देश में टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों और ट्रैफिक जाम से राहत दिलाने के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय एक बड़ी योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत पांच लाख से अधिक आबादी वाले 45 शहरों में रिंग रोड, बाईपास और मौजूदा राजमार्गों को आधुनिक बनाने की योजना है। खास बात यह है कि जिन शहरों में नए एक्सेस कंट्रोल्ड रिंग रोड बनाए जाएंगे, वहां मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) तकनीक लगाने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था में गाड़ियों को टोल चुकाने के लिए बैरियर के सामने रुकना नहीं पड़ेगा। सेंसर और कैमरों की मदद से टोल की पहचान और वसूली अपने आप हो सकेगी। रिपोर्ट के मुताबिक, वाहन करीब 80 से 90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टोल पॉइंट पार कर सकेंगे। हालांकि, यह सुविधा सभी मौजूदा टोल प्लाजा पर एक साथ लागू होने की बात नहीं है। इसका इस्तेमाल प्रस्तावित एक्सेस कंट्रोल्ड रिंग रोड जैसी चुनिंदा सड़क परियोजनाओं में किया जाएगा।
45 शहरों में सड़क नेटवर्क को आधुनिक बनाने की तैयारी
बड़े शहरों में बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना सड़क परिवहन व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती है। खासकर शहरों के बाहरी इलाकों और प्रमुख राजमार्गों पर वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण जाम की समस्या गंभीर होती जा रही है।
इसी चुनौती को देखते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने पांच लाख से अधिक आबादी वाले 45 शहरों को चिह्नित किया है। योजना के तहत इन शहरों में रिंग रोड, बाईपास या मौजूदा राजमार्गों को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाएगा।
रिंग रोड का उद्देश्य शहर के भीतर से गुजरने वाले भारी ट्रैफिक को बाहरी रास्ते से निकालना है। इससे उन वाहनों को शहर के व्यस्त बाजारों और रिहायशी इलाकों से होकर गुजरने की जरूरत कम हो सकती है, जिन्हें किसी दूसरे स्थान तक पहुंचना है।
इस योजना में MLFF तकनीक की भूमिका भी अहम होगी। जिन नए रिंग रोड को एक्सेस कंट्रोल्ड बनाया जाएगा, वहां इस व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लगाने की योजना बताई गई है। एक्सेस कंट्रोल्ड सड़क का मतलब है कि वाहनों को प्रवेश और निकास के लिए तय स्थानों का इस्तेमाल करना होगा।
क्या है MLFF तकनीक? बिना रुके कैसे कटेगा टोल
MLFF यानी मल्टी लेन फ्री फ्लो एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक टोल वसूली प्रणाली है, जिसमें वाहन को टोल भुगतान के लिए किसी बैरियर के सामने रुकने की जरूरत नहीं होती।
इस तकनीक में सड़क के ऊपर या आसपास लगे सेंसर, कैमरे और रीडर वाहन की पहचान करने तथा उससे जुड़े टोल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने में मदद करते हैं। फास्टैग जैसे इलेक्ट्रॉनिक टैग की जानकारी पढ़कर संबंधित वाहन की पहचान की जा सकती है। कैमरों के जरिए वाहन की नंबर प्लेट पढ़ने जैसी तकनीक भी व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम में इस्तेमाल किए जाने वाले हाई-स्पीड रीडर की क्षमता एक सेकंड में करीब 1,300 टैग पढ़ने की बताई गई है। रिपोर्ट में अमेरिका की कंपनी जेब्रा के रीडर का उल्लेख किया गया है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि टोल वसूली के लिए वाहनों को अलग-अलग लेन में रुकने या बैरियर खुलने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे टोल पॉइंट पर वाहनों की कतारें कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, टोल का भुगतान किस तरह होगा, किन वाहनों पर कौन-सा शुल्क लागू होगा और भुगतान में समस्या आने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, इसका विवरण संबंधित परियोजना के नियमों पर निर्भर करेगा।
90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गुजर सकेंगी गाड़ियां
मौजूदा टोल प्लाजा पर अक्सर वाहनों को गति धीमी करनी पड़ती है। व्यस्त समय में टोल लेन के सामने लंबी कतारें लग जाती हैं। इससे यात्रा में अतिरिक्त समय लगता है और वाहन बार-बार रुकने के कारण ईंधन की खपत भी बढ़ सकती है।
MLFF तकनीक का उद्देश्य इस रुकावट को कम करना है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, वाहन करीब 80 से 90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टोल पॉइंट पार कर सकेंगे। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सड़क पर वाहन इतनी ही गति से चल सकेंगे। वाहन की वास्तविक गति सड़क पर लागू गति सीमा, यातायात और सुरक्षा नियमों के अनुसार ही निर्धारित होगी।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों, माल ढुलाई करने वाले ट्रक चालकों और नियमित रूप से राजमार्गों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को फायदा मिल सकता है। टोल पर कम समय रुकने से यात्रा अधिक सुगम हो सकती है।
लेकिन इसके लिए तकनीकी व्यवस्था का सही तरीके से काम करना, वाहनों की पहचान में गलती न होना और टोल भुगतान का रिकॉर्ड ठीक रखना जरूरी होगा।
प्रयागराज, वाराणसी और देहरादून समेत कई शहर योजना में शामिल
इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, अलीगढ़ और वाराणसी समेत कई शहरों को शामिल किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा दिल्ली, पटना, चंडीगढ़, उदयपुर, अहमदाबाद, अमरावती, सलेम, तिरुचिरापल्ली, बेंगलुरु, कोयंबटूर, देहरादून और गुवाहाटी जैसे शहरों के नाम भी रिपोर्ट में दिए गए हैं।
इन शहरों में सड़क नेटवर्क को बेहतर बनाने और यातायात का दबाव कम करने के लिए अलग-अलग परियोजनाओं पर काम किया जा सकता है। हालांकि, सभी शहरों में MLFF तकनीक लागू होने की समयसीमा और परियोजना की स्थिति एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि 45 शहरों को योजना में शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि वहां के सभी टोल प्लाजा तुरंत बैरियर-मुक्त हो जाएंगे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, MLFF तकनीक का अनिवार्य इस्तेमाल उन नए रिंग रोड पर प्रस्तावित है, जिन्हें एक्सेस कंट्रोल्ड बनाया जाएगा।
कुल मिलाकर, MLFF तकनीक भारत में टोल वसूली की व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। इससे टोल पर लगने वाली कतारें कम करने, यात्रा का समय बचाने और सड़क यातायात को अधिक सुचारु बनाने में मदद मिल सकती है। अब इस योजना का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि परियोजनाएं कब पूरी होती हैं और नई तकनीक को कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।


