अदालतों में मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला आने में कितना समय लगता है? क्या आम नागरिक RTI लगाकर यह जानकारी मांग सकता है कि किस जज ने कितने मामलों में फैसला सुनाने में देरी की? इस सवाल पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के जन सूचना अधिकारी (PIO) को उन मामलों का रिकॉर्ड तलाशने और उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था, जिनमें फैसला सुरक्षित रखने के दो महीने बाद भी सुनाया नहीं गया था।
जस्टिस अमित महाजन ने स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत किसी सरकारी या सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसा नया डेटा तैयार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसके पास पहले से मौजूद ही नहीं है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर PIO को रिकॉर्ड खंगालने का निर्देश नहीं दिया जा सकता कि संबंधित जानकारी कोर्ट मास्टर्स या चीफ जस्टिस के कार्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए।
2009 में RTI से शुरू हुआ था मामला, जज के फैसलों का मांगा गया था हिसाब
इस पूरे विवाद की शुरुआत अप्रैल 2009 में हुई थी। पूर्व न्यायिक अधिकारी पीडी गुप्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में RTI आवेदन दाखिल किया था। उन्होंने तत्कालीन जस्टिस एके सिकरी की अदालत में सुने गए उन सभी मामलों की जानकारी मांगी थी, जिनमें बहस पूरी होने के दो महीने से ज्यादा समय बाद फैसला सुनाया गया था।
इसमें वे मामले भी शामिल थे, जिनकी सुनवाई जस्टिस सिकरी ने अकेले या डिवीजन बेंच के सदस्य के तौर पर की थी।
गुप्ता ने अपने मामले का उदाहरण देते हुए बताया था कि 31 जुलाई 2007 को उनके मामले में बहस पूरी हो गई थी, लेकिन अदालत ने फैसला करीब नौ महीने बाद यानी 2 मई 2008 को सुनाया।
उन्होंने इसी आधार पर जानकारी मांगी थी कि ऐसे कितने मामलों में फैसला सुनाने में दो महीने से ज्यादा का समय लगा।
शुरुआत में हाईकोर्ट के जन सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि इस तरह का कोई अलग रिकॉर्ड तैयार या संकलित नहीं किया जाता है। प्रथम अपीलीय प्राधिकरण ने भी PIO के जवाब को सही माना।
लेकिन मामला केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा, जहां से तस्वीर बदल गई।
CIC ने PIO को रिकॉर्ड खंगालने का दिया था आदेश
गुप्ता की दूसरी अपील पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग ने PIO को संबंधित रिकॉर्ड तलाशने का निर्देश दिया था।
आयोग ने कहा था कि कोर्ट मास्टर्स की ओर से रजिस्ट्रार के माध्यम से चीफ जस्टिस को भेजी जाने वाली मासिक रिपोर्टों की जांच की जाए। इन रिपोर्टों में उन मामलों का विवरण शामिल था, जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया था, लेकिन संबंधित महीने में फैसला नहीं सुनाया गया।
हालांकि, CIC ने जानकारी की अवधि सीमित रखते हुए RTI आवेदन से पहले के दो वर्षों का डेटा मांगा था। आयोग का मानना था कि जस्टिस सिकरी के पूरे कार्यकाल का रिकॉर्ड तैयार करना काफी मुश्किल होगा और इससे सरकारी संसाधनों पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा।
इसके बाद हाईकोर्ट के PIO ने CIC के 26 मई 2011 के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
PIO की तरफ से दलील दी गई कि मांगी गई जानकारी किसी अधिकारी के पास अलग से उपलब्ध नहीं है। मासिक रिपोर्टें सीलबंद लिफाफे में चीफ जस्टिस को भेजी जाती थीं और उन्हें एक विशेष विश्वास आधारित व्यवस्था के तहत रखा जाता था।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला, RTI कानून की सीमा समझाई
जस्टिस अमित महाजन ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया।
अदालत ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के ‘अनिल राय बनाम बिहार राज्य’ मामले में दिए गए निर्देशों के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2003 को एक प्रशासनिक आदेश जारी किया था।
इसके तहत कोर्ट मास्टर्स को हर महीने उन मामलों की सूची तैयार करनी होती थी, जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया था, लेकिन उस महीने फैसला नहीं सुनाया गया। इन सूचियों को सीलबंद लिफाफे में रजिस्ट्रार (प्रशासन-न्यायिक) के पास जमा किया जाता था, ताकि उन्हें चीफ जस्टिस के सामने रखा जा सके।
हालांकि, इस व्यवस्था में कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि इन सूचियों को अलग-अलग जजों के नाम के आधार पर तैयार किया जाए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम आदित्य बंदोपाध्याय’ फैसले का भी हवाला दिया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि RTI के तहत वही जानकारी मांगी जा सकती है, जो संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण के पास पहले से मौजूद हो या उसके नियंत्रण में हो।
इसके अलावा, ‘रजिस्ट्रार, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया बनाम कमोडोर लोकेश के. बत्रा’ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया था कि RTI अधिकारियों की जिम्मेदारी आवेदक की मांग के अनुसार नया डेटा तैयार करना नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने CIC का आदेश किया रद्द, जनहित पर भी रखी बात
जस्टिस महाजन ने कहा कि पीडी गुप्ता को मांगी गई जानकारी देने के लिए PIO को किसी एक जज द्वारा सुने गए सभी मामलों के रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती। इसके बाद हर मामले में बहस पूरी होने और फैसला सुनाए जाने के बीच का समय निकालना पड़ता। फिर इन आंकड़ों को जोड़कर एक नई सूची तैयार करनी होती।
अदालत के मुताबिक, यह केवल उपलब्ध रिकॉर्ड देने का मामला नहीं, बल्कि नए सिरे से जानकारी जुटाने और उसका संकलन करने जैसा काम है। RTI कानून किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जानकारी की अवधि दो साल तक सीमित कर देने से इस काम की प्रकृति नहीं बदल जाती। इसके लिए PIO को फिर भी अलग-अलग मामलों की जांच करके नया डेटा तैयार करना पड़ता।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अदालतों में समय पर फैसले सुनाया जाना निश्चित रूप से जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। किसी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला आने में लंबा समय लगना संबंधित पक्षों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
लेकिन अदालत ने साफ किया कि जनहित का हवाला देकर किसी सरकारी संस्था को ऐसा रिकॉर्ड बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसके पास पहले से मौजूद नहीं है।
इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने PIO की याचिका स्वीकार करते हुए 26 मई 2011 को केंद्रीय सूचना आयोग की ओर से जारी आदेश रद्द कर दिया।
केस का नाम: Public Information Officer v. P.D. Gupta
इस फैसले का आम लोगों के लिए मतलब: RTI के जरिए सरकारी संस्थाओं से उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेज मांगे जा सकते हैं, लेकिन किसी अधिकारी को अलग-अलग रिकॉर्ड की जांच करके नया विश्लेषण या आंकड़ों का संकलन तैयार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

