जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बंद करने के फैसले के बीच 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था? जानिए विरोध के अधिकार पर अदालत की अहम टिप्पणी

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बंद करने के फैसले के बीच 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था? जानिए विरोध के अधिकार पर अदालत की अहम टिप्पणी

दिल्ली में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटा दिया और विरोध सभाओं व रैलियों के लिए तीन वैकल्पिक जगहों—रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और ईस्ट दिल्ली के CBD ग्राउंड—की घोषणा की। इस फैसले के बीच सुप्रीम कोर्ट का 2018 का एक अहम फैसला फिर चर्चा में है। उस समय अदालत ने साफ कहा था कि विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना समस्या का समाधान नहीं है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि प्रदर्शन का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी पसंद की किसी भी जगह पर प्रदर्शन करने की मांग कर सकता है।

जंतर-मंतर से प्रदर्शन हटाने का फैसला क्यों चर्चा में?

दिल्ली पुलिस के हालिया फैसले ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब प्रदर्शन और रैलियों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और ईस्ट दिल्ली के CBD ग्राउंड को विकल्प के तौर पर बताया गया है।

यह मुद्दा केवल प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उन स्थानीय निवासियों और कार्यालयों से भी है, जिन्हें धरने, भीड़, नारेबाजी और यातायात संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसी जगह महत्वपूर्ण होती है, जहां उनकी मांगें संबंधित अधिकारियों और आम जनता तक पहुंच सकें।

इसी संतुलन पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में विस्तार से विचार किया था। मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में अदालत ने माना था कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना उचित समाधान नहीं है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार पर क्या कहा था?

2018 में जस्टिस ए.के. सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ के सामने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाने से जुड़ा मामला आया था। याचिकाकर्ता मज़दूर किसान शक्ति संगठन ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के तहत जारी उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए जंतर-मंतर को जनसभाओं, धरनों और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित किया गया था।

इससे पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी जंतर-मंतर रोड पर धरने, आंदोलन, सार्वजनिक भाषण और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल जैसी गतिविधियों को रोकने के निर्देश दिए थे। यह आदेश स्थानीय निवासियों की उन शिकायतों के बाद आया था, जिनमें प्रदर्शनों से होने वाली परेशानियों का जिक्र किया गया था। NGT ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश भी दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय लोगों को होने वाली असुविधा से जुड़ी चिंताओं को उचित माना, लेकिन कहा कि सभी प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना इसका सही जवाब नहीं है। अदालत के मुताबिक, अधिकारियों को ऐसे नियम और व्यवस्थाएं बनानी चाहिए, जिनसे प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों और स्थानीय निवासियों की सुविधाओं के बीच संतुलन बना रहे।

क्या प्रदर्शन के लिए मनचाही जगह चुनना अधिकार है?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक अहम अंतर स्पष्ट किया था। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना स्वीकार्य अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी किसी खास इलाके में ही प्रदर्शन करने की मांग कर सकते हैं।

अदालत ने यह भी माना कि प्रदर्शनकारियों के लिए सत्ता के केंद्र के करीब अपनी बात रखना प्रभावी हो सकता है। हालांकि, तकनीक और सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में किसी मांग को संबंधित लोगों तक पहुंचाने के कई दूसरे तरीके भी उपलब्ध हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए विरोध की आवाज व्यापक स्तर पर पहुंच सकती है।

इसके बावजूद, कोर्ट ने यह नहीं कहा था कि प्रदर्शन के लिए स्थान का महत्व पूरी तरह खत्म हो गया है। अदालत ने जंतर-मंतर के लंबे समय से इस्तेमाल और उसकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कहा था कि सीमित हिस्से में नियंत्रित तरीके से छोटे समूहों को प्रदर्शन की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि रामलीला मैदान पुरानी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित होने के कारण हर तरह के विरोध प्रदर्शन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इसलिए, किसी वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था करते समय उसकी क्षमता और सुविधाओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को क्या निर्देश दिए थे?

2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर जंतर-मंतर पर सीमित और व्यवस्थित विरोध प्रदर्शनों के लिए उचित व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया था।

अदालत ने कहा था कि ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए, जिनसे प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने का अवसर मिले, लेकिन जंतर-मंतर रोड पर रहने वाले लोगों और वहां स्थित कार्यालयों को अनावश्यक परेशानी न हो। कोर्ट ने प्रदर्शन आयोजित करने से पहले पुलिस कमिश्नर या उनके अधिकृत अधिकारी से अनुमति लेने जैसी व्यवस्था पर भी विचार करने का सुझाव दिया था।

हाल ही में जंतर-मंतर के विकल्प पर चर्चा उस समय भी सामने आई, जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए किसी दूसरी उपयुक्त जगह की पहचान करने पर विचार करने को कहा था। यह मुद्दा दिल्ली में CEC/SIR विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान उठा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि सक्षम अधिकारी जंतर-मंतर के अलावा किसी दूसरी जगह को निर्धारित करने पर विचार करेंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदर्शन के लिए नई जगहें तय करते समय सरकार और पुलिस प्रदर्शनकारियों की जरूरतों तथा स्थानीय लोगों की परेशानियों के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं। सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला इस बहस में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बना हुआ है। हालांकि, उस फैसले को दिल्ली पुलिस के अक्टूबर 2026 के ताजा निर्णय पर स्वतः लागू होने वाला अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मौजूदा व्यवस्था की कानूनी स्थिति और उससे जुड़े सवाल संबंधित आदेशों तथा आगे की न्यायिक कार्यवाही पर निर्भर करेंगे।