वीडियो में लगाए गए आरोपों पर कोर्ट की सख्ती, जानिए पूरा मामला
कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस आर्यक दत्त ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए वीडियो के ऑनलाइन प्रसार पर अंतरिम रोक लगाई। कंपनी ने आरोप लगाया था कि वीडियो में अडानी समूह के खिलाफ कई गंभीर और मानहानिकारक दावे किए गए हैं।
इन आरोपों में नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकी फंडिंग से कथित संबंध, पुलिस हिंसा को बढ़ावा देने तथा एक किसान के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराने जैसे दावे शामिल बताए गए हैं। अदालत ने कहा कि उसके सामने रखे गए दस्तावेजों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखा, जिससे किसी सरकारी प्राधिकरण ने इन आरोपों की पुष्टि की हो।
सुनवाई के दौरान अदालत ने वीडियो की प्रस्तुति पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के अनुसार, यह सामान्य समाचार रिपोर्ट या किसी कानूनी कार्यवाही का विवरण नहीं था, बल्कि एक नाटकीय अंदाज में तैयार किया गया वीडियो था। इसके शीर्षक में ही चोरी जैसा गंभीर आरोप लगाया गया था और सामग्री को इस तरह पेश किया गया, मानो उसमें बताई गई बातें पूरी तरह प्रमाणित हों।
अदालत ने फिलहाल इस आधार पर वीडियो के प्रसार को रोकना उचित समझा। हालांकि, यह आदेश अंतरिम है और मामले में सभी पक्षों की दलीलों पर अंतिम फैसला आना बाकी है।
YouTube पर 46 हजार से ज्यादा व्यूज, X पर भी हुआ प्रसार
अडानी एंटरप्राइजेज के मुताबिक, करीब 36 मिनट का यह वीडियो 9 अक्टूबर 2026 को YouTube चैनल ‘Shadow Citizens’ के साथ मिलकर अपलोड किया गया था। इसे ‘B-Cubed (Breaking Boundaries with Sabir Bhatia)’ नाम के चैनल और सबीर भाटिया के X अकाउंट से भी जोड़ा गया।
कंपनी ने अदालत को बताया कि वीडियो को YouTube पर 46,134 बार देखा गया था, जबकि X पर इसे लगभग 40,000 व्यूज मिले थे।
अडानी एंटरप्राइजेज का दावा है कि सरकार की शिकायत के बाद सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत भारत में मूल YouTube वीडियो तक पहुंच पहले ही बंद कर दी गई थी। इसके बावजूद कंपनी के मुताबिक, वीडियो को दोबारा अपलोड करने, सोशल मीडिया पर रीपोस्ट करने और Instagram Reels के जरिए फैलाने की कोशिश जारी रही।
कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि मूल वीडियो हटाए जाने के बाद 22 अक्टूबर को सबीर भाटिया ने इसे X पर फिर से पोस्ट किया।
याचिका में कहा गया कि वीडियो सामने आने के बाद निवेशकों और अन्य लोगों ने कंपनी से सवाल पूछे। कंपनी का तर्क था कि इस तरह के आरोप उसकी कारोबारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रतिष्ठा की सुरक्षा के महत्व का भी हवाला दिया।
यह मामला डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित सामग्री के प्रभाव को लेकर भी महत्वपूर्ण है। किसी वीडियो को एक बार हटाए जाने के बाद यदि उसकी प्रतियां अलग-अलग अकाउंट्स से प्रसारित होती हैं, तो उस पर नियंत्रण करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्या आलोचना पर भी लगेगी रोक? कोर्ट ने खुद स्पष्ट की सीमा
अडानी एंटरप्राइजेज की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अनिर्बान रे ने अदालत में कहा कि कंपनी सरकार की नीतियों, कारोबारी गतिविधियों या आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण पर रचनात्मक आलोचना को रोकना नहीं चाहती।
कंपनी के मुताबिक, उसकी मांग केवल संबंधित वीडियो, उसके दूसरे संस्करणों और उसमें लगाए गए कथित मानहानिकारक आरोपों तक सीमित है।
अदालत ने भी माना कि मानहानि के मामलों में मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले किसी सामग्री पर रोक लगाने का फैसला सावधानी से किया जाना चाहिए। इसके लिए जस्टिस दत्त ने सुप्रीम कोर्ट के Bloomberg Television Production Services India Pvt. Ltd. बनाम Zee Entertainment Enterprises Ltd. मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।
अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में केवल प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय नुकसान जैसे कानूनी पहलुओं को देखना पर्याप्त नहीं है। जनता के जानने के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि सुनवाई से पहले रोक लगाने जैसे आदेश केवल विशेष परिस्थितियों में दिए जाने चाहिए, खासकर जब सामग्री प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण या पूरी तरह झूठी दिखाई दे।
इस मामले में अदालत ने माना कि वीडियो में गंभीर आरोपों को स्थापित तथ्यों की तरह पेश किया गया। वीडियो को पहले हटाए जाने के बाद दोबारा पोस्ट किए जाने के आरोप को भी अदालत ने प्रथम दृष्टया सद्भावना की कमी के संकेत के रूप में देखा।
सोशल मीडिया कंपनियों को वीडियो हटाने के साथ ये रिकॉर्ड भी रखने होंगे सुरक्षित
अदालत ने संबंधित पक्षों को अपने नियंत्रण वाले अकाउंट्स, चैनलों और पेजों से विवादित वीडियो और उससे जुड़े कथित मानहानिकारक कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया है।
यह रोक 31 जनवरी 2027 तक या अदालत के अगले आदेश तक लागू रहेगी, जो भी पहले हो। आदेश में वीडियो के क्लिप, अंश, छोटे संस्करण और उससे मिलते-जुलते रूपों को प्रकाशित करने, दोबारा अपलोड करने या शेयर करने पर भी रोक लगाई गई है।
इसके अलावा, YouTube, X और Instagram को संबंधित अकाउंट्स और URL से जुड़े सब्सक्राइबर विवरण, रजिस्ट्रेशन की जानकारी, वीडियो अपलोड किए जाने के समय के IP लॉग और एक्सेस लॉग सुरक्षित रखने को कहा गया है।
जिन अज्ञात अकाउंट संचालकों की पहचान याचिका में नहीं हो सकी, उनके बारे में उपलब्ध बुनियादी जानकारी सीलबंद लिफाफे में देने का निर्देश भी दिया गया है। इसके लिए आदेश मिलने के दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करना होगा।
अदालत ने चिह्नित URL और विवादित वीडियो पर विज्ञापन चलाने, उनसे विज्ञापन राजस्व अर्जित करने या उस राजस्व को साझा करने पर भी रोक लगाई है। प्लेटफॉर्म्स को इस कंटेंट से जुड़ी विज्ञापन कमाई का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है।
सोशल मीडिया कंपनियों को एक अज्ञात प्रतिवादी की पहचान अडानी एंटरप्राइजेज को बताने का भी निर्देश दिया गया है, ताकि कंपनी अपनी याचिका में जरूरी संशोधन कर सके। अन्य प्रतिवादियों को नोटिस मिलने के चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना होगा, जबकि कंपनी को उसके बाद दो सप्ताह में प्रत्युत्तर देने की अनुमति दी गई है। मामले को जनवरी 2027 में नियमित पीठ के सामने सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
अहम बात यह है कि यह अभी अंतिम फैसला नहीं, बल्कि अंतरिम राहत है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि उसकी टिप्पणियां प्रथम दृष्टया हैं। तथ्यों और सबूतों के आधार पर की गई आलोचना, निष्पक्ष रिपोर्टिंग या अडानी समूह और सरकारी नीतियों पर रचनात्मक सवाल उठाने पर इस आदेश के जरिए कोई व्यापक रोक नहीं लगाई गई है।


