तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद AIADMK को महज 21 दिनों के अंदर नया बड़ा झटका लगा है। सोमवार को पार्टी के तीन विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और सत्ताधारी TVK पार्टी में शामिल हो गए। इस घटना ने विपक्षी दलों DMK और AIADMK को एकजुट कर दिया है। दोनों दलों ने TVK पर ‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ का आरोप लगाया है।
आम तमिलनाडु निवासी के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बार-बार हो रहे दलबदल और राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की विकास योजनाएं, कानून-व्यवस्था और स्थिर सरकार का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
विधायकों के इस्तीफे और आरोप-प्रत्यारोप
AIADMK के वरिष्ठ नेताओं सी.वे. षणमुगम और एस.पी. वेलुमणि के गुट से जुड़े तीन विधायकों—मरागाथम कुमारवेल (मदुरंतकम), पी. सत्यभामा (धारापुरम) और एस. जयकुमार (पेरुनदुरई)—ने इस्तीफा दे दिया। स्पीकर JCD प्रभाकर ने इन इस्तीफों को स्वीकार कर लिया, जिससे AIADMK की विधानसभा में संख्या 47 से घटकर 44 रह गई है।
TVK के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की महिलाओं के हित में की गई पहल की तारीफ करते हुए इन विधायकों ने कहा कि वे अपनी मर्जी से पार्टी में शामिल हुए हैं। उन्होंने AIADMK की दोहरी नीति—DMK के साथ गठबंधन और फिर TVK को समर्थन—को लेकर नाराजगी जताई।
AIADMK प्रमुख ई.के. पलानीस्वामी ने इसे पहले से रची गई साजिश बताया, जबकि DMK प्रमुख एम.के. स्टालिन ने भी TVK पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया। TVK ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
AIADMK के अंदरूनी गुटबाजी और सुलह की कोशिश
AIADMK चुनाव के बाद दो गुटों में बंटी हुई है। एक गुट पलानीस्वामी का समर्थन कर रहा है, तो दूसरा षणमुगम-वेलुमणि गुट TVK सरकार को समर्थन दे रहा था। फ्लोर टेस्ट के दौरान 25 विधायकों ने TVK सरकार के पक्ष में मतदान किया था।
हालांकि राहत की बात यह रही कि पलानीस्वामी गुट में 5 विधायक वापस लौट आए हैं, जिनमें एस.एम. सुकुमार (आरकोट) भी शामिल हैं। इससे पलानीस्वामी के समर्थन में विधायकों की संख्या 27 हो गई है, जबकि बागी गुट की ताकत 25 से घटकर 17 रह गई है।
राज्य की राजनीति पर पड़ने वाला असर
इस घटनाक्रम से तमिलनाडु विधानसभा में चार सीटों पर उपचुनाव होने हैं, जिनमें मुख्यमंत्री विजय द्वारा खाली की गई तिरुचिरापल्ली पूर्व सीट भी शामिल है। AIADMK के लिए यह लगातार चौथी चुनावी हार के बाद का बड़ा संकट है।
DMK के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसके कई सहयोगी दल TVK सरकार में शामिल हो चुके हैं। आम जनता अब देख रही है कि यह अस्थिरता राज्य के विकास, रोजगार और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन को कैसे प्रभावित करेगी।
तमिलनाडु की सियासत में यह फूट दर्शाती है कि चुनाव के बाद दलों के अंदरूनी कलह कितनी तेजी से सामने आ रहे हैं। स्थिरता बनाए रखना सभी दलों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।





