उद्धव की सीट पर कांग्रेस की नजर, INDIA गठबंधन में खींचतान तेज; क्या आमने-सामने आएंगे साथी दल?

उद्धव की सीट पर कांग्रेस की नजर, INDIA गठबंधन में खींचतान तेज; क्या आमने-सामने आएंगे साथी दल?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। वजह है उद्धव ठाकरे का विधान परिषद का सदस्य न बनने का फैसला। इस फैसले ने न सिर्फ उनकी पार्टी के भीतर, बल्कि पूरे विपक्षी गठबंधन INDIA में नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल यह है कि उनकी खाली हो रही सीट पर किसका दावा मजबूत रहेगा। सूत्रों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे खुद सदन में नहीं जाना चाहते। ऐसे में उनकी पार्टी, यानी उद्धव सेना, अंबादास दानवे को विधान परिषद भेजने की तैयारी में है। लेकिन मामला इतना सीधा नहीं दिख रहा।

कांग्रेस का संकेत: ‘जरूरत पड़ी तो अपना उम्मीदवार’

इस सीट को लेकर कांग्रेस ने अब अपनी दिलचस्पी खुलकर जतानी शुरू कर दी है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि अगर उद्धव ठाकरे खुद चुनाव नहीं लड़ते, तो कांग्रेस अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार सकती है। महाराष्ट्र में इस समय विधान परिषद की कुल 9 सीटें खाली हो रही हैं। इनमें से विपक्षी गठबंधन के पास सिर्फ एक सीट जीतने की स्थिति में है। ऐसे में दावेदारों की संख्या ज्यादा और सीट कम होने से स्थिति जटिल हो गई है। कांग्रेस का तर्क यह है कि किसी भी सहयोगी दल को एकतरफा फैसला नहीं लेना चाहिए। पार्टी नेताओं का मानना है कि गठबंधन के भीतर सहमति बनाकर उम्मीदवार तय होना चाहिए।

अंदरूनी बयानबाजी ने बढ़ाया तनाव

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सकपाल ने हाल ही में उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। उन्होंने उन्हें खुद चुनाव लड़ने की सलाह दी थी। साथ ही, यह भी संकेत दिया था कि अगर ऐसा नहीं होता है, तो कांग्रेस अपने विकल्पों पर विचार करेगी। दिल्ली में हुई बैठकों के बाद यह चर्चा और तेज हो गई है कि कांग्रेस हाईकमान से इस सीट पर दावा करने की मांग कर सकती है। कांग्रेस नेता भाई जगताप ने तो यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़ी तो अंबादास दानवे के खिलाफ उम्मीदवार भी उतारा जा सकता है। इस तरह के बयानों ने साफ कर दिया है कि विपक्षी खेमे में इस मुद्दे पर एकराय नहीं बन पा रही है।

राजनीतिक असर: गठबंधन में दरार का खतरा?

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। यह विपक्षी एकता की परीक्षा भी बनता दिख रहा है। 2020 में जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने थे, तब कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर उनका समर्थन किया था। उस समय तीनों दल एकजुट थे। लेकिन अब जब विपक्ष में रहते हुए सीटों की संख्या सीमित है, तो हर दल अपने हिस्से को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है। अगर कांग्रेस और उद्धव सेना के बीच सहमति नहीं बनती, तो यह सीधा मुकाबला भी बन सकता है। ऐसी स्थिति में सत्ताधारी पक्ष को भी फायदा मिल सकता है, क्योंकि वोटों का बंटवारा विपक्ष को कमजोर कर सकता है।

आगे क्या?

फिलहाल स्थिति खुली हुई है। उद्धव सेना ने अंबादास दानवे के नाम का ऐलान कर दिया है, लेकिन कांग्रेस का रुख साफ संकेत दे रहा है कि मामला अभी तय नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या गठबंधन के भीतर सहमति बनती है या यह मुद्दा खुली राजनीतिक टकराव में बदल जाता है।