दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और भारत निर्वाचन आयोग के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। रविवार, 11 अक्टूबर को हुई विशेष सुनवाई में अदालत ने निर्देश दिया कि कानून में तय प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी को हिरासत में नहीं लिया जाए। साथ ही, शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करने, मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने तथा शहर में इंटरनेट सुविधा बहाल करने पर जोर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी वकील को उसके पेशेवर काम से नहीं रोका जाना चाहिए। यह सुनवाई ऐसे समय हुई, जब प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर हिरासत, पुलिस कार्रवाई, मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों और इंटरनेट बंद होने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर कोर्ट की दोटूक टिप्पणी
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने खास तौर पर उन शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों का जिक्र किया, जो उन क्षेत्रों से बाहर एकत्र हुए थे, जहां निषेधाज्ञा लागू थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि पुलिस जंतर-मंतर से करीब चार किलोमीटर के दायरे के बाहर मौजूद लोगों को भी हिरासत में ले रही थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं बंद थीं और सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के बावजूद कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए।
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने भी अदालत को बताया कि शनिवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने कहा कि मामला केवल वकीलों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने के अधिकार का है।
अदालत के सामने यह सवाल भी उठा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस की कार्रवाई किस सीमा तक उचित मानी जा सकती है। कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस बात की भी जांच करना चाहता है कि पुलिस की कार्यप्रणाली संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।
मेट्रो और इंटरनेट पर पाबंदी को लेकर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए। सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर वास्तविक और जरूरी स्थिति होने पर ही संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अनुरूप उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
अदालत ने शहर में लोगों की आवाजाही को भी ट्रैफिक नियमों के अधीन सामान्य रखने का निर्देश दिया। साथ ही, बैरिकेडिंग के फैसलों की तुरंत समीक्षा करने को कहा, ताकि कानून-व्यवस्था और यातायात की जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
कोर्ट ने इंटरनेट सेवाएं बिना रुकावट जारी रखने पर भी जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आसपास BNSS की धारा 163 लागू होने से संबंधित सूचना बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया गया, यदि उन्हें पहले से नहीं हटाया गया हो। अदालत का कहना था कि लोगों के मन में न्याय तक पहुंचने को लेकर कोई आशंका नहीं रहनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि दिल्ली मेट्रो पूरी तरह काम कर रही है और शनिवार रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट कनेक्शन बहाल कर दिया गया है।
हालांकि, मेट्रो सेवाओं को लेकर पेश आंकड़ों में यह भी बताया गया कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 47 स्टेशन बंद या सीमित किए गए थे। तुषार मेहता के मुताबिक, 10 अक्टूबर को तय शेड्यूल के अनुसार 4,750 ट्रेनें चलाई गईं।
इससे पहले अदालत ने 9 अक्टूबर को जारी अपने आदेश में दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने संबंधी अधिसूचना पर दोबारा विचार करने को कहा था। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि समीक्षा के बाद लिए गए फैसले को सार्वजनिक किया जाए, ताकि यात्रियों को अनावश्यक परेशानी न हो।
वकीलों और प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार पर गंभीर सवाल
सुनवाई में कई वरिष्ठ वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई पर चिंता जताई। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने वीडियो का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि निहत्थे लोगों के साथ मारपीट की गई और सुप्रीम कोर्ट के आसपास भी निषेधाज्ञा लागू कर दी गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि हालात ऐसे हो गए थे कि वकीलों को भी शहर में आने-जाने और अपना काम करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने अदालत से कहा कि न्याय तक पहुंच का मतलब केवल अदालत तक पहुंचना नहीं है। इसमें वकीलों का अपने मुवक्किलों से मिलना और पुलिस थानों में उन्हें कानूनी सहायता देना भी शामिल है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस थानों में वकीलों के साथ मारपीट की गई और उन्हें FIR दर्ज करने की धमकी दी गई।
एक महिला वकील ने भी अदालत को बताया कि वह करीब 150 अन्य वकीलों के साथ शांतिपूर्वक मार्च कर रही थीं। उनके अनुसार, इस दौरान चार लोगों को पकड़कर जेल वैन में ले जाया गया। उन्होंने पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट करने वाले नेम बैज नहीं होने की बात भी उठाई।
वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों का मुद्दा उठाया। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 19(2) को अधिकारों पर पूरी तरह रोक लगाने के प्रावधान के रूप में नहीं, बल्कि उचित नियमन के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों, दोनों के जीवन और स्वतंत्रता का समान महत्व है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी किसी अधिकारी को कानून से ऊपर नहीं रखती।
7,000 लोगों की हिरासत का दावा, अवमानना मामले में मांगा जवाब
वरिष्ठ अधिवक्ता और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में अंतरिम राहत की मांग की। उन्होंने दावा किया कि करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें थीं और सरकार की ओर से स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जा रहे थे। उन्होंने दिल्ली में 45 हिरासत केंद्र बनाए जाने, विपक्षी नेताओं को हिरासत में लेने और कुछ सांसदों को उनके घरों में रोके जाने के आरोप भी लगाए।
मेनका गुरुस्वामी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए हिरासत में लिए गए लोगों के मामले को उठाया। उन्होंने सवाल किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों पर इस तरह की पाबंदियां किस आधार पर लगाई जा सकती हैं। हालांकि, हिरासत से संबंधित ये आंकड़े और आरोप याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में रखे गए दावे हैं।
इस मामले में एक अवमानना याचिका भी दाखिल की गई है। इसमें आरोप है कि अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का पालन नहीं किया और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियां जारी रखीं।
अदालत ने कथित अवमानना के लिए जिम्मेदार बताए गए पक्षों को नोटिस जारी किया है। उन्हें जवाबी हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और मामले से जुड़ी अन्य याचिकाओं को भी साथ में सुना जाएगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उन्हें रिहा कर दिया गया है, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की उपयोगिता पर सवाल उठता है। उन्होंने मेट्रो संचालन को लेकर भी सरकार का पक्ष रखा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह पुलिस की कार्यप्रणाली, नागरिकों के अधिकारों और पहले के आदेशों के अनुपालन से जुड़े सवालों पर सुनवाई जारी रखेगा। अदालत ने निर्देश दिया कि मेट्रो सेवाएं सामान्य शेड्यूल के अनुसार चलें, इंटरनेट सुविधा बहाल रहे और किसी वकील को उसके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन से न रोका जाए।
आम लोगों के लिए क्यों अहम है यह मामला?
दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं केवल सुविधाएं नहीं हैं। इन पर पाबंदी का असर नौकरीपेशा लोगों, छात्रों, कारोबारियों, यात्रियों और कानूनी सहायता लेने वाले नागरिकों पर भी पड़ सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई इसी संतुलन से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। अदालत ने अंतरिम निर्देश देकर नागरिकों की आवाजाही, संचार सेवाओं और कानूनी सहायता तक पहुंच को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। अब संबंधित अधिकारियों के जवाब और अनुपालन रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही होगी।




