कानून की पढ़ाई पूरी करने और बार काउंसिल में नामांकन कराने के बाद भी वकालत जारी रखने के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस संबंध में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि अनिवार्य अवधि के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना वकालत करने वाले वकीलों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है। अदालत ने साफ किया कि बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपराधिक कानून के तहत जांच, दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। ऐसे में केवल यह दलील देकर आपराधिक कार्यवाही से बचा नहीं जा सकता कि वकील के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार बार काउंसिल के पास है।
AIBE पास नहीं किया तो वकीलों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एच.पी. संदेश ने स्पष्ट किया कि अगर किसी वकील का कथित आचरण किसी आपराधिक अपराध के दायरे में आता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था होने से आपराधिक अदालतों का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
अदालत ने यह भी कहा कि वकीलों के पेशेवर आचरण पर बार काउंसिल की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपराधिक अपराध की आशंका होने पर पुलिस या सक्षम अदालत जांच नहीं कर सकती।
इस फैसले का महत्व उन वकीलों के लिए खास है, जिन्होंने बार काउंसिल में अनंतिम नामांकन के बाद भी निर्धारित समय के भीतर AIBE पास नहीं किया है। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होगी या नहीं, यह जांच में सामने आने वाले तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करेगा।
करीब एक दशक तक बिना AIBE वकालत करने का आरोप
यह पूरा मामला एक वकील के खिलाफ दर्ज शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि संबंधित याचिकाकर्ता का कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल (KSBC) में वर्ष 2011 में अनंतिम रूप से नामांकन हुआ था। इसके बावजूद उसने अनिवार्य AIBE परीक्षा पास किए बिना करीब एक दशक तक वकालत जारी रखी।
शिकायतकर्ता का कहना था कि इस तरह वकालत जारी रखने से मुवक्किलों के हित प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही, इससे न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
मामले में बंगारपेट की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) अदालत ने शिकायत को जांच के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत पुलिस के पास भेजा था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और CrPC की धारा 482 के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच जरूरी है और कथित आचरण समाज के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
बार काउंसिल की कार्रवाई और पुलिस जांच में क्या है अंतर?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल को वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार आपराधिक अदालतों की शक्तियों को खत्म नहीं करता।
जस्टिस संदेश ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया। इनमें एससीबीए बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1998), आर. अंतुले बनाम रामदास श्रीनिवास नायक (1984) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी फोई लॉ कॉलेज (2023) शामिल हैं।
अदालत ने आर. अंतुले मामले के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि किसी अपराध से होने वाला नुकसान केवल सीधे प्रभावित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। कुछ मामलों में उसका असर पूरे समाज और संस्थागत व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
हाईकोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता को आपराधिक शिकायत दर्ज कराने से पहले कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल में शिकायत करना अनिवार्य नहीं था। पुलिस को जांच के दौरान यह पता लगाना होगा कि कथित गतिविधि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी या किसी अन्य अपराध का मामला बनाती है या नहीं। इसके साथ ही एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 45 के तहत अपराध बनता है या नहीं, इसकी भी जांच की जा सकती है।
अदालत ने साफ किया कि इन पहलुओं की जांच करना जांच अधिकारी की जिम्मेदारी है। फिलहाल, याचिका खारिज होने का अर्थ यह है कि संबंधित मामले में जांच आगे बढ़ सकती है। इससे अपने आप याचिकाकर्ता का दोष साबित नहीं होता।
बार काउंसिल को भी व्यवस्था बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल के 7 अगस्त 2026 के पत्र का भी उल्लेख किया। यह पत्र राज्य के मान्यता प्राप्त बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और सचिवों को भेजा गया था। इसमें AIBE पास नहीं करने की स्थिति में वकालत का लाइसेंस निलंबित किए जाने की संभावना का जिक्र था।
अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 29 जुलाई 2026 के पत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें इसी तरह की स्थिति सामने आई थी।
हाईकोर्ट ने कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को ऐसी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया, जिससे अनिवार्य दो साल की अवधि में AIBE पास नहीं करने वाले वकीलों की पहचान अपने आप हो सके। इससे नियमों का पालन नहीं करने वाले वकीलों को समय रहते चिह्नित किया जा सकेगा और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सकेगी।
आम लोगों के लिए इस मामले का सीधा महत्व है। जब कोई व्यक्ति कानूनी सलाह लेने या अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए वकील नियुक्त करता है, तो उसके लिए वकील की निर्धारित पात्रता और पेशेवर नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, इस फैसले को हर AIBE लंबित मामले में स्वतः आपराधिक कार्रवाई का आदेश नहीं समझना चाहिए। कार्रवाई का आधार संबंधित व्यक्ति के आचरण, जांच में सामने आने वाले तथ्यों और कानून की लागू शर्तों पर निर्भर करेगा।

