कमजोर मानसून का असर अब देश की रबी फसलों की बुवाई पर दिखने लगा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 23 अक्टूबर 2026 तक गेहूं की बुवाई पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 59 फीसदी कम रही। कुल रबी फसलों का रकबा भी घटकर 18.02 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले साल इस समय तक 28.26 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। इस गिरावट ने आगामी फसल उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश हुई। इससे मिट्टी में नमी और जलाशयों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। अगर बुवाई में देरी होती है या सिंचाई की कमी बनी रहती है, तो इसका असर किसानों की कमाई से लेकर आने वाले महीनों में गेहूं और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों तक पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी इन आंकड़ों के आधार पर अंतिम उत्पादन का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
गेहूं की बुवाई में 59% की गिरावट, सरकार का लक्ष्य कितना बड़ा?
गेहूं देश की प्रमुख रबी फसलों में शामिल है। इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर में होती है, जबकि फसल मार्च-अप्रैल के दौरान काटी जाती है। इसलिए इस समय बुवाई की रफ्तार पर खास नजर रखी जाती है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 23 अक्टूबर तक देश में सिर्फ 11,000 हेक्टेयर में गेहूं बोया गया था। पिछले साल इसी तारीख तक 27,000 हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। यानी शुरुआती चरण में ही गेहूं का रकबा काफी पीछे चल रहा है।
सरकार ने फसल वर्ष 2026-27 के लिए गेहूं उत्पादन का लक्ष्य 121 मिलियन टन यानी 12.1 करोड़ टन रखा है। पिछले फसल वर्ष में 120.7 मिलियन टन यानी 12.07 करोड़ टन का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया था।
ऐसे में इस साल की चुनौती सिर्फ उत्पादन का पुराना रिकॉर्ड बनाए रखने की नहीं, बल्कि बुवाई और सिंचाई की परिस्थितियों को संभालने की भी है। यदि किसानों को समय पर पर्याप्त नमी और पानी मिलता है, तो आगे बुवाई में तेजी आ सकती है। लेकिन पानी की कमी बनी रहने पर लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
पंजाब और राजस्थान में बारिश की कमी, क्यों बढ़ी चिंता?
कमजोर मानसून का असर उन इलाकों में ज्यादा महसूस किया जा रहा है, जहां खेती के लिए बारिश और उपलब्ध सिंचाई जल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में मानसून के दौरान बारिश सामान्य से 38 फीसदी कम रही, जबकि राजस्थान में यह कमी 22 फीसदी दर्ज की गई। ये दोनों राज्य देश के गेहूं उत्पादन क्षेत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। दोनों मिलकर भारत के कुल गेहूं क्षेत्र का लगभग 31 फीसदी हिस्सा रखते हैं।
कम बारिश का असर खेतों की मिट्टी में मौजूद नमी पर पड़ता है। गेहूं की बुवाई के समय पर्याप्त नमी होना जरूरी है। इसके बाद फसल को अलग-अलग चरणों में सिंचाई की जरूरत पड़ती है। यदि नहरों और जलाशयों में पानी कम हो, तो किसानों के लिए समय पर सिंचाई करना मुश्किल हो सकता है।
सितंबर के अंत तक जलाशयों में पानी का भंडारण भी सामान्य से कम बताया गया था। इससे उन क्षेत्रों में चिंता बढ़ी है, जहां किसान सिंचाई के लिए जलाशयों और नहरों पर निर्भर हैं।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बुंदेलखंड और मध्य भारत के कुछ हिस्से भी कम बारिश के प्रति संवेदनशील माने जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में कई जगह खेती बारिश पर निर्भर रहती है और सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में मानसून के दौरान मिट्टी में जमा होने वाली नमी की कमी को बाद में भूजल या नहरों के पानी से पूरी तरह दूर करना आसान नहीं होता।
गेहूं ही नहीं, चावल, दलहन और तिलहन की बुवाई भी पिछड़ी
रबी सीजन में बुवाई की धीमी रफ्तार केवल गेहूं तक सीमित नहीं है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों में चावल, दलहन और तिलहन के रकबे में भी पिछले साल के मुकाबले कमी दिखाई गई है।
23 अक्टूबर तक रबी बुवाई की स्थिति
रकबा लाख हेक्टेयर में
| फसल | पिछले साल | इस साल |
| चावल | 2.13 | 1.02 |
| दलहन | 4.39 | 3.27 |
| तिलहन | 21.34 | 13.38 |
| मोटे अनाज | 0.13 | 0.23 |
| कुल रबी फसलें | 28.26 | 18.02 |
चावल का रकबा पिछले साल के 2.13 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.02 लाख हेक्टेयर रह गया। दलहन की बुवाई 4.39 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 3.27 लाख हेक्टेयर में हुई। वहीं, तिलहन का रकबा 21.34 लाख हेक्टेयर से घटकर 13.38 लाख हेक्टेयर रह गया।
इसके उलट मोटे अनाज की बुवाई में बढ़ोतरी दर्ज की गई। पिछले साल 23 अक्टूबर तक जहां 13,000 हेक्टेयर में मोटे अनाज बोए गए थे, वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 23,000 हेक्टेयर हो गया।
कुल मिलाकर, रबी फसलों का रकबा पिछले साल के 28.26 लाख हेक्टेयर से घटकर 18.02 लाख हेक्टेयर रह गया। यानी अब तक करीब 10.24 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई है।
यह आंकड़ा शुरुआती बुवाई की स्थिति बताता है। इससे यह जरूरी नहीं कि पूरे सीजन में उत्पादन भी उसी अनुपात में घटेगा। आगे मौसम, सिंचाई और बुवाई की गति के आधार पर तस्वीर बदल सकती है।
किसानों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक, क्यों महत्वपूर्ण हैं ये आंकड़े?
रबी फसलों की बुवाई में गिरावट का असर सबसे पहले किसानों की खेती की योजना पर पड़ सकता है। पर्याप्त नमी न मिलने पर बुवाई टालनी पड़ सकती है, जबकि सिंचाई के लिए पानी की कमी खेती की लागत और प्रबंधन पर दबाव डाल सकती है।
आम लोगों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। गेहूं देश के खाद्य तंत्र का अहम हिस्सा है। अगर आगे चलकर उत्पादन प्रभावित होता है, तो गेहूं और उससे जुड़े उत्पादों की उपलब्धता तथा कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। इसी तरह दलहन और तिलहन के उत्पादन में संभावित कमी का असर दालों और खाद्य तेलों के बाजार पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, अभी केवल शुरुआती बुवाई के आंकड़ों के आधार पर महंगाई बढ़ने या उत्पादन घटने का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए आगे के महीनों में बुवाई का रकबा, फसल की स्थिति, सिंचाई की उपलब्धता और मौसम के रुझान पर नजर रखनी होगी।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती कमजोर मानसून के बाद खेती के लिए जरूरी नमी और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। आने वाले हफ्तों में बुवाई की रफ्तार बढ़ती है या नहीं, यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि रबी सीजन का अंतिम उत्पादन सरकार के लक्ष्य के कितना करीब पहुंचता है।


