पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले में अदालत ने उन्हें फिलहाल किसी भी दंडात्मक कार्रवाई, यानी गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करना होगा और निर्धारित समय पर सीआईडी (CID) के सामने पेश होना पड़ेगा। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर राजनीतिक खींचतान और गुटबाजी की चर्चाएं तेज हैं।
नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से शुरू हुआ विवाद
पूरा विवाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़े एक प्रस्ताव को लेकर खड़ा हुआ है। आरोप है कि इस प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षर उनकी जानकारी या मौजूदगी के बिना किए गए।
बताया जा रहा है कि यह मामला उस बैठक से जुड़ा है, जो तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर बुलाई थी। बैठक में विधानसभा में विपक्ष के नेता के नाम पर चर्चा हुई थी।
बाद में कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि संबंधित दस्तावेजों पर उनके जाली हस्ताक्षर किए गए। आरोप सामने आने के बाद मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया।
हाईकोर्ट ने दी राहत, लेकिन रखीं शर्तें
अभिषेक बनर्जी ने पिछले सप्ताह कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख करते हुए गिरफ्तारी से संरक्षण की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान उनके वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि अभिषेक जांच में पूरा सहयोग करेंगे। इसके बाद जस्टिस कौशिक चंदा की अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत देते हुए गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यह राहत बिना शर्त नहीं है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अभिषेक बनर्जी निर्धारित समय तक सीआईडी के सामने पेश हों और जांच एजेंसी जब भी बुलाए, उन्हें जांच प्रक्रिया में शामिल होना होगा।
मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
दो विधायकों की शिकायत पर शुरू हुई जांच
इस मामले की जांच सीआईडी कर रही है। जांच की शुरुआत दो विधायकों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर हुई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने से जुड़े प्रस्ताव में जाली हस्ताक्षर किए गए थे। इस शिकायत के बाद विधानसभा सचिवालय ने कोलकाता पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
बाद में राज्य सरकार ने मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी। जांच एजेंसी अब दस्तावेजों, हस्ताक्षरों और संबंधित परिस्थितियों की जांच कर रही है।
शिकायत करने वाले विधायक भी बने विवाद का हिस्सा
इस मामले में शिकायत करने वाले विधायक रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा भी राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गए।
तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद यह मामला केवल कानूनी जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के अंदरूनी संघर्ष की चर्चा भी तेज हो गई।
चुनावी हार के बाद बढ़ी राजनीतिक हलचल
हालिया विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के हाथों मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
ऐसे माहौल में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति और कथित फर्जी हस्ताक्षर का यह मामला राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सीआईडी जांच और अदालत की कार्यवाही इस विवाद की दिशा तय कर सकती है।
फिलहाल हाईकोर्ट से मिली अंतरिम राहत ने अभिषेक बनर्जी को तत्काल राहत जरूर दी है, लेकिन जांच जारी रहने के कारण यह मामला अभी खत्म नहीं माना जा रहा।



