कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा ऐसी ताकत थी, जिसके बिना सत्ता का समीकरण पूरा करना आसान नहीं था। 2007 में पार्टी ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। आज तस्वीर बिल्कुल उलट है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं है और लोकसभा में भी पार्टी शून्य पर है। कांशीराम ने जिस संगठन को दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का माध्यम बनाया था, वह दो दशक बाद अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बसपा चुनाव क्यों हार रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह संगठनात्मक ताकत कहां चली गई, जिसने कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल दी थी?
कांशीराम ने पहले संगठन बनाया, फिर सत्ता की तरफ बढ़े
बसपा की कहानी समझने के लिए कांशीराम की राजनीति को समझना जरूरी है। उन्होंने सीधे चुनावी राजनीति से शुरुआत नहीं की। पहले सरकारी कर्मचारियों के बीच बामसेफ के जरिए संगठन तैयार किया। इसके बाद डीएस-4 को खड़ा किया और फिर 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनाई।
कांशीराम का मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं था। वे बहुजन समाज में यह राजनीतिक चेतना पैदा करना चाहते थे कि सत्ता में हिस्सेदारी किसी पर एहसान नहीं, बल्कि अधिकार है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को एक राजनीतिक शक्ति में बदलना उनकी रणनीति का केंद्र था।
उन्होंने गठबंधन की राजनीति से भी परहेज नहीं किया। कभी भाजपा के साथ हाथ मिलाया तो कभी मुलायम सिंह यादव के साथ। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने में अहम भूमिका निभाई। वहीं भाजपा के साथ गठबंधन कर मायावती को 1995, 1997 और 2003 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला।
कांशीराम के लिए विचारधारा के साथ सत्ता भी जरूरी थी। उनका मानना था कि सत्ता के बिना सामाजिक बदलाव की राजनीति की ताकत सीमित रह जाएगी।
2007 में आया बसपा का सबसे बड़ा शिखर
1993 से 2007 तक बसपा लगातार अपना प्रभाव बढ़ाती गई। 1993 में पार्टी ने 67 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 28.32 प्रतिशत था। 1996 में भी 67 सीटें मिलीं। 2002 में वोट प्रतिशत घटकर 23.19 प्रतिशत हुआ, लेकिन सीटों की संख्या बढ़कर 98 हो गई।
फिर आया 2007 का विधानसभा चुनाव।
बसपा ने 30.43 प्रतिशत वोट के साथ 206 सीटें जीत लीं और अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। यह पार्टी के इतिहास का सबसे शानदार चुनावी प्रदर्शन था।
इस जीत के पीछे कांशीराम की बनाई सामाजिक और संगठनात्मक जमीन थी। हालांकि वे इस जीत को देख नहीं सके। 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो चुका था। उनकी बनाई राजनीतिक रणनीति और मायावती के नेतृत्व ने मिलकर अगले साल बसपा को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत तक पहुंचाया।
लेकिन यही वह दौर भी था, जिसके बाद पार्टी की राजनीति धीरे-धीरे एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई।
2012 के बाद शुरू हुआ गिरावट का लंबा दौर
2007 की बड़ी जीत के बाद 2012 में बसपा सत्ता से बाहर हो गई। पार्टी की सीटें घटकर 80 रह गईं, हालांकि उसे अभी भी 25.91 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी उस समय तक उसका सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
2014 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर ज्यादा खराब हुई। बसपा ने बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ा और करीब 19.77 प्रतिशत वोट हासिल किए, लेकिन एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 19 सीटों तक सिमट गई। वोट शेयर भी घटकर 22.24 प्रतिशत रह गया।
इसके बाद 2019 में मायावती ने सपा के साथ गठबंधन किया। दोनों दलों के बीच वर्षों पुरानी राजनीतिक दूरी को किनारे रखकर साथ चुनाव लड़ने का फैसला हुआ। बसपा ने उत्तर प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 19.43 प्रतिशत रहा।
लेकिन गठबंधन ज्यादा लंबा नहीं चला। इसके बाद 2022 में बसपा ने अकेले विधानसभा चुनाव लड़ा। इस बार पार्टी का वोट शेयर गिरकर 12.88 प्रतिशत रह गया। 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी। 18 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही और 290 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
2024 के लोकसभा चुनाव में गिरावट और तेज हुई। उत्तर प्रदेश में पार्टी का वोट शेयर करीब 9.4 प्रतिशत रह गया और सीटों की संख्या शून्य रही।
कांशीराम के संगठन से ‘सिर्फ मायावती’ वाली पार्टी तक?
बसपा की मौजूदा स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल संगठन को लेकर है। कांशीराम के दौर में पार्टी में संगठन व्यक्ति से बड़ा था और आंदोलन संगठन से बड़ा। बूथ से लेकर सामाजिक स्तर तक कार्यकर्ताओं को जोड़ने पर जोर था।
समय के साथ यह ढांचा कमजोर होता गया। कांशीराम के साथ काम करने वाले कई पुराने नेता पार्टी से अलग हुए। स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा और रामअचल राजभर जैसे कई प्रभावशाली चेहरे भी बाद में बसपा से बाहर हो गए।
इसके साथ एक और सवाल लगातार बड़ा होता गया—मायावती के बाद कौन?
यही सवाल अब उत्तराधिकार की राजनीति से भी जुड़ गया है। मायावती के भाई आनंद कुमार के परिवार से जुड़े नामों को लेकर पार्टी के भीतर भविष्य की भूमिका की चर्चा होती रही है। आकाश आनंद को कई बार पार्टी से बाहर किया गया और फिर वापस लाया गया। बाद में उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी दी गई। ईशान आनंद को संगठन मजबूत करने की भूमिका में रखा गया, जबकि दीपिका आनंद के लिए भी भविष्य में संगठन में भूमिका की गुंजाइश बताई गई है।
लेकिन उत्तराधिकारी को लेकर बार-बार बदलती तस्वीर ने भी पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं।
2027 से पहले सबसे बड़ी चुनौती: फिर से भरोसा कैसे लौटे?
अब नजर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर है। बसपा न तो इंडिया गठबंधन का हिस्सा है और न ही भाजपा के साथ है। इसके बावजूद उसके राजनीतिक रुख को लेकर विपक्षी दल उस पर सवाल उठाते रहे हैं। खासतौर पर सपा की तरफ से यह नैरेटिव बनाया जाता रहा है कि बसपा के चुनाव मैदान में रहने से गैर-भाजपा वोटों का बंटवारा होता है और इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। बसपा इन आरोपों को खारिज करती है।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पार्टी अपने पुराने वोट बैंक को फिर से चुनावी समर्थन में कैसे बदले। मायावती के पास अभी भी दलित समाज के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार मौजूद है। लेकिन केवल सामाजिक आधार किसी पार्टी को चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होता।
इसके लिए संगठन चाहिए। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता चाहिए। लगातार जनता के बीच मौजूदगी चाहिए। और सबसे अहम, ऐसा राजनीतिक संदेश चाहिए जो मतदाताओं को यह भरोसा दिला सके कि पार्टी सिर्फ अतीत की उपलब्धियों पर नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति के लिए भी तैयार है।
कांशीराम की बसपा ने कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदलने का दावा सिर्फ नारों से नहीं किया था। उसने संगठन बनाया, सामाजिक गठजोड़ खड़े किए और सत्ता तक पहुंच बनाई। आज उसी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह उस पुराने संगठनात्मक मॉडल को फिर खड़ा कर पाएगी?
2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देने वाला अगला बड़ा पड़ाव हो सकता है।


