2006 के हत्या के प्रयास के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपियों के अधिकारों से जुड़ा अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी से किसी खास परिस्थिति या सबूत पर सवाल ही नहीं किया, तो बाद में उसी बात की सफाई न देने को आरोपी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसी आधार के साथ मामले में सबूतों की दूसरी कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 307 के तहत दोषी ठहराए गए तीन आरोपियों को बरी कर दिया।
यह फैसला जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने दो आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। मामला 9 जून 2006 की उस घटना से जुड़ा था, जिसमें अभियोजन के मुताबिक आरिफ अली उर्फ आरिफ, मोहम्मद कामिल उर्फ गुड्डू और अब्दुल रऊफ ने शिकायतकर्ता सुबराती पर देसी पिस्तौल से गोली चलाई थी।
सात साल की सजा से लेकर हाईकोर्ट की सुनवाई तक
ट्रायल कोर्ट ने तीनों को हत्या के प्रयास के मामले में दोषी माना था। उन्हें सात साल की कठोर कैद के साथ 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट के सामने मामले की एक अहम कड़ी खुद आरोपी आरिफ की चोटें बनीं। रिकॉर्ड के मुताबिक घटना के दौरान आरिफ को भी चार चोटें लगी थीं। मेडिकल जांच में सिर पर गहरे कटे घाव, पीठ पर चोट का निशान और हाथ में सूजन दर्ज की गई थी। डॉक्टर के मुताबिक ये चोटें करीब एक दिन पुरानी थीं और लाठी से लग सकती थीं।
लेकिन अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि आरिफ को चोटें कैसे लगीं। ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर की गवाही को स्वीकार नहीं किया और यह भी देखा कि आरोपियों ने कोई FIR दर्ज नहीं कराई थी। साथ ही धारा 313 के बयान में आरिफ ने अपनी चोटों का जिक्र नहीं किया था।
यहीं से हाईकोर्ट ने कानूनी सवाल को अलग नजरिए से देखा।
धारा 313 CrPC पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा कि धारा 313 CrPC के तहत आरोपी से सवाल करना अदालत की जिम्मेदारी है। आरोपी पर यह दायित्व नहीं डाला जा सकता कि वह खुद ही मुकदमे की हर परिस्थिति की व्याख्या करता रहे।
कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी विशेष तथ्य या परिस्थिति को लेकर आरोपी से सवाल ही नहीं पूछा गया, तो उसके पास उस पर सफाई देने का अवसर भी नहीं था। ऐसे में उस परिस्थिति को लेकर जवाब नहीं देने के आधार पर उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना कानूनी रूप से उचित नहीं है।
आरिफ की चोटों के मामले में भी हाईकोर्ट ने यही बात लागू की। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष इन चोटों की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर पाया। इससे बचाव पक्ष की उस दलील को बल मिला कि शिकायतकर्ता पक्ष के लोगों की भूमिका भी घटना में हो सकती है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि शिकायतकर्ता ने गोली लगने के बाद बेहोश होने की बात कही थी। ऐसे में यह सवाल उठा कि क्या उसके बेहोश होने के बाद आरिफ पर लाठी से हमला किया गया था।
सिर्फ धारा 313 ही नहीं, कहानी में कई और पेंच
हाईकोर्ट को अभियोजन की कहानी में दूसरी विसंगतियां भी मिलीं। FIR में विवाद की वजह शिकायतकर्ता के बच्चों और रऊफ के बच्चों के बीच झगड़ा बताई गई थी। लेकिन बाद में शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि रऊफ के कोई बच्चे ही नहीं थे।
जांच अधिकारी ने विवाद की एक अलग वजह बताई। उसके अनुसार रऊफ की भैंस ने शिकायतकर्ता की बाड़ को नुकसान पहुंचाया था। वहीं शिकायतकर्ता के भाई ने कहा कि आरोपियों के पास कोई मवेशी नहीं था। यानी घटना की शुरुआत को लेकर ही अलग-अलग बातें सामने आईं।
फायरिंग की जगह और तरीके को लेकर भी कोर्ट को संदेह हुआ। साइट प्लान में बताया गया था कि आरोपी कमरे के अंदर से गोली चला रहे थे और शिकायतकर्ता करीब 22 कदम दूर था। लेकिन उस कमरे में न दरवाजा था और न खिड़की। घर के चारों तरफ करीब 10 फुट ऊंची दीवार भी थी। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने अभियोजन की बताई फायरिंग की स्थिति को असंभव जैसा माना।
खून को लेकर भी कहानी और मेडिकल रिकॉर्ड में अंतर मिला। शिकायतकर्ता ने बहुत ज्यादा खून बहने और कपड़ों पर खून लगने की बात कही थी। लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में अत्यधिक रक्तस्राव का उल्लेख नहीं था। जांच अधिकारी को घटनास्थल से खून नहीं मिला और पुलिस के सामने खून से सने कपड़े भी पेश नहीं किए गए।
मेडिकल रिपोर्ट में चोट के आसपास कालापन दर्ज था। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के मुताबिक ऐसा निशान नजदीक से गोली चलने की स्थिति से मेल खाता है, जबकि अभियोजन ने फायरिंग की दूरी करीब 55 से 60 फीट बताई थी।
सबूतों में संदेह, तीनों आरोपी बरी
इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन की कहानी में कई महत्वपूर्ण कमियां हैं। ये कमियां केवल छोटी तकनीकी खामियां नहीं थीं, बल्कि घटना की शुरुआत और घटना के तरीके को लेकर ही उचित संदेह पैदा करती थीं।
ऐसे में अभियोजन तीनों आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए आरिफ अली, मोहम्मद कामिल उर्फ गुड्डू और अब्दुल रऊफ को IPC की धारा 307 के तहत बरी कर दिया।
मोहम्मद कामिल की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि घटना के समय वह नाबालिग था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जब आरोपी को ही बरी किया जा चुका है, तब यह सवाल फिलहाल सैद्धांतिक रह जाता है। यह स्थिति तब बदल सकती है, जब राज्य सरकार फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है।
इस फैसले का अहम पहलू यही है कि आपराधिक मुकदमे में आरोपी के खिलाफ किसी परिस्थिति का इस्तेमाल करने से पहले उसे उस परिस्थिति पर अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। धारा 313 CrPC इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।



