सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि एक न्यायिक संस्थान के कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके कामकाज पर किसी मंत्रालय या निजी एजेंसी का जरूरत से ज्यादा नियंत्रण उसकी स्वतंत्रता के लिए ठीक नहीं है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने यहां तक टिप्पणी की कि मंत्रालय इस संस्थान पर पूरी पकड़ बनाना चाहता है और यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
गुरुवार को इस मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। मामला NCLT के न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ संकेत दिए कि भर्ती की प्रक्रिया भले ही किसी बाहरी एजेंसी से कराई जाए, लेकिन कर्मचारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण और नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध ट्रिब्यूनल के पास ही रहना चाहिए।
निजी एजेंसी को भर्ती की जिम्मेदारी, पुराने कर्मचारियों की नौकरी पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि NCLT में कर्मचारियों की भर्ती की पूरी प्रक्रिया एक निजी संस्था को सौंप दी गई है। इसमें न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं।
उन्होंने अदालत के सामने आशंका जताई कि पिछले करीब आठ वर्षों से ट्रिब्यूनल में काम कर रहे कर्मचारियों को 1 या 2 नवंबर तक हटाया जा सकता है। उनका कहना था कि ये कर्मचारी भले ही न्यायिक संस्थान के रोजमर्रा के कामकाज में अहम भूमिका निभाते हों, लेकिन नई व्यवस्था के तहत उनका दर्जा निजी एजेंसी के कर्मचारियों जैसा हो जाएगा।
अरोड़ा ने दलील दी कि इससे न्यायिक सदस्यों और कर्मचारियों के बीच कामकाज का तालमेल प्रभावित हो सकता है। साथ ही, न्यायिक कार्यों की स्वतंत्रता पर भी असर पड़ने की आशंका है।
CJI ने कहा- नियुक्तियों की ताकत NCLT अध्यक्ष के पास होनी चाहिए
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी नियुक्तियों पर नियंत्रण को लेकर आई। CJI सूर्यकांत ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति करने का अधिकार NCLT के अध्यक्ष के पास होना चाहिए। अदालत के मुताबिक, किसी बाहरी एजेंसी को भर्ती प्रक्रिया सौंपने का मतलब यह नहीं हो सकता कि संस्थान अपने कर्मचारियों पर नियंत्रण भी खो दे।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि भर्ती की प्रक्रिया आउटसोर्स की जा सकती है, लेकिन नियोक्ता और कर्मचारी के बीच वास्तविक संबंध ट्रिब्यूनल के साथ ही रहना चाहिए।
CJI ने इस बात से सहमति जताई कि पूरे मामले में संस्थागत स्वायत्तता का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मंत्रालय की भूमिका ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे NCLT के प्रशासनिक कामकाज पर उसका पूरा नियंत्रण स्थापित हो जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि NCLT के अध्यक्ष जरूरत पड़ने पर UPSC या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी एजेंसियों के माध्यम से भर्ती करा सकते हैं। यानी भर्ती का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन अंतिम प्रशासनिक अधिकार संस्थान के पास रहने चाहिए।
कर्मचारियों को राहत देने से कोर्ट का इनकार, संविधान के प्रावधान भी उठे
सुनवाई के दौरान मीनाक्षी अरोड़ा ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी और सार्वजनिक रोजगार में समानता तथा अवसर की समानता सुनिश्चित करना जरूरी है। अगर भर्ती नियमों का पालन किए बिना कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता है, तो इस प्रक्रिया पर कानूनी सवाल उठ सकते हैं।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि NCLT के अध्यक्ष की मंजूरी के बिना किसी भी मौजूदा कर्मचारी को नौकरी से न हटाया जाए।
हालांकि, CJI सूर्यकांत ने इस मांग पर तत्काल संरक्षण देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अदालत NCLT के अध्यक्ष के अधिकारों को सीमित नहीं करेगी। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित भर्ती प्रक्रिया का पालन किए बिना अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
CJI ने टिप्पणी की कि कुछ कर्मचारी भी ठेकेदारों के माध्यम से आए हैं और अदालत को पता है कि ठेकेदार किस तरह काम करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे ठेकेदारों को न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की जरूरतों की परवाह नहीं होती। इसलिए NCLT के अध्यक्ष को नियुक्तियों के मामले में पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
अब व्यापक संस्थागत हित पर होगी सुनवाई
शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने उन कर्मचारियों की याचिका पर विचार करने को लेकर सावधानी दिखाई, जिनका इस मामले में व्यक्तिगत हित जुड़ा हुआ है। CJI ने कहा कि अदालत केवल कर्मचारियों के निजी हित के आधार पर इस मुद्दे पर विचार नहीं करेगी। अगर NCLT के अध्यक्ष स्वयं इस व्यवस्था पर चिंता जताते हैं, तो अदालत संस्थागत हित में मामले को देख सकती है।
पीठ ने संकेत दिया कि रिपोर्ट मिलने के बाद मामले पर आगे विचार किया जाएगा। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि NCLT जैसे न्यायिक संस्थान की स्वतंत्रता किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के कारण प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
इस मामले का महत्व केवल NCLT के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी जुड़ा है कि न्यायिक संस्थानों के प्रशासनिक फैसलों में मंत्रालयों और निजी एजेंसियों की भूमिका कितनी होनी चाहिए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने संस्थान की स्वायत्तता को अहम मुद्दा मानते हुए व्यापक हित में नोटिस जारी करने का संकेत दिया है।
मामले का नाम: Ziyaul Haq and others v. Union of India and others


