नौकरी और कॉलेज के फॉर्म में जाति बताना अनिवार्य नहीं! मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, निजी संस्थानों को दी अहम नसीहत

नौकरी और कॉलेज के फॉर्म में जाति बताना अनिवार्य नहीं! मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, निजी संस्थानों को दी अहम नसीहत

नौकरी के लिए आवेदन करते समय या कॉलेज में एडमिशन लेते वक्त अगर आपसे जाति की जानकारी अनिवार्य रूप से मांगी जाती है, तो मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला आपके लिए अहम है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तमिलनाडु में निजी कंपनियां और निजी शिक्षण संस्थान अपने आवेदन फॉर्म में उम्मीदवारों से जाति का विवरण अनिवार्य रूप से नहीं मांग सकते। जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी जाति या समुदाय की जानकारी देने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि किसी विशेष कानूनी प्रावधान के तहत इसकी जरूरत न हो। अदालत ने राज्य सरकार को इस संबंध में पहले से जारी आदेश का व्यापक प्रचार करने का निर्देश भी दिया है, ताकि लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी मिल सके।

नौकरी और एडमिशन के फॉर्म में जाति पर कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला निजी क्षेत्र में नौकरी पाने वाले उम्मीदवारों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने साफ किया कि तमिलनाडु में निजी नियोक्ता और निजी शैक्षणिक संस्थान आवेदन फॉर्म में जाति की जानकारी को अनिवार्य नहीं बना सकते।

यह मामला एन. विक्रमन बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि राज्य सरकार ऐसे नियम और नियामक उपाय सुनिश्चित करे, जिनसे निजी संस्थानों में जाति के आधार पर होने वाले संभावित भेदभाव को रोका जा सके।

याचिका में कहा गया था कि निजी कंपनियों और शिक्षण संस्थानों को जाति या समुदाय की जानकारी तभी अनिवार्य रूप से मांगने की अनुमति होनी चाहिए, जब किसी कानून में इसकी स्पष्ट जरूरत हो।

इस मामले का व्यावहारिक महत्व इसलिए है क्योंकि नौकरी और शिक्षा के लिए आवेदन करते समय फॉर्म में मांगी गई जानकारी उम्मीदवारों के लिए कई बार चिंता का विषय बन जाती है। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि तमिलनाडु में निजी संस्थान सामान्य आवेदन प्रक्रिया के तहत जाति का विवरण अनिवार्य नहीं कर सकते।

साल 2000 के सरकारी आदेश में भी दिया गया था यह अधिकार

सुनवाई के दौरान अदालत ने तमिलनाडु सरकार के 31 जुलाई 2000 के सरकारी आदेश, G.O.Ms.No.205, का उल्लेख किया। इस आदेश का उद्देश्य जाति और धर्म की पहचान से जुड़े अनावश्यक दबाव को कम करना और भेदभाव रहित समाज की दिशा में कदम बढ़ाना था।

सरकारी आदेश के मुताबिक, जो लोग अपने सेकेंडरी स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट या ट्रांसफर सर्टिफिकेट में धर्म अथवा जाति का उल्लेख नहीं करना चाहते, उन्हें संबंधित कॉलम में ‘कोई धर्म नहीं’ या ‘कोई जाति नहीं’ लिखने की अनुमति दी जा सकती है। वे चाहें तो इन कॉलम को खाली भी छोड़ सकते हैं।

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि स्कूल या कॉलेज में एडमिशन लेते समय माता-पिता अथवा अभिभावकों पर जाति और धर्म बताने के लिए दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए, खासकर तब जब वे इसका खुलासा नहीं करना चाहते या ऐसा करने में असमर्थ हों।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि इस सरकारी आदेश का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा है। इसलिए उन्होंने अदालत से राज्य सरकार को जरूरी निर्देश जारी करने की मांग की थी।

ट्रांसफर सर्टिफिकेट में जाति लिखने पर भी अदालत ने रखी अहम बात

मामले में ट्रांसफर सर्टिफिकेट पर जाति और धर्म दर्ज करने का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि शैक्षणिक संस्थानों को विद्यार्थियों के ट्रांसफर सर्टिफिकेट में जाति का उल्लेख नहीं करना चाहिए।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सभी मामलों में जाति का उल्लेख पूरी तरह प्रतिबंधित करने का अनिवार्य निर्देश जारी करना उचित नहीं होगा, क्योंकि कुछ लोग अपनी इच्छा से यह जानकारी देना चाह सकते हैं।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जाति का खुलासा नहीं करना चाहता, तो तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2000 के आदेश के तहत उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

यानी अदालत ने व्यक्ति की पसंद और उसके अधिकार को महत्व दिया। किसी को अपनी जाति या धर्म बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जबकि अपनी इच्छा से जानकारी देने का विकल्प बना रह सकता है।

सरकार को आदेश का प्रचार करने का निर्देश, निजी संस्थानों के लिए भी स्पष्ट संदेश

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह वर्ष 2000 के सरकारी आदेश का व्यापक प्रचार-प्रसार करे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विद्यार्थी, अभिभावक और अन्य नागरिक अपने अधिकारों से परिचित हों और जाति या धर्म का खुलासा करने के लिए उन पर अनावश्यक दबाव न बनाया जाए।

अदालत ने निजी शिक्षण संस्थानों और निजी नियोक्ताओं को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिया कि वे आवेदन फॉर्म में जाति का विवरण अनिवार्य रूप से नहीं मांग सकते।

आम लोगों के लिहाज से यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि शिक्षा और रोजगार तक पहुंच में किसी व्यक्ति को अपनी पहचान उजागर करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही, भेदभाव से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियमों और उनके पालन की जरूरत भी बनी रहती है।

फिलहाल, यह फैसला तमिलनाडु के संदर्भ में दिया गया है। इसे पूरे देश में सभी निजी संस्थानों पर लागू होने वाला एक समान आदेश नहीं समझना चाहिए। अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य सरकार के मौजूदा आदेश को प्रभावी ढंग से लागू करने और निजी संस्थानों में जाति का विवरण अनिवार्य नहीं बनाने की बात स्पष्ट की है।