दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए आरोपी पिता की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि कोई व्यक्ति केवल यह दलील देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह अपराध के समय मौके पर मौजूद था, लेकिन उसने खुद किसी पर हमला नहीं किया। अगर परिस्थितियां साझा आपराधिक इरादे की ओर इशारा करती हैं, तो उसकी भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी। इस मामले में सीसीटीवी फुटेज और घटनाक्रम को देखते हुए अदालत ने माना कि आरोपी की कथित भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह फैसला जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया है, न कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए।
बेटे ने चाकू से किया हमला, पिता की भूमिका पर उठे सवाल
यह मामला अजीत कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) से जुड़ा है। आरोपी अजीत कुमार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 34 के तहत हत्या का मामला दर्ज है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि कुमार ने अपने बेटे को उकसाया, जिसके बाद बेटे ने मृतक पर चाकू से कई वार किए। हमले में उसकी मौत हो गई।
अभियोजन के मुताबिक, घटना के समय कुमार अपने घर के बाहर मोबाइल फोन लेकर खड़े थे। जब उन्होंने मृतक को पास आते देखा, तो कथित तौर पर अपने बेटे से कुछ कहा। इसके बाद उनका बेटा कमरे से चाकू लेकर बाहर आया और मृतक पर हमला कर दिया।
अभियोजन पक्ष ने यह भी दावा किया कि कुमार ने हमले के दौरान न तो बीच-बचाव किया और न ही अपने बेटे को रोकने की कोशिश की। जांच के दौरान दोनों परिवारों के बीच पुरानी रंजिश की बात भी सामने रखी गई। बताया गया कि आरोपी के परिवार की एक लड़की के मृतक के भतीजे के साथ चले जाने के बाद दोनों परिवारों के बीच तनाव था।
CCTV फुटेज में क्या दिखा, जिसने मामले को गंभीर बनाया?
जमानत याचिका का विरोध करते हुए राज्य पक्ष ने अदालत के सामने सीसीटीवी फुटेज का हवाला दिया। अभियोजन के अनुसार, फुटेज में कुमार चाकूबाजी शुरू होने से पहले घटनास्थल पर मौजूद दिखाई देते हैं। आरोप है कि वह हमलावर बेटे के साथ कथित तालमेल में थे और हमला होने से पहले कुछ कहते हुए नजर आए।
अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि घटना के समय आरोपी की मौजूदगी को लेकर विवाद नहीं था। फुटेज में चाकूबाजी शुरू होने से पहले उनकी गतिविधियां भी दिखाई देती हैं। अभियोजन पक्ष ने इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर दावा किया कि कुमार की भूमिका को केवल एक दर्शक तक सीमित नहीं माना जा सकता।
आज के दौर में सीसीटीवी कैमरे और मोबाइल फोन से मिलने वाले डिजिटल साक्ष्य आपराधिक मामलों की जांच में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, किसी फुटेज का वास्तविक महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह घटनाक्रम और अन्य साक्ष्यों के साथ मिलकर क्या साबित करता है। इस मामले में भी अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों को एक साथ रखकर विचार किया।
‘मैंने हमला नहीं किया’ कहने से नहीं मिलेगी राहत?
अजीत कुमार के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की घटना में कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी। वह केवल मौके पर मौजूद थे और उन्होंने खुद किसी पर हमला नहीं किया। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कुमार 27 मई 2024 से हिरासत में हैं। सभी चश्मदीदों से पूछताछ हो चुकी है, इसलिए गवाहों को प्रभावित करने की आशंका भी नहीं रह गई है।
लेकिन अदालत ने मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के सिद्धांत पर विचार किया। यह धारा उन परिस्थितियों से संबंधित है, जिनमें कई लोग साझा इरादे से किसी आपराधिक कृत्य को अंजाम देते हैं।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने टिप्पणी की कि कुछ परिस्थितियों में केवल निष्क्रिय बने रहना भी व्यक्ति की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। अदालत के मुताबिक, आरोपी यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह घटनास्थल पर मौजूद था, लेकिन उसने खुद हमला नहीं किया।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी अपराध को देखकर चुप रहने वाला हर व्यक्ति अपने आप दोषी हो जाता है। आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए मामले के तथ्य, साझा इरादे और उपलब्ध साक्ष्यों का आकलन जरूरी होता है। अदालत की टिप्पणी भी इसी मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में थी।
जमानत याचिका खारिज, आम लोगों के लिए क्या है इसका मतलब?
सभी दलीलों और उपलब्ध परिस्थितियों पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने अजीत कुमार की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने इस स्तर पर यह स्वीकार नहीं किया कि आरोपी को केवल इसलिए राहत दी जाए क्योंकि वह कथित तौर पर मुख्य हमलावर नहीं था।
इस फैसले से एक अहम कानूनी पहलू सामने आता है। किसी गंभीर अपराध के मामले में जांच और सुनवाई के दौरान केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि हमला किसने किया। यह भी जांचा जा सकता है कि दूसरे आरोपियों की भूमिका क्या थी और क्या अपराध को अंजाम देने में उनका साझा इरादा शामिल था।
फिलहाल, जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को अंतिम रूप से दोषी ठहरा दिया गया है। मामले में आरोपों की पुष्टि और दोष तय करने का प्रश्न आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
मामले का नाम: Ajeet Kumar v. State (NCT of Delhi)

