देश में चुनावी माहौल के बीच महिला आरक्षण का मुद्दा लगातार चर्चा में है। मंचों से लेकर घोषणापत्र तक, हर जगह महिलाओं को सशक्त बनाने की बात कही जा रही है। लेकिन जब बात टिकट वितरण की आती है, तो तस्वीर उतनी संतुलित नजर नहीं आती। असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी—इन पांच राज्यों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक दलों के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
इन राज्यों में चुनाव प्रक्रिया जारी है या पूरी हो चुकी है, और 4 मई को नतीजे आने हैं। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या महिलाओं को वास्तव में बराबरी का मौका दिया गया है।
केरल और असम: महिला भागीदारी सबसे कम
केरल में कुल 863 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन इनमें सिर्फ 92 महिलाएं हैं, यानी करीब 11 प्रतिशत। बाकी 771 उम्मीदवार पुरुष हैं। प्रमुख दलों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी सीमित ही दिखती है। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस ने 85 में से सिर्फ 7 महिलाओं को टिकट दिया, जबकि बीजेपी ने 93 में से 13 और सीपीएम ने 77 में से 12 महिलाओं को मौका दिया।
असम की स्थिति इससे भी कमजोर है। यहां कुल 722 उम्मीदवारों में सिर्फ 60 महिलाएं हैं, यानी करीब 8 प्रतिशत। खास बात यह है कि राज्य की मतदाता सूची में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है, लेकिन टिकट वितरण में यह अनुपात नजर नहीं आता।
तमिलनाडु और पुडुचेरी: हल्का सुधार, पर दूरी बाकी
तमिलनाडु में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत तक पहुंची है। कुल 3992 उम्मीदवारों में से 442 महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं। यह पिछले चुनावों की तुलना में थोड़ा सुधार जरूर दिखाता है, लेकिन बराबरी से अभी भी काफी दूर है।
पुडुचेरी में भी लगभग यही स्थिति है। यहां 291 उम्मीदवारों में 40 महिलाएं हैं, जो कुल का करीब 14 प्रतिशत है। अलग-अलग दलों ने महिलाओं को सीमित संख्या में टिकट दिए हैं, जिससे स्पष्ट है कि सुधार की गुंजाइश अभी बाकी है।
पश्चिम बंगाल: राजनीतिक प्रभाव के बावजूद सीमित हिस्सेदारी
पश्चिम बंगाल में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अक्सर चर्चा में रहती है, खासकर तृणमूल कांग्रेस के संदर्भ में। इसके बावजूद यहां कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 11 प्रतिशत ही है।
हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने 52 महिलाओं को टिकट देकर बाकी दलों से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसके बाद कांग्रेस (35), लेफ्ट (34) और बीजेपी (33) का नंबर आता है। फिर भी, कुल अनुपात संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।
बड़ी तस्वीर: वादों और हकीकत के बीच अंतर
इन पांच राज्यों के आंकड़े एक स्पष्ट संदेश देते हैं—महिलाएं चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा जरूर हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर उन्हें अब भी सीमित अवसर मिल रहे हैं।
जबकि महिला मतदाता हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं, टिकट वितरण में उनकी हिस्सेदारी दो अंकों से आगे नहीं बढ़ पा रही। यह अंतर नीतियों और जमीनी अमल के बीच मौजूद खाई को उजागर करता है।
आने वाले समय में महिला आरक्षण कानून और राजनीतिक दलों की रणनीति इस दिशा में क्या बदलाव लाती है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल, आंकड़े यही बताते हैं कि आधी आबादी को पूरा प्रतिनिधित्व मिलने में अभी वक्त लगेगा।


