डिजिटल अरेस्ट या साइबर फ्रॉड में डूबे पैसे तो बैंक को देना पड़ सकता है पूरा मुआवजा! सुप्रीम कोर्ट ने RBI को दिए सख्त संकेत, लापरवाही पर होगी जवाबदेही

डिजिटल अरेस्ट या साइबर फ्रॉड में डूबे पैसे तो बैंक को देना पड़ सकता है पूरा मुआवजा! सुप्रीम कोर्ट ने RBI को दिए सख्त संकेत, लापरवाही पर होगी जवाबदेही

डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के नाम पर लोगों की जीवनभर की कमाई लूटने वाले गिरोहों पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अब बैंकों की जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि अगर किसी ग्राहक के साथ साइबर ठगी बैंक या उसके अधिकारियों की लापरवाही के कारण होती है, तो संबंधित बैंक को नुकसान की भरपाई करनी पड़ सकती है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि ऐसी स्थिति में पीड़ित को उसके खाते से निकाली गई रकम के बराबर या उससे अधिक नहीं, बल्कि कम से कम पूरी रकम का मुआवजा मिले। इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से भी सख्त नियामकीय व्यवस्था तैयार करने को कहा गया है।

गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने बैंकों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि केवल दिशा-निर्देश जारी करने से काम नहीं चलेगा, जब तक वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय नहीं होगी।

बैंक की लापरवाही पड़ी भारी तो भरना पड़ सकता है पूरा नुकसान

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंकों के पास अपने ग्राहकों के खातों, लेन-देन और वित्तीय गतिविधियों की जानकारी होती है। ऐसे में अगर किसी खाते में अचानक असामान्य ट्रांजैक्शन होता है, तो बैंक उसे रोकने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाते?

CJI सूर्यकांत ने सवाल किया कि जब बैंक को पता होता है कि किस ग्राहक के खाते में कितनी रकम है, तो संदिग्ध लेन-देन के समय सुरक्षा व्यवस्था क्यों सक्रिय नहीं होती? अदालत का मानना है कि बैंकों को अपने ग्राहकों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार करना चाहिए।

पीठ ने यह भी कहा कि अगर किसी साइबर फ्रॉड में बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही सामने आती है, तो बैंक को इसकी जिम्मेदारी से बचने नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने एक ऐसी व्यवस्था का सुझाव दिया, जिसमें संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पहचान होते ही उसे अस्थायी रूप से रोक दिया जाए। इसके बाद स्थानीय पुलिस को सूचना दी जाए और ग्राहक से पुष्टि की जाए कि उसने वास्तव में यह भुगतान किया है या नहीं।

RBI की तैयारी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, बैंकों को लेकर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड रोकने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। RBI भी कुछ नए नियामकीय उपायों पर काम कर रहा है, जिन्हें दिसंबर तक लागू किए जाने की संभावना है।

उन्होंने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा दूरसंचार विभाग (DoT) मिलकर इस दिशा में काम कर रहे हैं। सभी बैंकों को एक समान व्यवस्था में लाने के लिए कुछ अतिरिक्त समय की जरूरत है।

हालांकि, अदालत इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखी।

सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनई, जो इस मामले में एमिकस क्यूरी हैं, ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के बावजूद डिजिटल अरेस्ट की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने हाल ही में हुई एक घटना का भी जिक्र किया।

इस पर CJI ने सवाल उठाया कि RBI अभी भी बैंकों से सलाह-मशविरा करने में समय क्यों लगा रहा है? उन्होंने चिंता जताई कि जब बैंकों के अधिकारियों की भूमिका पर ही सवाल उठ रहे हैं, तब उन्हीं बैंकों से सुझाव लेकर समाधान तैयार करना कितना प्रभावी होगा।

CJI ने यह भी कहा कि जब तक बैंकों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं होगा, तब तक उनके काम करने के तरीके में जरूरी बदलाव आना मुश्किल है।

हजारों करोड़ की ठगी पर बैंक अधिकारियों की भी तय होगी जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट को देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े बड़े वित्तीय अपराधों में से एक बताते हुए कहा कि इस तरह की ठगी में हजारों करोड़ रुपये लोगों के खातों से निकाले जा चुके हैं।

CJI सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि बैंकों को ग्राहकों के खातों को जोखिम के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटना चाहिए। इससे संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करना आसान हो सकता है।

अदालत ने यह भी पूछा कि क्या मौजूदा नियमों में ऐसा प्रावधान बनाया जा सकता है, जिसके तहत असामान्य रकम का ट्रांजैक्शन होने पर बैंक उसे रोक सकें और पुलिस को इसकी जानकारी दे सकें।

सुनवाई में व्हाट्सएप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका पर भी चर्चा हुई। अदालत ने पूछा कि क्या प्रस्तावित नियमों में उन प्लेटफॉर्म को भी शामिल किया गया है, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी लोगों को डराने, फर्जी संदेश भेजने और पैसे ट्रांसफर कराने के लिए करते हैं।

पीठ ने यह आशंका भी जताई कि बैंक शायद इसलिए सख्त कदम उठाने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके कारोबार और लेन-देन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

अटॉर्नी जनरल ने बताया कि बैंक अधिकारियों की जवाबदेही का पहलू भी विचाराधीन है। अगर किसी अधिकारी की अपराधियों के साथ मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट चाहता है अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था, पीड़ित को मिले पूरी रकम

इस सुनवाई का सबसे अहम पहलू बैंकिंग संस्थानों पर ‘Strict Liability’ यानी सख्त जवाबदेही लागू करने का प्रस्ताव रहा। जस्टिस बागची ने कहा कि RBI के प्रस्तावित नियमों में यह देखना जरूरी होगा कि वे वास्तव में ग्राहकों को कितनी सुरक्षा देते हैं।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि एक अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके तहत किसी संदिग्ध ट्रांजैक्शन को तब तक रोका जाए, जब तक उसकी वास्तविकता की लिखित पुष्टि नहीं हो जाती।

अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि RBI के प्रस्तावित नियामकीय उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि अगर उनकी उचित सावधानी (Due Diligence) में कमी के कारण किसी व्यक्ति के साथ डिजिटल अरेस्ट या साइबर फ्रॉड होता है, तो उसे पूरी रकम का मुआवजा दिया जाए।

अदालत के प्रस्ताव के मुताबिक, यह मुआवजा पीड़ित द्वारा गंवाई गई रकम से कम नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, संबंधित बैंक या वित्तीय संस्थान को कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है।

इस मामले का आम बैंक ग्राहकों के लिए खास महत्व है। अगर प्रस्तावित व्यवस्था लागू होती है, तो साइबर ठगी के मामलों में केवल पीड़ित को ही जिम्मेदार मानने के बजाय बैंक की सुरक्षा व्यवस्था और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतिम रूप से सभी साइबर फ्रॉड मामलों में बैंक को मुआवजा देने का सार्वभौमिक आदेश नहीं दिया है। फिलहाल अदालत RBI के प्रस्तावित नियमों में ऐसी अनिवार्य व्यवस्था शामिल करने पर जोर दे रही है, जिसमें बैंक की लापरवाही साबित होने पर पीड़ित को पूरा मुआवजा मिल सके।

मामले का नाम: In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents, SMW (Crl.) 3/2025