उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेशों ने पुलिस की कार्रवाई और उसकी जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने एनकाउंटर में पुलिस के आत्मरक्षा के अधिकार से इनकार नहीं किया है। लेकिन उसका साफ कहना है कि एनकाउंटर होने के बाद भी कानून की प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती। खास तौर पर जब किसी आरोपी को गोली लगती है या उसकी मौत होती है, तो FIR, स्वतंत्र जांच, मेडिकल प्रक्रिया और सबूतों की जांच जैसे कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन जरूरी है। 2026 में दिए गए कई आदेशों में हाईकोर्ट ने इसी बात पर जोर दिया है।
‘हाफ एनकाउंटर’ पर कोर्ट की नजर, गोली घुटने के नीचे ही क्यों?
जनवरी 2026 के ‘राजू उर्फ राजकुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले और अगस्त 2026 के ‘छोटकाऊ उर्फ अलाउद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में अदालत ने पुलिस एनकाउंटर की प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणियां कीं।
छोटकाऊ मामले में अदालत ने कहा कि अक्सर पुलिस की ओर से ऐसी FIR सामने आती है, जिसमें बताया जाता है कि गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर गोली चलाई। इसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैर या घुटने के नीचे गोली लगती है। कोर्ट ने इस तरह के पैटर्न पर सवाल उठाया।
आम बोलचाल में ऐसे मामलों को ‘हाफ एनकाउंटर’ या ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ कहा जाता है। लेकिन अदालत के लिए असली सवाल यह है कि पुलिस ने जिस बल का इस्तेमाल किया, वह परिस्थितियों में कानूनी रूप से जरूरी था या नहीं।
राजू मामले में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने कहा कि पुलिस अधिकारी सिर्फ प्रमोशन, वरिष्ठ अधिकारियों की प्रशंसा या सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अदालत ने साफ किया कि किसी आरोपी को सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं।
एनकाउंटर हुआ तो FIR और स्वतंत्र जांच जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में एनकाउंटर में होने वाली मौतों और गंभीर चोटों से जुड़े मामलों के लिए विस्तृत सुरक्षा उपाय तय किए थे।
इनका मकसद यही है कि पुलिस की कार्रवाई की जांच उसी व्यवस्था के भीतर न रह जाए, जिस पर सवाल उठे हैं। गंभीर चोट या मौत की स्थिति में FIR दर्ज करना, स्वतंत्र जांच कराना, घायल व्यक्ति को मेडिकल सहायता देना और उसका बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज करना जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है।
हथियारों और अन्य फोरेंसिक सबूतों को भी सुरक्षित रखने और उनकी जांच करने की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही थी। साथ ही, किसी पुलिस अधिकारी को उसकी बहादुरी साबित होने से पहले तत्काल आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या पुरस्कार देने से भी सावधान किया गया था।
राजू मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ये निर्देश पुलिस की सुविधा के मुताबिक बदले नहीं जा सकते। संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून सभी संबंधित अदालतों और प्राधिकरणों पर बाध्यकारी है।
एक मामले में राज्य ने माना कि घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज नहीं किया गया था। दूसरे जुड़े मामले में पुलिस अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि एनकाउंटर को लेकर अलग FIR ही दर्ज नहीं हुई और इसलिए जांच भी नहीं हुई। हाईकोर्ट ने इस स्थिति को बेहद गंभीर माना।
इसके बाद कोर्ट ने गंभीर चोट वाले एनकाउंटर मामलों के लिए छह प्रमुख प्रक्रियाओं पर जोर दिया—FIR दर्ज हो, स्वतंत्र जांच हो, घायल को इलाज मिले, उसका बयान दर्ज हो, मौत की स्थिति में सक्षम अदालत तक जांच पहुंचे और तत्काल पुरस्कार न दिए जाएं। अगर प्रक्रिया का पालन नहीं होता या जांच की निष्पक्षता पर संदेह हो, तो पीड़ित परिवार सेशन जज के पास भी जा सकता है।
छोटकाऊ केस में 23 पुलिसकर्मियों की कहानी पर उठे सवाल
अगस्त 2026 में लखनऊ बेंच के सामने आया छोटकाऊ उर्फ अलाउद्दीन का मामला इस बहस को और आगे ले गया। पुलिस के मुताबिक, 13 पुलिसकर्मी उसका पीछा कर रहे थे और बाद में 10 सदस्यों वाली SWAT टीम भी इसमें शामिल हो गई। यानी घटनास्थल पर कुल 23 पुलिसकर्मी बताए गए।
पुलिस की FIR में कहा गया कि शुरुआती 13 पुलिसकर्मी एक सरकारी वाहन में थे और बाद में तीन टीमों में अलग-अलग रास्तों पर चले गए। SWAT टीम के आने के बाद सभी ने एक पुल के पास मोर्चा संभाला। कोर्ट को इस घटनाक्रम पर संदेह हुआ।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने एक ही वाहन में 13 पुलिसकर्मियों के होने के दावे को पहली नजर में अविश्वसनीय बताया। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि अगर SWAT के 10 सदस्य और तीन पुलिस टीमों के 13 सदस्य मौके पर मौजूद थे, तो एक ई-रिक्शा से आ रहे व्यक्ति को रोकने में इतनी मुश्किल कैसे हुई।
पुलिस का दावा था कि छोटकाऊ ने गोली चलाई और फिर हथियार दोबारा लोड करने लगा। SHO के मुताबिक, हथियार लोड होने की आवाज सुनकर उसने करीब 15 मीटर की दूरी से दो गोलियां चलाईं, जो आरोपी के पैरों में लगीं।
कोर्ट ने इस दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। खास तौर पर यह जांचने का निर्देश दिया गया कि क्या उस स्थिति में SHO करीब 15 मीटर की दूरी से 9 mm सर्विस पिस्टल से इतनी सटीक गोली चला सकता था।
मामले में जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठा। FIR दर्ज करने वाले SHO के अधीन काम करने वाले अधिकारी ने शुरुआत में जांच की। बाद में जांच दूसरे थाने को दी गई, लेकिन चार्जशीट आखिरकार उसी SHO ने दाखिल की, जो इस मामले में शिकायतकर्ता था।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि PUCL के सुरक्षा उपायों का पालन नहीं हुआ और एनकाउंटर FIR की वास्तविकता की जांच CBI से कराने का आदेश दिया। कोर्ट ने SHO की शूटिंग क्षमता की जांच का निर्देश भी दिया।
पुलिस को जवाबदेही से बाहर नहीं रख सकता एनकाउंटर
इस मामले में एक और बात कोर्ट के सामने आई। एनकाउंटर में शामिल बताए गए सभी 23 पुलिस अधिकारियों को उनके ‘अच्छे काम’ के लिए पुरस्कृत किया गया था। कोर्ट ने इस पहलू पर भी सवाल उठाया।
इसी तरह ‘राजेंद्र त्यागी और दो अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में जस्टिस विनोद दिवाकर ने एनकाउंटर में मौत, चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई और खास व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के इस्तेमाल जैसे मुद्दों के अदालत के सामने बार-बार आने का उल्लेख किया।
पूरे मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी आरोपी पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, आरोप और दोषसिद्धि एक ही चीज नहीं हैं। जनता का गुस्सा सबूत की जगह नहीं ले सकता और मीडिया ट्रायल अदालत में होने वाले आपराधिक मुकदमे का विकल्प नहीं बन सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन आदेशों में पुलिस के आत्मरक्षा के अधिकार को खत्म करने की बात नहीं कही गई है। जोर इस बात पर है कि बल प्रयोग के बाद भी कानून, जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।
आखिरकार एनकाउंटर भी कानून के दायरे में ही आता है। इसलिए गोली चलने के बाद पहला सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पुलिस ने क्या दावा किया। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस दावे की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कैसे हुई।
3 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर में हुई मौतों से जुड़े एक मामले का सुप्रीम कोर्ट में भी उल्लेख हुआ। मामले की जल्द सुनवाई के अनुरोध पर CJI सूर्य कांत ने तत्काल सुनवाई की जरूरत से इनकार करते हुए कहा कि “कोई तात्कालिकता नहीं है।”



