इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज और वकीलों के बीच टकराव! जस्टिस अजय भनोट की अदालत के बहिष्कार की c, जानिए पूरा विवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज और वकीलों के बीच टकराव! जस्टिस अजय भनोट की अदालत के बहिष्कार की c, जानिए पूरा विवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज और वकीलों के बीच कथित दुर्व्यवहार को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस अजय भनोट की अदालत का बहिष्कार करने की चेतावनी दी है। एसोसिएशन का आरोप है कि कोर्ट की कार्यवाही के दौरान एक वकील को अपमानित किया गया और वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव का भी मजाक उड़ाया गया। इस मामले में बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने 27 अक्टूबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की है। एसोसिएशन ने साफ कहा है कि यदि मामले में उचित कदम नहीं उठाए गए, तो वकील जस्टिस भनोट की अदालत में पेश नहीं होंगे।

कोर्ट रूम में बैठने की व्यवस्था से शुरू हुआ विवाद

बार एसोसिएशन की ओर से मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र के मुताबिक, जस्टिस अजय भनोट की अदालत में पुलिस अधिकारियों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बैठने के लिए आगे की कतार में अलग कुर्सी रखने की व्यवस्था शुरू की गई थी। इसी व्यवस्था को लेकर मंगलवार को कोर्ट रूम में विवाद हुआ।

एसोसिएशन का दावा है कि सुनवाई के दौरान पुलिस अधीक्षक (SP) रैंक का एक अधिकारी एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (AGA) के पीछे वाली कतार में बैठा था। इसी दौरान एक वकील ने अधिकारी से सम्मानपूर्वक पीछे बैठने का अनुरोध किया। पत्र के अनुसार, वकील ने अधिकारी से कहा कि यह उनकी निर्धारित सीट नहीं है।

इसके बाद मामला बढ़ गया। एसोसिएशन का आरोप है कि AGA ने वकील को फटकार लगाई और कहा कि वह इस मामले की शिकायत जज से करेंगे। जब जस्टिस भनोट अदालत में पहुंचे, तो AGA ने उनके सामने वकील के व्यवहार की शिकायत की।

वकील को जेल भेजने का आदेश देने का आरोप, माफी भी मांगनी पड़ी

बार एसोसिएशन के पत्र में आरोप लगाया गया है कि शिकायत सुनने के बाद जस्टिस भनोट ने संबंधित वकील की ओर उंगली उठाई और कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें जेल भेजने का आदेश दे दिया।

एसोसिएशन के मुताबिक, जब वकील ने माफी मांगी, तो उनसे पुलिस अधिकारी से भी माफी मांगने को कहा गया। बार एसोसिएशन ने इस पूरे घटनाक्रम को वकील की गरिमा के खिलाफ बताया है।

हालांकि, ये सभी आरोप बार एसोसिएशन की ओर से भेजे गए पत्र में लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी में जस्टिस भनोट का पक्ष या घटना पर उनकी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए मामले के सभी पहलुओं को समझने के लिए संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

यह विवाद इसलिए भी अहम है, क्योंकि अदालत में जज, वकील और सरकारी पक्ष के बीच संवाद का सीधा संबंध न्यायिक कार्यवाही से होता है। किसी भी पक्ष के व्यवहार को लेकर विवाद होने पर उसका असर अदालत के कामकाज और पेश होने वाले वकीलों पर पड़ सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव का मजाक उड़ाने का भी आरोप

बार एसोसिएशन ने अपने पत्र में एक और गंभीर आरोप लगाया है। उसके मुताबिक, कोर्ट रूम में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव का भी जस्टिस भनोट ने मजाक उड़ाया।

एसोसिएशन का कहना है कि इस कथित व्यवहार से वकीलों के सम्मान और पेशेवर गरिमा को ठेस पहुंची है। संगठन ने इस घटना को गंभीर बताते हुए मुख्य न्यायाधीश से मामले का संज्ञान लेने और उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया है।

पत्र में कोर्ट रूम में अधिकारियों के बैठने के लिए अलग कुर्सी रखने की व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई गई है। एसोसिएशन का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि अदालत में मौजूद लोगों के बीच अनावश्यक विवाद की स्थिति पैदा न हो।

पत्र में चेतावनी भरे लहजे में कहा गया है कि यदि अदालत में किसी वकील का अपमान किया जाता है, तो वकील भी अदालत का अपमान करने से पीछे नहीं हटेगा। इस टिप्पणी के जरिए एसोसिएशन ने अपने विरोध की गंभीरता जाहिर की है।

मुख्य न्यायाधीश को पत्र, कार्रवाई नहीं हुई तो अदालत का बहिष्कार

27 अक्टूबर 2026 को लिखे गए इस पत्र पर इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सीपी उपाध्याय तथा महासचिव एडवोकेट संतोष कुमार मिश्रा के हस्ताक्षर हैं। पत्र रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया है।

एसोसिएशन ने मांग की है कि कथित घटना की गंभीरता को देखते हुए उचित कार्रवाई की जाए। साथ ही चेतावनी दी गई है कि मांग पर कदम नहीं उठाए जाने की स्थिति में जस्टिस अजय भनोट की अदालत का बहिष्कार किया जाएगा।

अब इस मामले में मुख्य न्यायाधीश और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी। यदि बहिष्कार का फैसला लागू होता है, तो संबंधित अदालत में वकीलों की पेशी और मामलों की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। इसका असर उन पक्षकारों पर भी पड़ सकता है, जिनके मामले वहां सूचीबद्ध हैं।

फिलहाल, विवाद से जुड़े आरोप बार एसोसिएशन के पत्र पर आधारित हैं। मामले में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और संबंधित पक्ष क्या रुख अपनाते हैं, इससे ही विवाद की अगली दिशा स्पष्ट होगी।