साइबर फ्रॉड केस में दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती, 10 महीने जेल में रहे युवक को मिली जमानत, IO पर बोला- ‘सिर्फ कागजी कार्रवाई हुई’

साइबर फ्रॉड केस में दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती, 10 महीने जेल में रहे युवक को मिली जमानत, IO पर बोला- ‘सिर्फ कागजी कार्रवाई हुई’

साइबर धोखाधड़ी के एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए 27 वर्षीय विशाल शर्मा को जमानत दे दी है। शर्मा करीब 10 महीने से जेल में था। कोर्ट ने कहा कि केस की अपडेटेड स्टेटस रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि जांच आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ दिखावे के लिए कागजी कार्रवाई की गई। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने यह भी कहा कि पिछली न्यायिक टिप्पणियों के बावजूद जांच में गंभीरता नजर नहीं आई। अदालत के मुताबिक, इतने लंबे समय में भी जांच अधिकारी यानी IO ने मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं की।

Bumble से शुरू हुई बातचीत, ट्रेडिंग ऐप के जरिए निवेश का आरोप

मामला एक साइबर फ्रॉड FIR से जुड़ा है, जिसमें विशाल शर्मा पर भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 318(4), 61(2) और 3(5) के तहत आरोप लगाए गए थे।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता की मुलाकात Bumble ऐप पर ईशा राजपूत नाम की एक महिला से हुई थी। दोनों के बीच बातचीत आगे बढ़ी और बाद में WhatsApp पर संपर्क हुआ। आरोप है कि महिला ने शिकायतकर्ता को CenturyMarket ट्रेडिंग ऐप के जरिए निवेश करने के लिए प्रेरित किया।

शिकायतकर्ता ने शुरुआत में 25 हजार रुपये लगाए। ऐप पर कुछ समय बाद निवेश की रकम बढ़कर करीब 1.90 लाख रुपये दिखाई गई। जब उसने पैसे निकालने की कोशिश की, तो कथित तौर पर उसे बताया गया कि उसका अकाउंट फ्रीज हो गया है। इसके बाद उससे 2,65,965 रुपये और जमा करने को कहा गया।

यहीं शिकायतकर्ता को संदेह हुआ और उसने साइबर क्राइम की शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस ने 1.40 लाख रुपये का लिंक शर्मा के खाते से जोड़ा

जांच के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि कथित धोखाधड़ी से जुड़ी रकम में से करीब 1.40 लाख रुपये विशाल शर्मा के बैंक अकाउंट में पहुंचे।

शर्मा की ओर से इस आरोप का अलग पक्ष रखा गया। बचाव पक्ष ने कहा कि यह लेनदेन किसी साइबर धोखाधड़ी का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक वास्तविक बिजनेस डील से संबंधित था, जो बाद में सफल नहीं हो सकी।

वकील के मुताबिक, जिस बैंक खाते में रकम ट्रांसफर की गई थी, वह अभिषेक नाम के व्यक्ति की सलाह पर खोला गया था। शर्मा उस समय अभिषेक के साथ कारोबारी लेनदेन कर रहा था।

पुलिस ने जमानत का विरोध किया। जांच अभी जारी होने और जयपुर में साइबर धोखाधड़ी के एक अन्य मामले में शर्मा की कथित संलिप्तता का हवाला भी दिया गया।

10 महीने में न सह-आरोपी गिरफ्तार हुए, न अहम डिजिटल सबूत मिले

हाईकोर्ट ने जांच की प्रगति को बेहद महत्वपूर्ण माना। अदालत ने पाया कि अभियोजन की कहानी में सह-आरोपी बताए गए अभिषेक और ईशा राजपूत अभी तक गिरफ्तार नहीं किए गए थे।

रिकॉर्ड के मुताबिक, IO ने दिसंबर 2025 में अभिषेक को जांच में शामिल होने के लिए नोटिस भेजा था। इसके बाद उसके खिलाफ कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। उसके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट भी बाद में वापस ले लिए गए। इसके बाद दोबारा नोटिस दिए जाने के बावजूद वह जांच में शामिल नहीं हुआ, लेकिन पुलिस ने आगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

ईशा राजपूत के मामले में भी जांच की स्थिति पर कोर्ट ने सवाल उठाया। Bumble से उसकी जानकारी हासिल करने के लिए पुलिस ने नोटिस भेजे थे, लेकिन कंपनी की ओर से कई नोटिसों का जवाब नहीं मिला। इसके बावजूद IO ने ईशा का पता लगाने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।

कोर्ट ने यहां तक कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘ईशा राजपूत’ एक फर्जी नाम हो सकता है।

कोर्ट बोला- लंबे समय तक जेल में रखने के लिए कागजी कार्रवाई काफी नहीं

जस्टिस गिरीश कथपालिया ने अपडेटेड स्टेटस रिपोर्ट पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि जांच अधिकारी ने केवल कागजी कार्रवाई पूरी की है, ताकि मौजूदा आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखने को किसी तरह उचित ठहराया जा सके।

अदालत ने यह भी नोट किया कि करीब 10 महीने की जांच के बावजूद शिकायतकर्ता और ईशा राजपूत के बीच हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट और कॉल लॉग तक हासिल नहीं किए गए।

कोर्ट के मुताबिक, इतनी लंबी अवधि बीतने के बाद भी अगर जांच में वास्तविक प्रगति नहीं हुई है, तो आरोपी को जेल में बनाए रखना उचित नहीं होगा। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील में भी दम पाया कि जांच के नाम पर सिर्फ कागजी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी, जबकि गंभीर जांच के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने विशाल शर्मा की जमानत मंजूर कर ली। उन्हें ₹50,000 के पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही राशि की एक जमानत देने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया गया।

Case Title: Vishal Sharma v. State NCT of Delhi