी विभाग होंगे मामले में पक्षकार
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को इस स्वतः संज्ञान वाली PIL में कई सरकारी विभागों और संस्थाओं को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।
मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को आवास एवं शहरी नियोजन तथा शहरी विकास विभाग के संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के आवास आयुक्त और मुख्य नगर एवं ग्राम नियोजक को भी पक्षकार बनाया गया है।
इसके अलावा लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, लखनऊ नगर निगम के नगर आयुक्त, उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक और मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक को भी मामले में शामिल किया गया है।
इस मामले का दायरा इसलिए अहम है क्योंकि कोर्ट अब यह देखेगा कि शहरों और कॉलोनियों की योजना बनाते समय जरूरी नागरिक सुविधाओं के लिए जगह तय करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले को 16 अक्टूबर को नए केस के रूप में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। आगे की सुनवाई में यह साफ होगा कि मौजूदा टाउन प्लानिंग व्यवस्था में किन स्तरों पर बदलाव या सुधार की जरूरत है।
Case Title: In Re – Layout Plan Town Planning and Provision of Necessary Amenities


