CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया पर आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज में बाधा डालने की कोशिश कानून के अनुरूप नहीं होगी। हलफनामे के मुताबिक, CEC को पद से उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
यह हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
इन याचिकाओं से जुड़े पक्षों में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, INDIA गठबंधन के अन्य नेता, राकेश कुमार सिंह और वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी शामिल हैं।
आयोग ने अपने पक्ष में कहा है कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के कामकाज को चुनौती देने के लिए कानूनी आधार और पर्याप्त सामग्री जरूरी है। केवल आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली को गलत नहीं ठहराया जाना चाहिए।
हालांकि, हलफनामा आयोग का पक्ष है। इसमें दिए गए तर्कों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख क्या होगा, यह न्यायिक सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
क्या चुनाव आयोग में एकतरफा फैसले लिए जा सकते हैं? हलफनामे में यह दावा
आयोग ने अपने जवाब में उस आरोप को खारिज किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले फैसले लेते हैं या आयोग में एकतरफा निर्णयों की व्यवस्था है।
हलफनामे के अनुसार, चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण फैसले एक तय प्रक्रिया से गुजरते हैं। पहले संबंधित फाइल एक चुनाव आयुक्त के पास भेजी जाती है। इसके बाद उसे दूसरे चुनाव आयुक्त के सामने रखा जाता है और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर विचार किया जाता है।
आयोग के मुताबिक, स्वीकृत फैसलों को आधिकारिक फाइलों में दर्ज किया जाता है। उन पर संबंधित चुनाव आयुक्तों और CEC के हस्ताक्षर होते हैं। इसके बाद आयोग का सचिवालय आवश्यक अधिसूचना जारी करता है और फैसले को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
हलफनामे में ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। आयोग के अनुसार, यदि सदस्यों के बीच मतभेद होता है, तो इस प्रावधान के तहत बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाता है।
इसका मतलब है कि आयोग के अनुसार, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी सदस्यों की भूमिका और निर्धारित नियम महत्वपूर्ण हैं। किसी सदस्य की टिप्पणी, सवाल या सुझाव को अपने आप आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
आपातकाल में कैसे लिए जाते हैं फैसले? इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी का भी जिक्र
हलफनामे में आयोग ने यह भी बताया कि हर परिस्थिति में सभी सदस्यों का एक ही समय पर व्यक्तिगत रूप से मौजूद होना संभव नहीं होता। खासकर आपातकालीन स्थितियों में, जब किसी आदेश को तत्काल जारी करना जरूरी हो, तब अलग व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
आयोग के मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में सदस्यों की मंजूरी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ली जा सकती है। बाद में इस मंजूरी और संबंधित फैसले को आधिकारिक फाइल में दर्ज किया जाता है।
यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव से जुड़े कुछ मामलों में समय पर निर्णय लेना जरूरी हो सकता है। हालांकि, आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि महत्वपूर्ण कार्य पूरे आयोग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और बैठकों में लिए गए निर्णय या फाइलों में दर्ज फैसलों का आधिकारिक रिकॉर्ड रखा जाता है।
आयोग का दावा है कि उसकी कार्यप्रणाली में तय प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने जिन फैसलों को चुनौती दी है, उनकी वैधता और निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच अदालत में होनी है।
इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी से जुड़े विवरण को आयोग की ओर से बताई गई प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था या इससे जुड़े सभी फैसलों को पहले ही सही ठहरा दिया है।
मीडिया रिपोर्टों को सबूत मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या?
चुनाव आयोग ने हलफनामे में कहा कि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेदों या ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों को अपने आप न्यायिक सबूत नहीं माना जा सकता।
आयोग ने यह भी तर्क दिया कि केवल ऐसी रिपोर्टों के आधार पर दायर याचिकाओं की सुनवाई की पात्रता पर सवाल उठाया जाना चाहिए। इसके अलावा, आयोग ने कहा कि उसने किसी समाचार एजेंसी को आंतरिक नोट या फाइल जारी नहीं की और न ही उन्हें जारी करने की अनुमति दी।
यह पहलू इसलिए अहम है, क्योंकि आयोग के आंतरिक कामकाज और फैसलों को लेकर सार्वजनिक चर्चा के बीच अदालत में यह तय होना बाकी है कि संबंधित आरोपों के समर्थन में कौन-सी सामग्री कानूनी रूप से प्रासंगिक है।
आम मतदाता के लिए इस विवाद का महत्व चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा है। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के साथ-साथ निर्णय लेने की पारदर्शिता और जवाबदेही भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फिलहाल, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी निर्णय प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने से जुड़े प्रावधानों पर अपना पक्ष रख दिया है। अब मामले में अदालत की सुनवाई और उसके निर्देश महत्वपूर्ण होंगे। आयोग के दावों और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही स्पष्ट होगी।



