जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम भी करता है मनमानी? रिटायर्ड जस्टिस रेखा शर्मा ने उठाए गंभीर सवाल, सरकार से की तुलना

जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम भी करता है मनमानी? रिटायर्ड जस्टिस रेखा शर्मा ने उठाए गंभीर सवाल, सरकार से की तुलना

दिल्ली हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रेखा शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस व्यवस्था को जजों की नियुक्ति में राजनीतिक दखल, पक्षपात और भाई-भतीजावाद रोकने के लिए लाया गया था, वह खुद इन समस्याओं से मुक्त नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेजियम भी जजों की नियुक्ति और तबादले अपनी मर्जी से करता है और कई मामलों में उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके इस बयान ने न्यायपालिका की जवाबदेही, जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता और आम नागरिकों के न्याय के अधिकार को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।

जस्टिस शर्मा ने ये बातें ‘कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स’ (CJAR) के एक कार्यक्रम में कहीं। कार्यक्रम का विषय भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की जवाबदेही था। उन्होंने अपने संबोधन में नियुक्तियों से लेकर जजों के आचरण और जमानत के मामलों तक कई मुद्दे उठाए।

कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल: जिस व्यवस्था से उम्मीद थी, वही सवालों के घेरे में

जस्टिस रेखा शर्मा ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम 1993 और 1998 में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद विकसित हुआ। इससे पहले संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति सरकार करती थी। उस व्यवस्था पर आरोप लगते थे कि राजनीतिक विचारधारा, व्यक्तिगत पसंद और भाई-भतीजावाद नियुक्तियों को प्रभावित करते हैं।

इन्हीं चिंताओं के बीच जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम की भूमिका मजबूत हुई। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना था। लेकिन जस्टिस शर्मा का मानना है कि यह बदलाव अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाया।

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम लगभग पूरी तरह विफल हो चुका है। उनके मुताबिक, पहले जिन समस्याओं को लेकर सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए जाते थे, वे अब कॉलेजियम की कार्यप्रणाली में भी दिखाई देती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नियुक्तियों में पक्षपात और रिश्तेदारी से जुड़े सवाल पहले से ज्यादा खुलकर सामने आ रहे हैं।

यह बहस आम नागरिकों के लिए भी अहम है। जजों की नियुक्ति का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहता। न्यायपालिका की निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा इस बात से भी जुड़ा है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और जवाबदेह है।

विक्टोरिया गौरी से लेकर पूर्व CJI के भतीजे तक, इन नियुक्तियों पर उठाए सवाल

अपने तर्क के समर्थन में जस्टिस शर्मा ने कुछ नियुक्तियों का जिक्र किया। इनमें मद्रास हाईकोर्ट की जज एल. विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति और पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के भतीजे को बॉम्बे हाईकोर्ट में जज बनाए जाने का मामला शामिल था।

जस्टिस शर्मा ने विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति को लेकर कहा कि उनके नाम की सिफारिश से पहले उनकी कथित राजनीतिक संबद्धता और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ की गई टिप्पणियों को लेकर खबरें सामने आई थीं। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी परिस्थितियों में कॉलेजियम के लिए उनके नाम को मंजूरी देना क्या जरूरी था?

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पूर्व CJI बी.आर. गवई के भतीजे की नियुक्ति के मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश का कॉलेजियम की चर्चा से खुद को अलग कर लेना क्या पर्याप्त था। उनके मुताबिक, केवल अलग हो जाने के बजाय इस बात पर भी विचार किया जा सकता था कि नियुक्ति की सिफारिश को उनके पद छोड़ने तक टाल दिया जाए।

हालांकि, ये सवाल जस्टिस शर्मा की आलोचनात्मक टिप्पणियों का हिस्सा हैं। इन उदाहरणों का जिक्र करते हुए उनका मुख्य तर्क यह था कि कॉलेजियम की प्रक्रिया में हितों के टकराव और निष्पक्षता को लेकर उठने वाले सवालों का गंभीरता से जवाब दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति और तबादलों के फैसले कई बार ऐसे दिखाई देते हैं, जिनके पीछे की प्रक्रिया और कारणों को लेकर स्पष्टता की जरूरत है।

जस्टिस अकील कुरैशी और जस्टिस शेखर यादव के मामले में क्या कहा?

जस्टिस शर्मा ने जस्टिस अकील कुरैशी को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किए जाने के मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम और तत्कालीन सरकार के बीच करीब दो साल तक गतिरोध बना रहा।

उनके अनुसार, उस समय कॉलेजियम के सदस्य जस्टिस आर.एफ. नरीमन ने जस्टिस कुरैशी की वरिष्ठता को देखते हुए उनके नाम का समर्थन किया था। लेकिन जस्टिस नरीमन के रिटायर होने के सात दिनों के भीतर कॉलेजियम ने नौ नामों की सिफारिश की और उनमें जस्टिस कुरैशी का नाम शामिल नहीं था।

जस्टिस शर्मा ने इस घटनाक्रम को कॉलेजियम की स्वतंत्रता और सरकार के प्रभाव को लेकर उठने वाले सवालों से जोड़ा।

उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस शेखर यादव के विवादित बयानों का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ की गई टिप्पणियों के बाद कॉलेजियम ने उन्हें बुलाया था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि कथित तौर पर सार्वजनिक माफी देने की बात सामने आई थी, लेकिन बाद में जस्टिस यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि उनकी टिप्पणियों से न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं हुआ।

जस्टिस शर्मा ने सवाल उठाया कि इस मामले में कोई प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उनके मुताबिक, जस्टिस यादव रिटायर हो गए, लेकिन उनकी विवादित टिप्पणियों को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

इसके विपरीत, उन्होंने जस्टिस श्रीधरन के तबादलों का उदाहरण दिया। जस्टिस शर्मा के अनुसार, जस्टिस श्रीधरन ने मध्य प्रदेश के एक मंत्री द्वारा कर्नल सोफिया को आतंकवादी की बहन कहे जाने के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। इसके बाद उनका तबादला पहले छत्तीसगढ़ और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया।

जस्टिस शर्मा ने सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में कॉलेजियम के फैसलों के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए—न्यायपालिका को या सरकार को? उन्होंने कहा कि उन्हें कॉलेजियम की नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार द्वारा नियुक्तियां किए जाने की पुरानी व्यवस्था में बहुत बड़ा अंतर नजर नहीं आता।

जमानत से लेकर मतदाता सूची तक, न्यायपालिका की जवाबदेही पर भी चिंता

जस्टिस शर्मा ने अपने संबोधन में न्यायिक जवाबदेही को केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अदालतों में जमानत से जुड़े मामलों की सुनवाई पर भी चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ का सिद्धांत बार-बार दोहराया जाता है, लेकिन कई मामलों में इसका प्रभावी पालन नहीं हो रहा। उन्होंने उन विचाराधीन कैदियों की स्थिति का जिक्र किया, जो वर्षों से जेल में बंद हैं।

उनका सुझाव था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए तय व्यवस्था होनी चाहिए। जमानत और बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि इनका सीधा संबंध व्यक्ति की स्वतंत्रता से है।

आम लोगों के लिए यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति की जमानत पर फैसला आने में देरी होने का मतलब उसके और उसके परिवार के लिए लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहना हो सकता है। ऐसे मामलों में समय पर सुनवाई न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करने में अहम भूमिका निभाती है।

जस्टिस शर्मा ने मतदाता सूची से कथित तौर पर 13 करोड़ लोगों के नाम हटाए जाने के मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह मामला कई महीनों से अदालत में लंबित है, लेकिन उनकी नजर में अब तक कोई सार्थक आदेश सामने नहीं आया।

उन्होंने शांतिपूर्ण मार्च निकालने वाले छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि संविधान के तहत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

जस्टिस शर्मा की इन टिप्पणियों ने एक बुनियादी सवाल फिर सामने ला दिया है—न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था खुद कितनी जवाबदेह होनी चाहिए? जजों की नियुक्ति हो, उनके आचरण का मामला हो या किसी नागरिक की स्वतंत्रता से जुड़ा विवाद, हर स्तर पर पारदर्शिता और निष्पक्षता का महत्व बना रहता है।

उनकी आलोचना कॉलेजियम सिस्टम में सुधार की जरूरत पर बहस को आगे बढ़ाती है। हालांकि, कॉलेजियम की मौजूदा व्यवस्था को बदलने या उसमें सुधार करने का सवाल अलग संवैधानिक और संस्थागत विमर्श का विषय है। फिलहाल, जस्टिस शर्मा के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी जवाबदेही पर चर्चा भी जरूरी है।