पश्चिम बंगाल, जिसे कभी देश का औद्योगिक पावरहाउस कहा जाता था, आज निवेश के मोर्चे पर कड़े संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। राजनीति के गलियारों में बड़े बदलाव की आहट के बीच अब यह सवाल हर बंगाली मानस के जेहन में है कि क्या वाकई राज्य के दिन बहुरने वाले हैं? दरअसल, किसी भी घर या राज्य की खुशहाली का रास्ता उसकी आर्थिक मजबूती से होकर गुजरता है, लेकिन बंगाल के मामले में ‘निवेश’ ही सबसे बड़ा विलेन साबित हुआ है। आंकड़ों की हकीकत डराने वाली है—करीब 6600 से अधिक कंपनियां या तो ताला लगाकर राज्य से बाहर चली गईं या उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर दूसरे राज्यों का रुख कर लिया। जब किसी राज्य से निवेश का पहिया रुक जाता है, तो उसका सीधा असर वहां के युवाओं के रोजगार और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
दिग्गजों का मोहभंग: जब टाटा, अंबानी और बिड़ला ने मोड़ा मुंह
बंगाल की औद्योगिक गिरावट की कहानी किसी एक दिन की उपज नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुरानी पड़ चुकी इंडस्ट्री को अपडेट न करने और नई टेक्नोलॉजी को अपनाने में दिखाई गई सुस्ती का नतीजा है। इसका सबसे बड़ा और चर्चित उदाहरण टाटा का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ नैनो था। रतन टाटा इस प्रोजेक्ट को सिंगुर में स्थापित करना चाहते थे, लेकिन साल 2008 के विवादों के बाद इसे गुजरात के साणंद में शिफ्ट करना पड़ा। आज साणंद देश का बड़ा ऑटो हब है, जबकि बंगाल के हाथ सिर्फ खाली जमीन और मायूसी आई।
इतना ही नहीं, आईटीसी (ITC) जैसी दिग्गज कंपनी, जिसका आधार कभी कोलकाता हुआ करता था, उसने भी गुजरात और महाराष्ट्र में अपनी सक्रियता बढ़ा दी। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी बंगाल में अपनी मौजूदगी कम कर जामनगर पर फोकस किया। बिड़ला ग्रुप की कई पुरानी यूनिट्स बंद हो गईं। जानकारों की मानें तो सिर्फ नैनो के रहने भर से करीब 10,000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता था, जो मौका राज्य ने गंवा दिया।
जूट और इंजीनियरिंग: पहचान खोते पारंपरिक उद्योग
कभी बंगाल की पहचान यहां की जूट मिलें हुआ करती थीं, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती थीं। आज स्थिति यह है कि एक दर्जन से ज्यादा बड़ी जूट मिल्स पूरी तरह ठप हो चुकी हैं। ‘नेशनल जूट मैन्युफैक्चर कॉरपोरेशन’ साल 2018 से बंद है। यूनियन जूट मिल्स, एलेक्जेन्ड्रा और कनिशन जूट मिल जैसी ऐतिहासिक इकाइयों में अब सिर्फ सन्नाटा पसरा है। पोर्ट ग्लोस्टर जैसी मिलें, जिनका एक समय में डंका बजता था, वे अब केवल कागजों तक सिमट कर रह गई हैं। इंजीनियरिंग सेक्टर का हाल भी इससे जुदा नहीं है; हिंदुस्तान मोटर्स का प्लांट 2014 से बंद है और डनलप इंडिया जैसी कंपनी की तूती अब बीते दौर की बात हो गई है।
घोटालों की मार और मध्यम उद्योगों की बदहाली
औद्योगिक मोर्चे पर पिट रहे बंगाल को रही-सही कसर ‘चिटफंड घोटालों’ ने पूरी कर दी। साल 2013 में शारदा ग्रुप का घोटाला सामने आने के बाद राज्य का फाइनेंस सेक्टर पूरी तरह चरमरा गया। इसके तुरंत बाद रोज वैली कांड ने रही-सही साख भी खत्म कर दी। इसका खामियाजा छोटे निवेशकों और मध्यम उद्योगों (MSME) को भुगतना पड़ा। वर्तमान में हालत यह है कि बंगाल की लगभग 42% फैक्ट्रियां ‘बीमार’ घोषित हैं या बंद होने की कगार पर हैं। पुरानी इंजीनियरिंग कंपनियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं और नया निवेश आने की राह में पॉलिसी की बाधाएं दीवार बनकर खड़ी हैं।
क्या अब बदलेगी तस्वीर? यूपी मॉडल की उम्मीद
राज्य में अब राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी की बढ़त के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि क्या बंगाल को भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर ‘निवेश का नया हब’ बनाया जा सकेगा? कारोबारी जगत का एक सीधा सा नियम है—पैसा वहीं जाता है जहां सुरक्षा और सहुलियत मिलती है। बंगाल से जो कंपनियां गईं, वे किसी नाराजगी में नहीं बल्कि बेहतर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की तलाश में गईं। अब देखना यह होगा कि नई व्यवस्था में क्या उन बंद पड़ी 6600 कंपनियों की चिमनियों से दोबारा धुआं निकलेगा या बंगाल की तरक्की का इंतजार और लंबा होगा।


