कभी-कभी न्याय देर से मिलता है, लेकिन उसका असर गहरा होता है। उत्तर प्रदेश में एक ऐसे ही मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगभग तीन दशक बाद बड़ा फैसला सुनाया है। बचपन में बिजली विभाग की कथित लापरवाही के कारण दोनों हाथ गंवाने वाले व्यक्ति को अब 26.65 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। यह फैसला न सिर्फ पीड़ित के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और जवाबदेही पर भी अहम सवाल खड़े करता है।
बचपन का हादसा, जिंदगी भर का असर
यह मामला मार्च 1997 का है, जब आगरा के नगला पाड़ी इलाके में रहने वाला एक 7 साल का बच्चा, पप्पू, स्कूल के पास लगे 11 हजार वोल्ट के ट्रांसफॉर्मर की चपेट में आ गया था। ट्रांसफॉर्मर बिना किसी सुरक्षा घेराबंदी के खुला पड़ा था।
हादसा इतना गंभीर था कि बच्चे की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उसके दोनों हाथ काटने पड़े। एक पल की लापरवाही ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी। यह घटना आज भी सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा मानकों की स्थिति को लेकर चिंता पैदा करती है।
ट्रायल कोर्ट से निराशा, हाई कोर्ट से राहत
हादसे के बाद पीड़ित के पिता ने बिजली विभाग के खिलाफ मुआवजे की मांग को लेकर अदालत का रुख किया। हालांकि, 2005 में ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया और जिम्मेदारी बच्चे पर ही डाल दी।
इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला हाई कोर्ट पहुंचा। अब, जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने उस पुराने फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि इस घटना के लिए बिजली विभाग की लापरवाही जिम्मेदार थी।
मुआवजा, ब्याज और मुकदमे का खर्च भी शामिल
हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित को 26.65 लाख रुपये का मुआवजा दे। इसके साथ ही, 30 मई 1997 से लेकर भुगतान की तारीख तक इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने मुकदमे के दौरान हुए खर्च की भरपाई का भी आदेश दिया है, जिसमें ट्रायल और अपील दोनों स्तरों की फीस शामिल है। अदालत ने यह रकम एक महीने के भीतर जमा कराने को कहा है, अन्यथा पीड़ित को कानूनी वसूली की कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।
संदेश साफ: लापरवाही की कीमत चुकानी होगी
यह फैसला केवल एक व्यक्ति के लिए राहत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी भी है। सार्वजनिक स्थानों पर बुनियादी सुरक्षा उपायों की अनदेखी कितनी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है, यह मामला उसका उदाहरण है।
आम नागरिक के नजरिए से देखें तो यह फैसला यह भरोसा भी देता है कि लंबे इंतजार के बाद भी न्याय मिल सकता है। साथ ही, यह संस्थाओं को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराता है कि लापरवाही की कीमत अंततः चुकानी ही पड़ती है।


