पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों की गूंज सिर्फ भारत के राजनीतिक गलियारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी लहरें सीमा पार कर पड़ोसी देश बांग्लादेश तक पहुंच गई हैं। 15 साल बाद बंगाल की सत्ता में हुए इस ऐतिहासिक उलटफेर ने ढाका में भी नई चर्चाएं छेड़ दी हैं। जहां एक ओर ममता बनर्जी की हार ने कई लोगों को हैरान किया है, वहीं बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बीएनपी (BNP) के नेताओं ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी की जीत पर खुशी जाहिर की है। इस बदलाव को सिर्फ सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं, बल्कि भारत और बांग्लादेश के बीच दशकों से अटके ‘तीस्ता जल समझौते’ के समाधान की एक बड़ी उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।
ममता की विदाई और सुवेंदु का उदय: ढाका से आई पहली प्रतिक्रिया
बांग्लादेश की बीएनपी पार्टी के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने बंगाल के नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता का इतने लंबे शासन के बाद हारना वाकई चौंकाने वाला है। हालांकि, उन्होंने सुवेंदु अधिकारी को इस शानदार जीत के लिए बधाई देते हुए उम्मीद जताई है कि अब दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक नया और मजबूत अध्याय शुरू होगा। हेलाल का मानना है कि विचारधारा अलग होने के बावजूद, शांति और क्षेत्रीय विकास के मुद्दों पर नई सरकार का रुख सहयोगात्मक रह सकता है। सुवेंदु अधिकारी ने भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर ममता बनर्जी को 15,114 वोटों के अंतर से हराकर अपनी राजनैतिक ताकत का लोहा मनवाया है, और अब पड़ोसी देश की नजरें उनकी भविष्य की नीतियों पर टिकी हैं।
तीस्ता जल समझौता: क्यों बांग्लादेश के लिए यह ‘लाइफलाइन’ है?
बांग्लादेशी नेताओं की खुशी के पीछे सबसे बड़ी वजह तीस्ता नदी के पानी का बंटवारा है। तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है, वहां के करोड़ों किसानों की जीविका का मुख्य आधार है। यह बांग्लादेश की चौथी सबसे बड़ी नदी है, लेकिन पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच 1983 से ही पेंच फंसा हुआ है। 2011 में जब तत्कालीन भारत सरकार एक नई संधि करने के करीब थी, तब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कड़े विरोध के कारण यह समझौता ठंडे बस्ते में चला गया था। ममता बनर्जी का तर्क था कि इस समझौते से उत्तर बंगाल के जिलों में पानी की किल्लत हो जाएगी। अब बांग्लादेश को उम्मीद है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से इस कूटनीतिक गतिरोध को दूर किया जा सकेगा।
बीजेपी का ‘दोहरा शतक’ और बंगाल की नई राजनैतिक दिशा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि राज्य में अब ‘कमल’ का राज होगा। बीजेपी ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया है, जबकि टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई है। यह पहली बार है जब बंगाल में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाल रही है। 9 मई को होने वाला शपथ ग्रहण समारोह न केवल बंगाल की आंतरिक राजनीति को बदलेगा, बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। जानकारों का मानना है कि नई सरकार के आने से सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और जल बंटवारे जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ बेहतर समन्वय देखने को मिल सकता है।
कूटनीतिक रिश्तों में आएगी गर्माहट?
बांग्लादेश के राजनैतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि ममता बनर्जी के क्षेत्रीय हितों के चलते कई बार भारत-बांग्लादेश के बीच होने वाले महत्वपूर्ण समझौतों में देरी हुई। अब अजीजुल बारी हेलाल जैसे नेताओं का कहना है कि सुवेंदु अधिकारी के आने से बातचीत का रास्ता साफ होगा। यदि तीस्ता मुद्दे पर कोई ठोस सहमति बनती है, तो यह न केवल बांग्लादेश के कृषि क्षेत्र के लिए वरदान साबित होगा, बल्कि भारत के लिए भी अपने पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का एक सुनहरा मौका होगा।


