इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा कि CrPC की धारा 125 जो अब भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 है- के तहत एक बहू अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है. कोर्ट ने यह भी कहा कि स्वर्गीय बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण कार्यवाही में विचार के दायरे में नहीं आती हैं.
पिछले दिनों जारी आदेश में, जस्टिस मदन पाल सिंह ने सुनवाई के दौरान कहा कि भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और यह सिर्फ उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है जिनका उल्लेख इस धारा में स्पष्ट रूप से किया गया है, और सास-ससुर उस दायरे में नहीं आते हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि एक नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लग रहा हो, किसी वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है.



