खुलेआम बिक रहा एसिड, फिर कैसे रुकेंगे हमले? सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से 4 हफ्ते में मांगा जवाब

खुलेआम बिक रहा एसिड, फिर कैसे रुकेंगे हमले? सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से 4 हफ्ते में मांगा जवाब

देश में एसिड हमलों की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार से पूछा है कि पहले दिए गए आदेशों के बावजूद बाजारों में एसिड की खुलेआम बिक्री क्यों जारी है। अदालत ने कहा कि अगर प्रतिबंध और बिक्री को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए दिशानिर्देश जमीन पर लागू ही नहीं हो रहे, तो उनका उद्देश्य पूरा कैसे होगा? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र को एसिड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करने और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सलाह जारी करना काफी नहीं है। राज्यों में नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी ठोस जानकारी सामने आनी चाहिए।

यह मामला सिर्फ एसिड की बिक्री तक सीमित नहीं है। इससे उन पीड़ितों के इलाज, मुआवजे और पुनर्वास का सवाल भी जुड़ा है, जिनकी जिंदगी एसिड हमले के बाद पूरी तरह बदल जाती है।

एसिड की बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा- पुराने आदेश कहां गए?

मंगलवार, 27 अक्टूबर को एसिड हमलों के पीड़ितों के पुनर्वास और एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

पीठ ने कहा कि बाजारों में एसिड आसानी से उपलब्ध होना अदालत के पहले के आदेशों के उद्देश्य को कमजोर करता है। कोर्ट ने इस स्थिति को नीतिगत विफलता की ओर इशारा करने वाला बताया और केंद्र से पूछा कि एसिड की अवैध बिक्री रोकने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा गया। अदालत का जोर इस बात पर था कि नियम कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

एसिड हमले के मामलों में पीड़ितों को गंभीर शारीरिक चोटों के साथ लंबे समय तक इलाज और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में एसिड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण को अदालत ने गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा माना।

2013 और 2015 के आदेशों के बावजूद बिक्री पर नियंत्रण क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि वह पहले भी एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने के निर्देश दे चुका है। इन निर्देशों के तहत एसिड खरीदने वाले व्यक्ति की पहचान और पते का प्रमाण लेना, खरीदने का कारण दर्ज करना और नाबालिगों को एसिड बेचने पर रोक जैसे उपाय शामिल थे।

इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि एसिड की बिक्री सामान्य और जवाबदेह प्रक्रिया के तहत हो तथा उसका दुरुपयोग रोकने के लिए खरीदार की जानकारी उपलब्ध रहे।

लेकिन अदालत के सामने सवाल यह था कि पहले से मौजूद निर्देशों के बावजूद एसिड बाजारों में आसानी से कैसे मिल रहा है। पीठ ने कहा कि केवल सहानुभूति जताने या भावनात्मक अपील करने वाले परिपत्र जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। राज्यों को दिशानिर्देशों पर अमल कराना होगा।

यहां केंद्र और राज्यों की जिम्मेदारी भी चर्चा में आई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय कई बार राज्यों को परामर्श जारी कर चुका है और मॉडल नियम भी भेजे गए हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों की है।

मेहता ने अदालत को यह भी भरोसा दिलाया कि केंद्र सरकार कठोर सजा के प्रावधानों के साथ नए दिशानिर्देश लाने पर विचार करेगी।

चार सप्ताह में देनी होगी पूरी जानकारी, ऑनलाइन बिक्री भी जांच के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें राज्यों के स्तर पर एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा देना होगा।

अदालत ने जिन जानकारियों की मांग की है, उनमें प्रमुख रूप से ये बिंदु शामिल हैं:

  • राज्यवार लाइसेंस प्राप्त एसिड विक्रेताओं की संख्या।
  • एसिड बेचने वाली दुकानों और प्रतिष्ठानों का कितनी बार निरीक्षण किया गया।
  • अवैध बिक्री के मामलों में कितनी एफआईआर दर्ज हुईं।
  • ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाली बिक्री पर क्या कार्रवाई की गई।
  • एसिड हमले के पीड़ितों को कितना मुआवजा दिया गया।
  • पीड़ितों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए।
  • उनकी शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास के लिए कौन-सी योजनाएं लागू की गईं।

इन जानकारियों से अदालत को यह समझने में मदद मिलेगी कि राज्यों में नियमों का पालन किस स्तर तक हो रहा है। खासतौर पर ऑनलाइन बिक्री से जुड़े आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि अदालत ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण भी मांगा है।

अब केंद्र सरकार को केवल दिशानिर्देश जारी करने की जानकारी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन से जुड़े ठोस आंकड़े भी पेश करने होंगे।

पीड़ितों को इलाज और मुआवजा मिलने में देरी पर भी चिंता

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि एसिड हमले के पीड़ितों को मुआवजा मिलने में देरी हो रही है। कुछ मामलों में उन्हें इलाज उपलब्ध कराने से भी इनकार किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।

पीड़ितों के लिए समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है। इसके अलावा, लंबे समय तक चलने वाले उपचार, आर्थिक परेशानियों और सामाजिक चुनौतियों के बीच पुनर्वास की जरूरत भी बनी रहती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने से संबंधित कानूनी प्रावधानों और पहले दिए गए निर्देशों के पालन पर भी जानकारी मांगी है। इस संदर्भ में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357C के तहत मुफ्त इलाज की व्यवस्था से जुड़ी जानकारी भी हलफनामे में देने को कहा गया है।

अदालत ने जोर दिया कि सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार में पीड़ितों का उचित पुनर्वास भी शामिल है। इसका मतलब केवल इलाज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामान्य जीवन में वापस लौटने के लिए जरूरी सहायता देना भी है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी। उस दिन केंद्र की ओर से पेश की जाने वाली जानकारी और राज्यों में एसिड की बिक्री पर नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम अहम होंगे।

सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई का उद्देश्य साफ है—एसिड की बिक्री से जुड़े नियमों को प्रभावी बनाना और हमले के पीड़ितों को इलाज, मुआवजे तथा पुनर्वास का अधिकार दिलाने के लिए जवाबदेही तय करना।