बॉम्बे हाईकोर्ट ने अवैध रूप से भारत में दाखिल होने वाले विदेशी नागरिकों और उन्हें फर्जी पहचान पत्र बनवाने में मदद करने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने महाराष्ट्र पुलिस को निर्देश दिया कि जांच केवल कथित घुसपैठियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन भारतीय नागरिकों की भूमिका भी गहराई से जांची जानी चाहिए, जिन्होंने उन्हें आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज हासिल करने में मदद की। अदालत ने साफ किया कि अगर जांच में ऐसे लोगों की संलिप्तता सामने आती है, तो उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को भी एक आरोपी से जुड़े जरूरी दस्तावेज और जानकारी पुलिस को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
फर्जी दस्तावेजों के सहारे भारतीय नागरिक बनने का आरोप, हाईकोर्ट सख्त
यह मामला महाराष्ट्र में कथित तौर पर अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों से जुड़ा है। बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ 22 अक्टूबर को महाराष्ट्र पुलिस की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
पुलिस ने अदालत से UIDAI को निर्देश देने की मांग की थी, ताकि बकार हसन शेख नाम के व्यक्ति से संबंधित जरूरी जानकारी और दस्तावेज हासिल किए जा सकें। आरोप है कि शेख बांग्लादेश का नागरिक है और अवैध रूप से भारत में दाखिल होने के बाद पहचान संबंधी दस्तावेजों के सहारे यहां रह रहा था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शेख समेत छह बांग्लादेशी नागरिक कथित तौर पर अवैध तरीके से भारत में दाखिल हुए थे। इसके बाद वे नवी मुंबई के कामोथे इलाके में भारतीय नागरिक बनकर रहने लगे। आरोप है कि उन्होंने आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज भी बनवा लिए थे।
गिरफ्तारी के बाद इन लोगों ने जांच के दौरान अपने पहचान पत्र पेश किए और दावा किया कि वे भारतीय नागरिक हैं, बांग्लादेशी नहीं। पुलिस की जांच में इन दस्तावेजों को हासिल करने में कथित तौर पर मदद करने वाले लोगों के नाम भी सामने आए।
सिर्फ घुसपैठियों पर नहीं, मदद करने वालों पर भी होगी जांच
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में उन लोगों की भूमिका की भी पड़ताल होनी चाहिए, जिन्होंने कथित तौर पर विदेशी नागरिकों को भारतीय पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल करने में सहायता दी।
अदालत के सामने मोहम्मद अलाउद्दीन उर्फ मास्टर उस्मान अंसारी, प्रवीण आनंदा पाटिल, अजय भीमराव सर्वे और विशाल जनार्दन शेडगे के नाम रखे गए। आरोप है कि इन लोगों ने संबंधित विदेशी नागरिकों को पहचान पत्र बनवाने में मदद की थी।
खंडपीठ ने कहा कि जांच एजेंसी को यह पता लगाना चाहिए कि विदेशी नागरिकों ने भारतीय पहचान दस्तावेज कैसे हासिल किए और इस पूरी प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही। यदि किसी व्यक्ति की संलिप्तता के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
अदालत की इस टिप्पणी का मुख्य जोर जांच का दायरा बढ़ाने पर रहा। यानी कार्रवाई केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, जिन पर अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने का आरोप है। कथित तौर पर उन्हें दस्तावेज उपलब्ध कराने और यहां बसने में मदद करने वालों की भूमिका भी जांच के केंद्र में होनी चाहिए।
UIDAI को भी देना होगा आरोपी से जुड़ा रिकॉर्ड
इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी UIDAI को भी निर्देश दिया कि वह बकार हसन शेख के संबंध में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा मांगी गई जरूरी जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध कराए।
पुलिस के लिए यह जानकारी जांच में अहम हो सकती है, क्योंकि इससे आरोपी के आधार कार्ड से संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेज हासिल करने की प्रक्रिया की पड़ताल करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित दस्तावेज फर्जी होने की बात अदालत ने अंतिम रूप से साबित मान ली है। यह आरोपों और जारी जांच से जुड़ा मामला है।
अदालत ने जांच एजेंसी से कहा कि मामले की पड़ताल को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए। साथ ही, जिन लोगों पर मदद करने का आरोप है, उनसे भी आवश्यक पूछताछ की जाए और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाए।
आम लोगों और पहचान पत्र जारी करने वाली एजेंसियों के लिए क्या मायने हैं?
इस मामले का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र अलग-अलग सरकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होते हैं। इन दस्तावेजों को हासिल करने की प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आने पर उनकी जांच और सत्यापन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाईकोर्ट के निर्देश से यह संदेश मिलता है कि कथित अवैध प्रवेश के साथ-साथ फर्जी दस्तावेज तैयार कराने या हासिल करने में मदद करने वालों की भूमिका भी जांची जा सकती है। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना और अदालत में उसका दोष साबित होना अलग-अलग बातें हैं। कार्रवाई संबंधित साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होनी चाहिए।
मामले का नाम: State of Maharashtra vs Unique Identification Authority of India



