बालिग अविवाहित बेटी को भी देना होगा गुजारा भत्ता? बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता की दलील खारिज कर दिया बड़ा संदेश

बालिग अविवाहित बेटी को भी देना होगा गुजारा भत्ता? बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता की दलील खारिज कर दिया बड़ा संदेश

बेटी बालिग हो गई है, इसलिए अब उसे गुजारा भत्ता नहीं देना चाहिए—पिता की इस दलील को बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर कोई अविवाहित बेटी अपना खर्च खुद उठाने में सक्षम नहीं है, तो केवल बालिग होने या दूसरे कानून के तहत भरण-पोषण का विकल्प उपलब्ध होने के आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125 के तहत बेटी को भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां बच्चों की आर्थिक निर्भरता और माता-पिता की जिम्मेदारी को लेकर विवाद होता है।

बेटी और बेटे को हर महीने 7,000 रुपये देने का था आदेश

यह मामला महाराष्ट्र के नागपुर की फैमिली कोर्ट के एक आदेश से जुड़ा है। फैमिली कोर्ट ने पिता को अपनी बेटी और बेटे, दोनों में से प्रत्येक को हर महीने 7,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया था।

पिता आनंद हरिश्चंद्र चौहान ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि बेटी अब बालिग हो चुकी है। ऐसे में उसे CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण देने का आदेश जारी नहीं रहना चाहिए।

पिता ने कहा कि बेटी के पास हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 यानी HAMA की धारा 20(3) के तहत भरण-पोषण मांगने का विकल्प मौजूद है। इसलिए उसके मामले में इसी कानून के प्रावधान लागू होने चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि किसी दूसरे कानून के तहत उपाय उपलब्ध होने भर से भरण-पोषण का दावा करने का रास्ता बंद नहीं हो जाता।

HAMA की धारा 20(3) क्या कहती है और बेटी को कैसे मिला फायदा?

हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) के तहत एक अविवाहित हिंदू बेटी, यदि अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो शादी होने तक अपने पिता से गुजारा भत्ता मांग सकती है।

पिता की ओर से इसी प्रावधान का हवाला देते हुए कहा गया कि बालिग बेटी को CrPC की धारा 125 के बजाय HAMA के तहत ही अपना दावा करना चाहिए।

लेकिन जस्टिस मेहरोज के. पठान की पीठ ने स्पष्ट किया कि HAMA के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय होने का मतलब यह नहीं है कि बेटी को CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने से रोक दिया जाए।

अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर भी ध्यान दिया कि पिता यह साबित करने में विफल रहे कि बेटी अपने खर्च उठाने में सक्षम है।

यानी मामले में सिर्फ उम्र को आधार बनाकर फैसला नहीं किया जा सकता। बेटी की आर्थिक स्थिति और उपलब्ध तथ्यों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता एवं अन्य मामले का भी उल्लेख किया।

इस फैसले में दिए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अविवाहित बालिग बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश जारी रखकर कोई गलती नहीं की।

अदालत का रुख स्पष्ट था। अगर बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है, तो केवल बालिग होने या दूसरे कानून में उपाय मौजूद होने के आधार पर उसकी आर्थिक सहायता का दावा खारिज नहीं किया जा सकता।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि फैसला हर बालिग बेटी को बिना किसी शर्त के भरण-पोषण देने का सार्वभौमिक आदेश नहीं है। मामले में बेटी की आर्थिक स्थिति और लागू कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण हैं।

बेटे के बालिग होने पर क्या कहा कोर्ट ने?

इस मामले में बेटे की स्थिति भी अदालत के सामने आई। सुनवाई के दौरान रिवीजन याचिका लंबित रहते हुए बेटा बालिग हो गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि बेटे के भरण-पोषण से जुड़े इस बदले हुए पहलू पर पिता CrPC की धारा 127 के तहत उचित मंच के सामने आवेदन दाखिल कर सकते हैं। यानी बेटे के बालिग होने से जुड़े सवाल को संबंधित कानूनी प्रक्रिया के जरिए उठाया जा सकता है।

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इस तरह नागपुर फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण संबंधी आदेश बरकरार रहा।

आम परिवारों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?

इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि माता-पिता और बच्चों के बीच भरण-पोषण से जुड़े विवादों में केवल उम्र या वैकल्पिक कानूनी उपाय को देखकर निर्णय नहीं लिया जा सकता। अदालत संबंधित कानून, बच्चे की आर्थिक स्थिति और मामले के तथ्यों पर भी विचार करती है। हालांकि, हर मामले का परिणाम उसकी परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार तय होगा।

केस का नाम: Anand Harishchandra Chouhan v. Smt. Shaila, Criminal Revision No. 53 of 2022