SIR पर विपक्ष को राजनाथ सिंह की दोटूक, बोले- झूठ और दुष्प्रचार से अराजकता फैलाने की कोशिश, EVM पर भी उठाए सवाल

SIR पर विपक्ष को राजनाथ सिंह की दोटूक, बोले- झूठ और दुष्प्रचार से अराजकता फैलाने की कोशिश, EVM पर भी उठाए सवाल

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश में जारी राजनीतिक बहस के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। एक समाचार पत्र में लिखे अपने लेख में उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के कुछ नेता गलत सूचनाओं, भ्रामक आरोपों और भावनात्मक बयानबाजी के जरिए लोगों के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनाथ सिंह ने EVM, SIR और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठाए जा रहे सवालों को इसी राजनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बिना ठोस सबूत के आरोप लगाए जाएं। उनके मुताबिक, संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, ये सभी राजनाथ सिंह के लेख में रखे गए राजनीतिक तर्क और आरोप हैं, जिन पर विपक्ष का पक्ष अलग हो सकता है।

‘पोस्ट-ट्रुथ’ राजनीति का जिक्र कर विपक्ष पर साधा निशाना

राजनाथ सिंह ने अपने लेख की शुरुआत इस विचार से की कि राजनीतिक लड़ाई में कई बार सच्चाई पीछे छूट जाती है। उन्होंने इसे ‘पोस्ट-ट्रुथ’ राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि मौजूदा दौर में तथ्यों और सबूतों के मुकाबले भावनात्मक अपील, भ्रामक प्रचार और आरोपों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है।

रक्षा मंत्री का आरोप है कि विपक्ष के कुछ नेता बार-बार आरोप दोहराकर जनता के बीच भ्रम पैदा करते हैं। उनके मुताबिक, इस तरह की राजनीति से न केवल जनमत प्रभावित होता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी कमजोर हो सकती है।

हालांकि, सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना पर रोक लगाने की वकालत करना नहीं है। उन्होंने माना कि लोकतंत्र में असहमति और बहस की अहम भूमिका होती है। लेकिन उनके अनुसार, आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और उसका इस्तेमाल जानबूझकर अव्यवस्था फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए।

यह बहस आम मतदाता के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का असर जनता के भरोसे और लोकतंत्र में उसकी भागीदारी पर पड़ सकता है।

EVM और SIR पर क्या बोले रक्षा मंत्री?

राजनाथ सिंह ने अपने लेख में विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले तीन प्रमुख मुद्दों का उल्लेख किया। इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM की विश्वसनीयता, मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण और भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल शामिल हैं।

EVM को लेकर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अदालत ने EVM में हेरफेर से जुड़ी आपत्तियों पर विचार किया था और पेपर बैलेट से मतदान की व्यवस्था दोबारा लागू करने की मांग स्वीकार नहीं की थी। सिंह के मुताबिक, ठोस सबूतों के बिना बार-बार संदेह जताना उचित नहीं है।

SIR पर उन्होंने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है। उन्होंने 2025 में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि मतदाता सूची को सही और पूर्ण बनाए रखना निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

इस बहस का सीधा संबंध आम नागरिक के मतदान के अधिकार से है। मतदाता सूची में नाम होना, विवरण सही होना और पात्र मतदाताओं का नाम सूची में शामिल रहना चुनावी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलू हैं। इसलिए SIR के दौरान किसी मतदाता को नाम, पते या पात्रता से जुड़ी परेशानी हो, तो उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत जानकारी लेना और अपनी आपत्ति दर्ज कराना महत्वपूर्ण है।

राजनाथ सिंह का तर्क है कि मतदाता सूची की जांच का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाना है। वहीं, इस प्रक्रिया को लेकर उठने वाली आपत्तियों का समाधान भी जरूरी है, ताकि पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रह जाएं।

चुनाव आयोग की नियुक्ति से लेकर इमरजेंसी तक, कांग्रेस पर भी लगाए आरोप

रक्षा मंत्री ने चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति पर केंद्र सरकार का प्रभाव रहा, जबकि मौजूदा सरकार ने चयन प्रक्रिया को बहु-सदस्यीय समिति के माध्यम से संस्थागत रूप दिया, जिसमें विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं।

अपने लेख में राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के शासनकाल के कुछ ऐतिहासिक फैसलों का भी जिक्र किया। उन्होंने 1951 के पहले संविधान संशोधन और आपातकाल के दौरान किए गए संवैधानिक बदलावों को उदाहरण के तौर पर पेश किया। उनका आरोप था कि उस दौर में संवैधानिक संशोधनों का इस्तेमाल कार्यपालिका की शक्तियां बढ़ाने और न्यायिक समीक्षा को सीमित करने के लिए किया गया।

सिंह ने आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के उल्लंघन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों पर गंभीर असर पड़ा था।

इसके विपरीत, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का बचाव करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 99वें संविधान संशोधन को रद्द किए जाने के फैसले का सम्मान किया गया और उसे पलटने के लिए किसी वैकल्पिक रास्ते का सहारा नहीं लिया गया।

उन्होंने राम मंदिर मामले और अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी जिक्र किया। इसके अलावा, उन्होंने राफेल विवाद और अगस्त 2025 में राहुल गांधी के चीन से जुड़े दावों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी अपने तर्कों के समर्थन में पेश किया।

ये उदाहरण राजनाथ सिंह ने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए दिए हैं। इन मुद्दों पर कांग्रेस और विपक्ष की दलीलें अलग हो सकती हैं।

कृषि कानूनों की वापसी और अंबेडकर के भाषण का हवाला देकर दिया संदेश

अपने लेख में राजनाथ सिंह ने तीन कृषि कानूनों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब इन कानूनों को लेकर किसानों और अन्य लोगों ने चिंता जताई, तो सरकार ने उनकी बात सुनी और व्यापक जनहित में कानून वापस ले लिए।

उनके मुताबिक, यह उदाहरण दिखाता है कि सरकार के किसी फैसले से असहमति होने पर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जा सकता है। लेकिन असहमति का आधार तथ्य होना चाहिए, न कि झूठे आरोप या भ्रामक प्रचार।

लेख के अंत में रक्षा मंत्री ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के उस विचार का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने असंवैधानिक तरीकों के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी थी। इस विचार को आमतौर पर ‘अराजकता का व्याकरण’ यानी ‘Grammar of Anarchy’ के रूप में जाना जाता है।

राजनाथ सिंह ने विपक्षी नेताओं को यह संदेश दिया कि उन्हें लोकतांत्रिक असहमति और अराजकता के बीच अंतर समझना चाहिए।

कुल मिलाकर, SIR को लेकर राजनाथ सिंह का लेख चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक जवाबदेही पर जारी बहस को सामने लाता है। एक तरफ सरकार मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव आयोग की भूमिका का बचाव कर रही है, तो दूसरी तरफ SIR और चुनावी व्यवस्था को लेकर उठने वाले सवालों पर तथ्यात्मक जवाब और पारदर्शिता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहम हैं। आखिरकार, किसी भी चुनावी प्रक्रिया की मजबूती इसी बात पर निर्भर करती है कि पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहें और जनता का भरोसा बना रहे।