खाद की कथित कालाबाजारी के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जरूरी सामान की कालाबाजारी और उसकी सप्लाई में जानबूझकर रुकावट डालना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। हर मामले में सिर्फ इसलिए NSA नहीं लगाया जा सकता कि उसमें जरूरी सामान शामिल है। इसी आधार पर कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में खाद की कथित कालाबाजारी से जुड़े चार लोगों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं स्वीकार कर लीं। साथ ही, बुलंदशहर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से जारी हिरासत के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
खाद के तीन ट्रक और कथित कालाबाजारी का मामला क्या है?
यह मामला उत्तर प्रदेश में IFFCO यूरिया की कथित अवैध बिक्री और परिवहन से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पुलिस ने तीन ट्रकों को रोका था। इनमें से प्रत्येक ट्रक में यूरिया के 525 बोरे लदे थे। पुलिस का आरोप था कि ड्राइवर खाद के परिवहन से संबंधित बिल या वाउचर नहीं दिखा सके।
पुलिस के अनुसार, ट्रक चालकों ने बताया कि खाद मोहम्मद हारून की है, जो इस मामले के याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं। बताया गया कि हारून तीसरे ट्रक के साथ एक कार में सफर कर रहे थे और उन्हें हिरासत में लिया गया।
पुलिस के मामले के मुताबिक, खाद की कुल कीमत करीब 5.50 लाख रुपये बताई गई। आरोप है कि इसमें से 4.50 लाख रुपये नकद और एक लाख रुपये डिजिटल भुगतान के जरिए दिए गए थे। यह भी दावा किया गया कि PCF गोदाम में खाद की लोडिंग के समय कुछ अधिकारी मौजूद थे।
जांच एजेंसियों का आरोप था कि खाद को खुले बाजार में अधिक कीमत पर बेचने के लिए ले जाया जा रहा था। इससे निजी लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने और राज्य को नुकसान होने की आशंका जताई गई। हालांकि, ये अभियोजन पक्ष के आरोप हैं; इन्हें अदालत ने अंतिम रूप से साबित नहीं माना।
NSA और कालाबाजारी कानून में क्या अंतर है?
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने दो कानूनों के बीच अंतर स्पष्ट किया। पहला है राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 यानी NSA। दूसरा है जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी और उनकी सप्लाई बनाए रखने से संबंधित कानून, जिसे PBMSEC Act, 1980 कहा जाता है।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मामले का मुख्य आरोप जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी है, तो उससे निपटने के लिए विशेष कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। केवल इस वजह से NSA लागू करना उचित नहीं होगा कि विशेष कानून में एहतियाती हिरासत की अधिकतम अवधि छह महीने है, जबकि NSA के तहत यह अवधि एक साल तक हो सकती है।
अदालत के मुताबिक, कालाबाजारी के मामले में अधिक लंबी हिरासत हासिल करने के लिए NSA का इस्तेमाल करना कानून के दुरुपयोग के समान हो सकता है। पीठ ने दोनों कानूनों के बीच अंतर को बारीक, लेकिन वास्तविक बताया।
आम लोगों के लिए इस फैसले का महत्व यह है कि प्रशासन को किसी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानून लगाने से पहले आरोपों की प्रकृति और संबंधित कानून के दायरे पर ध्यान देना होगा। जरूरी सामान की कालाबाजारी गंभीर मुद्दा हो सकती है, लेकिन उसके नाम पर हर मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू नहीं किया जा सकता।
जरूरी सामान की सप्लाई रोकने पर कब लागू हो सकता है NSA?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि NSA की धारा 3(2) के तहत कार्रवाई का सवाल तब उठ सकता है, जब जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को बाधित करने वाली गतिविधियां सामने आएं।
उदाहरण के तौर पर, अगर जरूरी सामान को उसके गंतव्य तक पहुंचने से शारीरिक रूप से रोका जाता है, सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाली सड़कों को नष्ट किया जाता है या ऐसी कोई दूसरी गतिविधि होती है जिससे जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो परिस्थितियों के आधार पर NSA लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन अगर आरोप मुख्य रूप से जरूरी सामान को अवैध तरीके से खरीदने, बेचने या अधिक कीमत पर बाजार में उतारने से संबंधित है, तो उस मामले की प्रकृति के अनुसार विशेष कानून लागू होगा।
राज्य सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले सूरज पाल साहू बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उस मामले को मौजूदा विवाद से अलग माना।
पीठ ने गौर किया कि सूरज पाल साहू मामले में रेलवे की संपत्ति, जैसे ट्रैक और स्लीपर, को हटाने और चोरी करने के आरोप थे। ऐसे सामान को हटाने से रेलवे सेवाओं के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे पर असर पड़ सकता था। इसलिए वह मामला केवल कालाबाजारी का नहीं, बल्कि एक जरूरी सार्वजनिक सेवा में बाधा पहुंचने की आशंका से जुड़ा था।
इसके विपरीत, मौजूदा मामले में आरोप खाद को अधिक कीमत पर बेचने के लिए कथित रूप से ले जाने और अधिकारियों की संभावित मिलीभगत से संबंधित थे। इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने NSA के तहत हिरासत को उचित नहीं माना।
चार लोगों की हिरासत रद्द, अब क्या होगा?
खाद की कथित कालाबाजारी के मामले में चारों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद NSA के तहत हिरासत के आदेश जारी किए गए थे। उनकी आपत्तियों को एडवाइजरी बोर्ड ने भी खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी से जुड़े मामलों के लिए अलग कानून मौजूद है, तो अधिकारियों को उसी मामले में NSA का सहारा नहीं लेना चाहिए।
हाईकोर्ट ने उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं स्वीकार करते हुए बुलंदशहर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 23 मई, 29 मई और 12 जुलाई 2026 को जारी हिरासत के आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में हिरासत में रखने के लिए आवश्यक न हों।
मोहम्मद हारून बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड 5 अदर्स मामले में आया यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि सख्त कानूनों का इस्तेमाल उनकी तय कानूनी सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए। जरूरी सामान की कालाबाजारी पर कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन हिरासत के लिए सही कानून चुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।


