विधानसभाओं में कम हुए ‘मुस्लिम’ चेहरे! बंगाल में 15 साल का सबसे निचला स्तर, जानें चुनावी नतीजों के पीछे का ये चौंकाने वाला ट्रेंड

विधानसभाओं में कम हुए ‘मुस्लिम’ चेहरे! बंगाल में 15 साल का सबसे निचला स्तर, जानें चुनावी नतीजों के पीछे का ये चौंकाने वाला ट्रेंड

देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनावी बिगुल शांत हो चुका है और सत्ता की नई तस्वीरें साफ हो गई हैं। कहीं भारतीय जनता पार्टी का ‘कमल’ खिला है, तो कहीं क्षेत्रीय दलों ने अपनी ‘सीटी’ बजाकर सबको चौंका दिया है। लेकिन इन नतीजों के बीच एक ऐसा आंकड़ा उभरकर सामने आया है, जो देश की सियासत में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की बदलती दिशा को दर्शाता है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2021 के मुकाबले इस बार मुस्लिम विधायकों की संख्या में गिरावट आई है। खासकर पश्चिम बंगाल, जिसे कभी मुस्लिम राजनीति का गढ़ माना जाता था, वहां पिछले 15 सालों में मुस्लिम विधायकों की संख्या अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।

एक आम नागरिक के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में हर समुदाय की वाजिब नुमाइंदगी ही नीतियों में उसकी भागीदारी तय करती है। इस बार चुने गए कुल 823 विधायकों में से केवल 101 मुस्लिम हैं, जो कुल संख्या का लगभग 12.27 प्रतिशत है।

बंगाल की सियासत में घटती नुमाइंदगी: 15 साल में 59 से 40 पर आई सुई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में लगभग 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। लेकिन विधानसभा में उनकी मौजूदगी का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है। साल 2011 में जब सत्ता परिवर्तन हुआ था, तब विधानसभा में 59 मुस्लिम विधायक थे। 2016 में यह संख्या 56 हुई और 2021 में गिरकर 42 पर आ गई। 2026 के इन नतीजों ने इस संख्या को और कम कर दिया है और अब बंगाल विधानसभा में केवल 40 मुस्लिम चेहरे नजर आएंगे।

हैरानी की बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 80 विधायकों में से 34 मुस्लिम हैं, जबकि कांग्रेस और सीपीआई (एम) के गिनती के विधायक भी इसी समुदाय से आते हैं। यह गिरावट तब देखने को मिल रही है जब राज्य में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, लेकिन उनके पास एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है।

‘नई मुस्लिम लीग’ पर छिड़ा सियासी संग्राम: असम के नतीजों ने दी नई बहस को हवा

चुनावी नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने असम में कांग्रेस की जीत पर तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह से कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं, वह पैटर्न इशारा करता है कि कांग्रेस ‘नई मुस्लिम लीग’ की राह पर है।

इस पर कांग्रेस की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने आंकड़ों के जरिए जवाब दिया कि कांग्रेस के देश भर में कुल 664 विधायकों में से 78 प्रतिशत हिंदू हैं और मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी केवल 12 प्रतिशत है। यह बहस दर्शाती है कि चुनाव केवल सीटों की जीत-हार नहीं है, बल्कि यह ध्रुवीकरण और प्रतिनिधित्व की एक बड़ी लड़ाई बन गई है, जिसका सीधा असर राज्य की सामाजिक बनावट पर पड़ता है।

दक्षिण का हाल: केरल में दबदबा बरकरार, लेकिन पुडुचेरी में खाता भी नहीं खुला

अगर हम दक्षिण भारत की ओर रुख करें, तो केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुस्लिम विधायकों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई है। 2021 में जहां 32 विधायक थे, वहीं इस बार 35 मुस्लिम चेहरों ने जीत दर्ज की है। केरल की लगभग 26 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और विधानसभा में भी उनकी हिस्सेदारी 25 प्रतिशत के करीब है, जो कि आबादी के अनुपात में एक संतुलित प्रतिनिधित्व माना जा सकता है।

दूसरी तरफ, तमिलनाडु में मुस्लिम आबादी लगभग 6 प्रतिशत है, लेकिन वहां 234 विधायकों में से केवल 7 (करीब 3 प्रतिशत) मुस्लिम हैं। सबसे निराशाजनक स्थिति पुडुचेरी की रही, जहां 6 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद विधानसभा में इस समुदाय का एक भी प्रतिनिधि नहीं पहुंच सका है। 2021 में वहां एक मुस्लिम विधायक थे, लेकिन इस बार वह सीट भी अल्पसंख्यक समुदाय के हाथ से निकल गई।

कुल मिलाकर, ये नतीजे बताते हैं कि चुनावी राजनीति में प्रतिनिधित्व का गणित बदल रहा है। जहां कुछ राज्यों में समुदाय की आवाज मजबूत हुई है, वहीं पूर्वी भारत के बड़े राज्यों में यह ग्राफ चिंताजनक रूप से नीचे आया है।