कहते हैं कि जब चुनावी साल आता है तो सियासी उथल-पुथल भी शुरु हो जाती है. सभी राजनीतिक दल खुद को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं. ऐसा ही इस बार 2019 चुनावी साल में देखने को मिल रहा है. सियासत, चुनावों को लेकर गर्मा उठी है लेकिन इस वक्त सबकी नजरें राजनीतिक तौर पर सबसे अहम प्रदेश उत्तरप्रदेश पर टिकी हुई है.
सपा-बसपा ने सियासी गठबंधन कर आरएलडी को भी अपने साथ जोड़ लिया है यानि जाट वोटरों को साधने की एक कोशिश की है. इसी बीच मुसलमानों के बड़े संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का अखिलेश यादव से मुलाकात करना कांग्रेस में खलबली पैदा कर सकता है.
कांग्रेस से है पुराना नाता
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कांग्रेस से बड़ा पुराना नाता है, आजादी के बाद से ही दोनों का रिश्ता बड़ा ही मजबूत रहा है. ऐसे में जमीयत के अध्यक्ष मदनी का अखिलेश यादव से मिलना कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रहा है. ये मुलाकात कई कयासों को हवा देती है.
जानकारी के मुताबिक मदनी और अखिलेश की ये मुलाकात करीब 1 घंटे तक चली. इस खबर की पुष्टि जमीयत उलेमा ए हिन्द के दिल्ली स्थित कार्यलय ने की है. फिलहाल, माना जा रहा है कि दोनों के बीच यूपी के सियासी और समाजी हालातों पर बात हुई है.
कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकती है ये मुलाकात
उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोटरों का एक बड़ा तबका है. अगर मौलाना मदनी सपा-बसपा-आरएलडी के साथ गठबंधन में शामिल होते हैं तो कांग्रेस की बची-खुची आस पर भी पानी फिर सकता है. कांग्रेस को सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन से तो आउट कर दिया जा चुका है और ऐसे में मुस्लिम वोट भी कांग्रेस के हाथ से खिसक गए तो कांग्रेस के हाथ हार के अलावा कुछ नहीं लगेगा.
मौलाना अरशद देवबंद के बड़े इस्लामिक संस्थान दारुल उलूम में टीचर भी हैं और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्य्क्ष होने के नाते उनकी बातों की एक अहमियत है. मुसलमान उनकी बातों को तवज्जो देते हैं. सपा-बसपा ने पहले जाट वोट बैंक को साधा और अब हो सकता है कि मुस्लिमों पर भी सपा-बसपा अपना दांव चलें.