दिल्ली पुलिस पर वकीलों से ज्यादती का आरोप, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर उठे गंभीर सवाल

दिल्ली पुलिस पर वकीलों से ज्यादती का आरोप, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर उठे गंभीर सवाल

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित कार्रवाई को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। ‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ (LAFC) और उसके चार सदस्यों की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 10 और 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने वकीलों के साथ बदसलूकी की, उन्हें कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया और जरूरी कानूनी व मेडिकल सहायता भी नहीं दी। याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने और पुलिस की जवाबदेही तय करने की मांग की है। हालांकि, ये सभी आरोप याचिका में लगाए गए हैं और उन पर अदालत का फैसला आना बाकी है।

10 और 11 अक्टूबर के प्रदर्शनों में क्या हुआ? पुलिस पर लगे गंभीर आरोप

याचिका के मुताबिक, दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान केवल वकीलों ही नहीं, बल्कि महिलाओं, नाबालिगों, पत्रकारों और आम राहगीरों के साथ भी कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया। आरोप है कि कुछ लोगों के साथ मारपीट की गई और उन्हें बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि हिरासत में लिए गए लोगों को समय पर कानूनी सहायता और मेडिकल सुविधाएं नहीं मिलीं। इसके अलावा, कुछ पुलिसकर्मियों पर अपनी पहचान बताने वाले पहचान-पत्र नहीं दिखाने का भी आरोप लगाया गया है।

याचिका में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने के फैसले को भी चुनौती दी गई है। इस मुद्दे का आम लोगों से सीधा संबंध है, क्योंकि इंटरनेट बंद होने से संवाद, डिजिटल सेवाओं और जरूरी सूचनाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। हालांकि, याचिका में इंटरनेट बंद करने की परिस्थितियों और उसकी कानूनी वैधता की जांच की मांग की गई है।

वकीलों के साथ कथित मारपीट और हिरासत का मामला क्या है?

याचिका में वकील फिदेल टॉम के साथ कथित दुर्व्यवहार का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। आरोप है कि उन्हें संजय कॉलोनी पुलिस स्टेशन में हिरासत के दौरान पीटा गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस दौरान उन्हें समय पर कानूनी मदद और मेडिकल सहायता भी उपलब्ध नहीं कराई गई।

इसके अलावा, याचिका में दावा किया गया है कि 10 अक्टूबर 2026 को शांतिपूर्ण मार्च के दौरान वकील सुमिता हजारिका, अन्ना ओमेन और ऐनी मैथ्यू के साथ पुलिसकर्मियों ने बदसलूकी की और उन्हें जबरन हिरासत में लिया।

इस मामले में ‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ याचिकाकर्ता है। संगठन की संयोजक सीनियर एडवोकेट अंजना प्रकाश इसका प्रतिनिधित्व कर रही हैं। याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्योली के माध्यम से दायर की गई है।

संविधान के किन अधिकारों का दिया गया हवाला?

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 और 22 का हवाला दिया गया है। ये प्रावधान समानता, भेदभाव से सुरक्षा, अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा जैसे अधिकारों, जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी व हिरासत से जुड़े संरक्षणों से संबंधित हैं।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले ‘डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ में निर्धारित सुरक्षा उपायों का भी उल्लेख किया है। इस फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए थे।

इस मामले का व्यापक महत्व इसलिए है, क्योंकि पुलिस की कार्रवाई और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। किसी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया, मेडिकल सहायता और अपने बचाव के लिए वकील तक पहुंच जैसे मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट से क्या-क्या मांग की गई?

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि कथित पुलिस ज्यादती की स्वतंत्र जांच कराई जाए। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि जांच समय-सीमा के भीतर पूरी हो और उसकी निगरानी अदालत करे। साथ ही, घटनास्थल और पुलिस थानों से जुड़े सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य महत्वपूर्ण सबूतों को तुरंत सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है।

इसके अलावा, हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करने और हिरासत में लिए गए लोगों, महिलाओं तथा नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने की मांग की गई है। याचिका में जिम्मेदार पुलिसकर्मियों और संबंधित पर्यवेक्षी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात भी कही गई है।

याचिकाकर्ताओं ने पत्रकारों की सुरक्षा, शांतिपूर्ण सभाओं के दौरान पुलिस की कार्रवाई के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने तथा कथित मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजा देने की मांग भी रखी है। इसके साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने या न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने वालों के खिलाफ बदले की कार्रवाई से सुरक्षा देने की मांग की गई है।

फिलहाल, इस पूरे मामले में याचिका में लगाए गए आरोपों और मांगी गई राहतों पर अदालत की प्रतिक्रिया का इंतजार है। आगे की कानूनी कार्यवाही यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि कथित घटनाओं की जांच किस तरह हो और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का उल्लंघन साबित होता है, तो उसके लिए जिम्मेदारी कैसे तय की जाए।